उत्तराखंड की धामी सरकार का बड़ा फैसला, पहाड़ों में खेती संवारने को बनेगी नई चकबंदी नीति

उत्तराखंड के पर्वतीय गांव लंबे समय से बिखरी खेती, सीमित कृषि भूमि और पलायन जैसी गंभीर चुनौतियों से जूझ रहे हैं। पहाड़ों में छोटी-छोटी और अलग-अलग स्थानों पर फैली कृषि जोतें किसानों के लिए खेती को लगातार कठिन और घाटे का सौदा बनाती रही हैं। यही वजह है कि बड़ी संख्या में लोग गांव छोड़कर शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। अब राज्य सरकार ने इस समस्या के समाधान के लिए एक बड़ा और दूरगामी कदम उठाया है। राज्य मंत्रिमंडल ने पर्वतीय क्षेत्रों में खेती को व्यवस्थित करने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने के उद्देश्य से “स्वैच्छिक/आंशिक चकबंदी प्रोत्साहन नीति-2026” को मंजूरी दे दी है। धामी सरकार का मानना है कि इस नीति के लागू होने से पहाड़ों में कृषि गतिविधियों को नया जीवन मिलेगा। छोटे-छोटे खेतों को आपसी सहमति से एक स्थान पर व्यवस्थित कर खेती को आसान और लाभकारी बनाया जाएगा। इससे न केवल उत्पादन बढ़ेगा, बल्कि बागवानी, औषधीय खेती और सह कृषि गतिविधियों को भी बढ़ावा मिलेगा। 

यदि नीति प्रभावी तरीके से लागू हुई तो यह पलायन रोकने की दिशा में बड़ा कदम साबित हो सकती है। राज्य सरकार ने इस नीति को केवल कृषि सुधार तक सीमित नहीं रखा है, बल्कि इसे ग्रामीण विकास और आर्थिक मजबूती से भी जोड़ा है। पहाड़ों में खेती की सबसे बड़ी समस्या यह रही है कि एक ही किसान की जमीन कई हिस्सों में बंटी होती है। खेत दूर-दूर होने से सिंचाई, मशीनों का उपयोग और उत्पादन लागत बढ़ जाती है। ऐसे में किसान खेती से दूरी बनाने लगते हैं। नई नीति का उद्देश्य इसी बिखराव को खत्म कर खेती को व्यवस्थित करना है। नीति के तहत प्रदेश के 11 पर्वतीय जिलों में अगले पांच वर्षों के दौरान कुल 275 गांवों को स्वैच्छिक और आंशिक चकबंदी योजना से जोड़ा जाएगा। सरकार ने लक्ष्य तय किया है कि प्रत्येक पर्वतीय जिले में हर वर्ष पांच गांवों में चकबंदी का कार्य पूरा किया जाएगा। इस प्रकार पांच वर्षों में व्यापक स्तर पर कृषि सुधार की नींव तैयार की जाएगी। उत्तराखंड सरकार ने इस योजना में पात्रता और पारदर्शिता को लेकर भी स्पष्ट नियम बनाए हैं। केवल उन्हीं गांवों का चयन किया जाएगा जो पूरी तरह भू-विवाद से मुक्त होंगे। इसके अलावा चकबंदी क्षेत्र का न्यूनतम कुल भूमि क्षेत्रफल 10 हेक्टेयर होना जरूरी होगा। यदि किसी क्षेत्र में भूमि कम है, तो वहां कम से कम 25 खाताधारकों की लिखित सहमति अनिवार्य होगी। सरकार का कहना है कि इससे विवाद की संभावनाएं कम होंगी और योजना का क्रियान्वयन सुचारु रूप से हो सकेगा। इस नीति की सबसे अहम बात यह है कि इसमें किसानों की सहमति को प्राथमिकता दी गई है। 

