बारिश के बीच मानसून सत्र में दिल्ली का पारा हाई, संसद के भीतर विपक्ष और बाहर सीजेपी के प्रदर्शन से सरकार पर दोहरा दबाव

संसद के मानसून सत्र के पहले ही दिन राजधानी दिल्ली का राजनीतिक माहौल पूरी तरह गरमा गया है। एक ओर संसद के भीतर सरकार अपने विधायी एजेंडे को आगे बढ़ाने की तैयारी में है, वहीं दूसरी ओर संसद के बाहर कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के संसद मार्च ने केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस की चुनौती बढ़ा दी है। सुबह से ही हजारों प्रदर्शनकारी संसद की ओर बढ़ने के लिए जुटने लगे, लेकिन भारी पुलिस बल और बैरिकेडिंग के कारण उन्हें आगे बढ़ने से रोक दिया गया। इस दौरान प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच धक्का-मुक्की हुई। भीड़ ने बैरिकेडिंग तोड़ने की कोशिश की, जिसके बाद पुलिस ने लाठीचार्ज कर स्थिति को नियंत्रित किया।सीजेपी का संसद मार्च सुबह नौ बजे शुरू होना था, लेकिन पुलिस की रोक के कारण इसमें देरी हुई। प्रदर्शनकारियों का दावा है कि दस हजार से अधिक लोग आंदोलन में शामिल हैं। राजधानी के कई हिस्सों में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है। संसद भवन के आसपास अतिरिक्त पुलिस बल, अर्द्धसैनिक बल और रैपिड एक्शन फोर्स की तैनाती की गई है ताकि किसी भी अप्रिय स्थिति से निपटा जा सके।

दिल्ली पुलिस का कहना है कि इस मार्च के लिए कोई आधिकारिक अनुमति नहीं ली गई थी और न ही प्रशासन की ओर से इसकी मंजूरी दी गई थी। नई दिल्ली के पुलिस उपायुक्त सचिन शर्मा ने प्रदर्शनकारियों से बातचीत कर उन्हें कानून का पालन करने और शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बात रखने की अपील की। पुलिस का कहना है कि बिना अनुमति संसद की ओर मार्च निकालने की अनुमति नहीं दी जा सकती क्योंकि इससे कानून-व्यवस्था और सुरक्षा पर असर पड़ सकता है। सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दिपके ने पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए कहा कि उनका आंदोलन पूरी तरह शांतिपूर्ण है और किसी भी कीमत पर इसे बदनाम नहीं होने दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि पिछले एक महीने से आंदोलन जारी है और सोनम वांगचुक ने इस मुद्दे के लिए अपना स्वास्थ्य दांव पर लगा दिया है। 

उनका कहना था कि आंदोलनकारियों की ओर से किसी तरह की हिंसा नहीं की जाएगी और सभी से संयम बनाए रखने की अपील की गई है। इस बीच 23 दिनों से भूख हड़ताल पर बैठे सोनम वांगचुक ने अनशन समाप्त करने के लिए तीन शर्तें रखी हैं। उन्होंने मांग की है कि सरकार शिक्षा व्यवस्था और पेपर लीक की जिम्मेदारी स्वीकार करे, सीजेपी के प्रतिनिधिमंडल को संसद में जाकर अपनी बात रखने की अनुमति दी जाए और सांसद इस मुद्दे को संसद में उठाने का भरोसा दें। यदि स्वास्थ्य कारणों से ऐसा संभव न हो तो सांसद स्वयं अस्पताल पहुंचकर यह आश्वासन दें। सुरक्षा व्यवस्था को देखते हुए दिल्ली मेट्रो रेल निगम ने जनपथ, राजीव चौक, पटेल चौक, सेंट्रल सेक्रेटेरिएट और सेवा भवन सहित कई महत्वपूर्ण मेट्रो स्टेशनों को अस्थायी रूप से बंद कर दिया है। इससे यात्रियों को भी काफी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। राजधानी के वीआईपी इलाकों में यातायात भी प्रभावित हुआ है और कई मार्गों पर वाहनों की आवाजाही सीमित कर दी गई है।

मोदी सरकार के लिए अपने विधायी कार्यक्रम को सुचारु रूप से आगे बढ़ाना आसान नहीं

मानसून सत्र के पहले ही दिन केंद्र सरकार ऐसे समय संसद में प्रवेश कर रही है जब उसे भीतर और बाहर दोनों मोर्चों पर चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। संसद के अंदर विपक्ष विभिन्न मुद्दों पर सरकार को घेरने की तैयारी में है, जबकि संसद के बाहर सीजेपी का आंदोलन लगातार तेज होता जा रहा है। ऐसे में सरकार के लिए अपने विधायी कार्यक्रम को सुचारु रूप से आगे बढ़ाना आसान नहीं माना जा रहा। सरकार इस सत्र में कई महत्वपूर्ण विधेयक पेश करने की तैयारी में है, लेकिन विपक्ष पहले से ही सरकार को विभिन्न मुद्दों पर घेरने की रणनीति बना चुका है। अब सीजेपी के संसद मार्च ने विपक्ष को एक नया राजनीतिक मुद्दा भी दे दिया है। यदि आंदोलन लंबा चलता है और प्रदर्शनकारी लगातार संसद की ओर बढ़ने का प्रयास करते हैं, तो इसका असर संसद की कार्यवाही और राजनीतिक माहौल दोनों पर पड़ सकता है।

कानूनी रूप से भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19 नागरिकों को शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने का अधिकार देता है, लेकिन सार्वजनिक रैली, जुलूस या संसद मार्च के लिए प्रशासन से अनुमति लेना आवश्यक होता है। प्रशासन कानून-व्यवस्था, सुरक्षा और यातायात को ध्यान में रखते हुए अनुमति देता है तथा आवश्यक शर्तें निर्धारित करता है। यदि बिना अनुमति मार्च निकालने का प्रयास किया जाता है, तो पुलिस को उसे रोकने और आवश्यक कानूनी कार्रवाई करने का अधिकार होता है। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि सरकार और दिल्ली पुलिस इस आंदोलन को किस तरह संभालती है। यदि पुलिस सख्ती बढ़ाती है तो राजनीतिक विवाद और गहरा सकता है, जबकि नरमी बरतने की स्थिति में संसद की सुरक्षा और कानून-व्यवस्था पर सवाल खड़े हो सकते हैं। दूसरी ओर यदि आंदोलनकारी संसद की ओर बढ़ने का लगातार प्रयास करते हैं, तो राजधानी में तनाव और बढ़ सकता है।

फिलहाल सरकार की प्राथमिकता संसद की कार्यवाही को बिना व्यवधान के चलाना और कानून-व्यवस्था बनाए रखना है, जबकि आंदोलनकारी अपनी मांगों पर अड़े हुए हैं। ऐसे में मानसून सत्र का पहला दिन केवल संसदीय बहस तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि संसद के बाहर जारी यह आंदोलन भी पूरे सत्र की राजनीतिक दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार संवाद का रास्ता अपनाती है या कानून-व्यवस्था के आधार पर सख्ती जारी रखती है। दोनों ही परिस्थितियों में संसद का यह मानसून सत्र राजनीतिक रूप से बेहद चुनौतीपूर्ण और टकरावपूर्ण रहने के संकेत दे रहा है।

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