अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के चीन दौरे, पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और वैश्विक ऊर्जा संकट के बीच भारत ने भी अपनी कूटनीतिक सक्रियता तेज कर दी है। इसी माहौल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शुक्रवार को पांच देशों की अहम विदेश यात्रा पर रवाना हो गए। प्रधानमंत्री का यह दौरा ऐसे समय हो रहा है जब देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में भी बढ़ोतरी हुई है और ऊर्जा सुरक्षा भारत के लिए सबसे बड़ा मुद्दा बनकर उभरी है। प्रधानमंत्री मोदी छह दिनों के इस दौरे में संयुक्त अरब अमीरात, नीदरलैंड, स्वीडन, नॉर्वे और इटली का दौरा करेंगे। इस यात्रा का मकसद सिर्फ राजनयिक संबंध मजबूत करना नहीं है, बल्कि व्यापार, ऊर्जा, हरित विकास, तकनीक और वैश्विक रणनीतिक साझेदारी को नई दिशा देना भी है। केंद्र सरकार इस दौरे को भारत की बदलती वैश्विक भूमिका और आर्थिक हितों से जोड़कर देख रही है। दौरे के पहले चरण में प्रधानमंत्री मोदी शुक्रवार को संयुक्त अरब अमीरात पहुंचेंगे।
यूएई इस समय भारत का तीसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है और ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में उसकी भूमिका बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। प्रधानमंत्री वहां यूएई के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान से मुलाकात करेंगे। दोनों नेताओं के बीच रणनीतिक साझेदारी, निवेश, ऊर्जा आपूर्ति और क्षेत्रीय हालात पर विस्तार से चर्चा होगी। विदेश मंत्रालय के मुताबिक इस यात्रा के दौरान एलपीजी आपूर्ति और रणनीतिक पेट्रोलियम भंडारण से जुड़े दो बड़े समझौतों पर हस्ताक्षर हो सकते हैं। ऐसे समय में जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ रही हैं और भारत में पेट्रोल-डीजल महंगा हुआ है, तब यूएई के साथ ऊर्जा सहयोग को बेहद अहम माना जा रहा है।
मोदी सरकार चाहती है कि वैश्विक संकट के बीच भारत की ऊर्जा जरूरतों पर असर कम से कम पड़े। यूएई में करीब 45 लाख भारतीय रहते हैं। इसलिए प्रधानमंत्री मोदी का यह दौरा वहां बसे भारतीय समुदाय के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। संभावना है कि दोनों देशों के बीच प्रवासी भारतीयों की सुविधाओं, रोजगार और निवेश से जुड़े मुद्दों पर भी चर्चा होगी। पिछले कुछ वर्षों में भारत और यूएई के रिश्ते तेजी से मजबूत हुए हैं और दोनों देशों के बीच व्यापार लगातार नए रिकॉर्ड बना रहा है। विदेश मंत्रालय में सचिव (पश्चिम) सिबी जॉर्ज ने बताया कि प्रधानमंत्री की यह यात्रा भारत की बहुआयामी विदेश नीति का हिस्सा है। उनका कहना है कि भारत इस समय यूरोप, खाड़ी देशों और नॉर्डिक देशों के साथ आर्थिक और तकनीकी साझेदारी को नई ऊंचाई पर ले जाना चाहता है।
यूरोप में तकनीक, हरित विकास और व्यापार पर रहेगा फोकस
यूएई के बाद प्रधानमंत्री मोदी अपनी यात्रा के दूसरे चरण में नीदरलैंड जाएंगे। वर्ष 2017 के बाद यह उनकी दूसरी नीदरलैंड यात्रा होगी। प्रधानमंत्री वहां किंग Willem-Alexander और क्वीन Máxima से मुलाकात करेंगे। इसके अलावा वे नीदरलैंड के प्रधानमंत्री Rob Jetten के साथ भी द्विपक्षीय वार्ता करेंगे। नीदरलैंड के साथ भारत जल प्रबंधन, कृषि तकनीक, लॉजिस्टिक्स और सेमीकंडक्टर सेक्टर में सहयोग बढ़ाना चाहता है। माना जा रहा है कि दोनों देशों के बीच हाईटेक उद्योगों और डिजिटल इनोवेशन को लेकर भी कई अहम चर्चाएं होंगी। यूरोप में बदलते राजनीतिक और आर्थिक समीकरणों के बीच भारत अपने सहयोगी देशों के साथ नए निवेश अवसर तलाश रहा है।
इसके बाद प्रधानमंत्री मोदी स्वीडन के गोथेनबर्ग शहर पहुंचेंगे। वहां वे स्वीडन के प्रधानमंत्री Ulf Kristersson के साथ द्विपक्षीय बैठक करेंगे। दोनों नेताओं के बीच रक्षा, हरित तकनीक, क्लीन एनर्जी, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी और डिजिटल अर्थव्यवस्था पर बातचीत होगी। प्रधानमंत्री मोदी और स्वीडिश प्रधानमंत्री यूरोपियन राउंड टेबल फॉर इंडस्ट्री को भी संबोधित करेंगे। इस कार्यक्रम में यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष Ursula von der Leyen भी मौजूद रहेंगी। इस मंच को यूरोप के बड़े उद्योगपतियों और नीति निर्माताओं का अहम मंच माना जाता है। भारत यहां निवेश आकर्षित करने और यूरोपीय कंपनियों को भारत में विनिर्माण बढ़ाने के लिए आमंत्रित कर सकता है। यात्रा के चौथे चरण में प्रधानमंत्री मोदी सोमवार को नॉर्वे पहुंचेंगे। वहां वे तीसरे भारत-नॉर्डिक शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेंगे। इस सम्मेलन में नॉर्वे समेत कई नॉर्डिक देशों के नेता शामिल होंगे।
बैठक में जलवायु परिवर्तन, हरित ऊर्जा, समुद्री सहयोग, आर्कटिक क्षेत्र और टिकाऊ विकास जैसे मुद्दों पर चर्चा होगी। भारत इस समय ग्रीन एनर्जी और स्वच्छ तकनीक के क्षेत्र में वैश्विक सहयोग बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रहा है। दौरे के आखिरी चरण में प्रधानमंत्री मोदी मंगलवार को इटली जाएंगे। इटली में वे राष्ट्रपति Sergio Mattarella से मुलाकात करेंगे और प्रधानमंत्री Giorgia Meloni के साथ वार्ता करेंगे। दोनों देशों के बीच रक्षा उत्पादन, व्यापार, विनिर्माण और रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करने पर चर्चा होने की संभावना है। यह दौरा सिर्फ औपचारिक विदेश यात्रा नहीं बल्कि बदलते वैश्विक माहौल में भारत की नई रणनीतिक तैयारी का हिस्सा है। एक तरफ पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ रहा है, दूसरी तरफ दुनिया ऊर्जा संकट और आर्थिक अनिश्चितता से जूझ रही है। ऐसे समय में भारत अपने आर्थिक और कूटनीतिक हितों को सुरक्षित करने के लिए सक्रिय भूमिका निभाता नजर आ रहा है।

















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