चक निर्माण का कार्य आपसी सहमति से किया जाएगा। किसान स्वयं अपनी चकबंदी योजना तैयार कर संबंधित अधिकारियों के सामने प्रस्तुत करेंगे। यानी सरकार की भूमिका सहयोग और निगरानी की होगी, जबकि योजना का मूल आधार ग्रामीणों की सहभागिता रहेगा। राज्य सरकार ने किसानों को योजना से जोड़ने के लिए प्रोत्साहन राशि का भी प्रावधान किया है। हालांकि यह लाभ चकबंदी योजना पूरी होने के बाद ही दिया जाएगा। इससे किसानों को योजना में सक्रिय भागीदारी के लिए प्रेरणा मिलेगी। सरकार का मानना है कि आर्थिक प्रोत्साहन मिलने से अधिक लोग इस योजना में शामिल होंगे। योजना का लाभ लेने के लिए इच्छुक किसान या खाताधारक बंदोबस्त अधिकारी (चकबंदी) या सहायक कलेक्टर यानी परगनाधिकारी के समक्ष आवेदन प्रस्तुत कर सकते हैं। इसके लिए प्रशासनिक स्तर पर अलग व्यवस्था बनाई जाएगी ताकि किसानों को अनावश्यक परेशानियों का सामना न करना पड़े।

कृषि सुधार के साथ पलायन रोकने पर धामी सरकार का बड़ा फोकस

उत्तराखंड सरकार ने इस नीति के संचालन और निगरानी के लिए त्रिस्तरीय व्यवस्था तैयार की है। राज्य स्तर पर उच्चाधिकार समिति यानी एचपीसी का गठन किया गया है, जो पूरी योजना की निगरानी करेगी। इसके अलावा राज्य स्तरीय अनुश्रवण समिति और जनपद स्तर पर क्रियान्वयन समितियां भी बनाई जाएंगी। सरकार का कहना है कि इससे योजना की पारदर्शिता बनी रहेगी और किसी भी स्तर पर लापरवाही की गुंजाइश नहीं रहेगी।नीति में यह भी तय किया गया है कि इसके लागू होने के तीन वर्ष बाद इसकी समीक्षा की जाएगी। इस दौरान प्राप्त अनुभवों, किसानों के सुझावों और व्यवहारिक परिस्थितियों के आधार पर आवश्यक संशोधन किए जाएंगे। सरकार का उद्देश्य योजना को जमीनी जरूरतों के अनुरूप लगातार बेहतर बनाना है। उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में चकबंदी केवल कृषि सुधार नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक बदलाव का माध्यम भी बन सकती है। 

राज्य का बड़ा हिस्सा वन क्षेत्र और पहाड़ी भूभाग से घिरा है। ऐसे में खेती योग्य भूमि पहले ही सीमित है। ऊपर से जोतों का लगातार छोटा और बिखरा होना कृषि उत्पादन को प्रभावित करता है। नई नीति इस समस्या के समाधान की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। धामी सरकार को उम्मीद है कि चकबंदी के बाद खेत बड़े और व्यवस्थित होंगे तो आधुनिक कृषि तकनीकों का उपयोग आसान होगा। सिंचाई योजनाएं बेहतर तरीके से लागू की जा सकेंगी और कृषि यंत्रीकरण को भी बढ़ावा मिलेगा। इससे उत्पादन लागत घटेगी और किसानों की आमदनी बढ़ने की संभावना बनेगी। इसके अलावा बागवानी, फल उत्पादन, जड़ी-बूटी खेती, दुग्ध उत्पादन और अन्य सह कृषि गतिविधियों को भी नई गति मिलने की उम्मीद है। पहाड़ों में रोजगार के सीमित अवसरों के कारण लगातार हो रहे पलायन को रोकने में भी यह नीति मददगार साबित हो सकती है। 

धामी सरकार का मानना है कि यदि गांवों में खेती लाभकारी बनेगी तो लोग रोजगार और बेहतर जीवन के लिए गांव छोड़ने के बजाय स्थानीय स्तर पर ही अवसर तलाशेंगे। उत्तराखंड में लंबे समय से चकबंदी की आवश्यकता महसूस की जा रही थी, लेकिन पर्वतीय परिस्थितियों और भूमि विवादों के कारण यह प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पा रही थी। अब स्वैच्छिक और आंशिक मॉडल अपनाकर सरकार ने इसे व्यवहारिक बनाने का प्रयास किया है। इससे किसानों में भरोसा बढ़ेगा और विवाद की स्थिति कम होगी। राज्य सरकार ने संकेत दिए हैं कि आने वाले समय में इस नीति को ग्रामीण विकास, स्वरोजगार और कृषि आधारित उद्योगों से भी जोड़ा जा सकता है। यदि योजना सफल रहती है तो पहाड़ों में खेती की तस्वीर बदल सकती है। इससे न केवल किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी, बल्कि खाली हो रहे गांवों में फिर से रौनक लौटने की उम्मीद भी बढ़ेगी।

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