मनुष्य के जीवन में कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं, जिनकी अहमियत समय बीतने के साथ कम नहीं होती, बल्कि अनुभवों और स्मृतियों के साथ और गहरी होती जाती है। माता-पिता जीवन देते हैं, परिवार संस्कारों की पहली नींव रखता है और शिक्षक उस जीवन को सही दिशा, दृष्टि और उद्देश्य देने का काम करता है। शिक्षक केवल किताबों में लिखे अक्षरों का अर्थ समझाने वाला व्यक्ति नहीं होता, बल्कि वह विद्यार्थी को संसार को समझने, सवाल पूछने, सही और गलत में अंतर करने तथा जीवन की कठिन परिस्थितियों में विवेकपूर्ण निर्णय लेने की क्षमता प्रदान करता है। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में गुरु का स्थान सदैव सर्वोच्च सम्मान की परंपरा से जुड़ा रहा है।
अक्षरों को शब्दों में, शब्दों को विचारों में और विचारों को जीवन-मूल्यों में बदलने की क्षमता विकसित करना शिक्षक की वास्तविक भूमिका मानी गई है। गुरु को अज्ञान के अंधकार से ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाने वाला मार्गदर्शक माना गया। भारतीय परंपरा में गुरु केवल विषय का ज्ञान देने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि व्यक्तित्व निर्माण, अनुशासन, संस्कार, आत्मबोध और सामाजिक जिम्मेदारी की भावना विकसित करने का माध्यम भी रहा है। गुरु की इसी व्यापक भूमिका को गुरु-वंदना में कहा गया है—“गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।”
समय बदला तो शिक्षा व्यवस्था का स्वरूप भी बदलता गया। प्राचीन गुरुकुलों की जगह विद्यालयों और विश्वविद्यालयों ने ली। किताबों के साथ कंप्यूटर, इंटरनेट और अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता शिक्षा के नए साधन बन चुके हैं। विद्यार्थियों के पास आज सूचनाओं का विशाल भंडार उपलब्ध है, लेकिन सूचना और ज्ञान में अंतर समझाने के लिए शिक्षक की भूमिका पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। वह विद्यार्थी को यह सिखाता है कि उपलब्ध जानकारी में से सही क्या है, उसका विवेकपूर्ण उपयोग कैसे किया जाए और ज्ञान को मानवीय मूल्यों से कैसे जोड़ा जाए। भारत में हर वर्ष 5 सितंबर को मनाया जाने वाला शिक्षक दिवस इसी गुरु-परंपरा और शिक्षकों के योगदान के प्रति राष्ट्रीय कृतज्ञता का प्रतीक है। यह दिन महान दार्शनिक, शिक्षाविद् और भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जयंती के अवसर पर मनाया जाता है। उनका जीवन इस बात का उदाहरण है कि शिक्षा व्यक्ति को केवल विद्वान नहीं बनाती, बल्कि उसे विवेकशील, संवेदनशील और जिम्मेदार नागरिक बनाने का माध्यम भी है।
5 सितंबर 1888 को तमिलनाडु के तिरुत्तणी में जन्मे डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन महान दार्शनिक, चिंतक, लेखक, शिक्षाविद्, राजनयिक और राष्ट्राध्यक्ष थे। उन्होंने दर्शनशास्त्र का अध्ययन किया और विभिन्न प्रतिष्ठित संस्थानों में अध्यापन किया। बाद में वे ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में पूर्वी धर्म और नीतिशास्त्र के प्राध्यापक भी रहे। उनकी विद्वत्ता ने भारतीय दर्शन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।उनकी प्रमुख कृतियों में ‘इंडियन फिलॉसफी’, ‘द हिंदू व्यू ऑफ लाइफ’ और ‘एन आइडियलिस्ट व्यू ऑफ लाइफ’ शामिल हैं। उन्होंने भारतीय और पश्चिमी दार्शनिक परंपराओं के बीच संवाद स्थापित करने का प्रयास किया। सोवियत संघ में भारत के राजदूत के रूप में सेवा देने के बाद वे देश के प्रथम उपराष्ट्रपति और बाद में दूसरे राष्ट्रपति बने। सर्वोच्च संवैधानिक पदों पर पहुंचने के बावजूद उनकी पहचान मूल रूप से एक शिक्षक और दार्शनिक की ही रही।
उनकी शिक्षा-दृष्टि में स्वतंत्र चिंतन, विवेक, नैतिकता और मानवीय संवेदनाओं को विशेष स्थान प्राप्त था। उनके लिए शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त करना नहीं, बल्कि ऐसे मनुष्य का निर्माण करना था जो अपने समाज और देश के प्रति जिम्मेदार हो। इसी कारण 5 सितंबर केवल शिक्षक दिवस नहीं, बल्कि शिक्षा के उद्देश्य और शिक्षक की भूमिका पर विचार करने का अवसर भी बन गया है।
भारतीय ज्ञान परंपरा से आधुनिक शिक्षा तक गुरु का गौरव
भारतीय ज्ञान परंपरा में गुरु की भूमिका हजारों वर्षों से महत्वपूर्ण रही है। वैदिक और उपनिषदीय परंपरा में ज्ञान को केवल सूचना हासिल करने का साधन नहीं, बल्कि मनुष्य के समग्र विकास का माध्यम माना गया। गुरुकुल व्यवस्था में विद्यार्थी गुरु के सान्निध्य में विषयों का अध्ययन करने के साथ अनुशासन, आत्मसंयम, श्रम, प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता और सामाजिक जिम्मेदारी जैसे गुण भी सीखता था। उपनिषदों की संवाद परंपरा में प्रश्न और चिंतन के माध्यम से सत्य की खोज को विशेष महत्व दिया गया। मुंडकोपनिषद् में भी ज्ञान की प्राप्ति के लिए योग्य गुरु के पास जाने की बात कही गई है।तक्षशिला, नालंदा, विक्रमशिला और वल्लभी जैसे प्राचीन शिक्षा केंद्रों ने भारत की ज्ञान परंपरा को व्यापक स्वरूप दिया। यहां दर्शन, व्याकरण, चिकित्सा, गणित, खगोल, राजनीति और अन्य विषयों का अध्ययन कराया जाता था। महर्षि वशिष्ठ, विश्वामित्र, द्रोणाचार्य और कृपाचार्य जैसे गुरुओं की कथाएं भारतीय सांस्कृतिक चेतना का हिस्सा हैं। आचार्य चाणक्य ने चंद्रगुप्त मौर्य को राजनीतिक दृष्टि और रणनीतिक क्षमता प्रदान की। मध्यकाल में कबीर, गुरु नानक, संत तुकाराम और समर्थ रामदास जैसे संतों ने ज्ञान, आध्यात्मिक विवेक और सामाजिक चेतना को व्यापक समाज तक पहुंचाया।
आज शिक्षा का स्वरूप भले ही पूरी तरह बदल गया हो, लेकिन शिक्षक की मूल भूमिका अब भी वही है—विद्यार्थी की प्रतिभा को पहचानना, उसे सही दिशा देना और उसके भीतर बेहतर इंसान बनने की क्षमता विकसित करना। कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल माध्यमों के दौर में शिक्षक की भूमिका और भी व्यापक हो गई है। अब शिक्षक केवल जानकारी देने वाला नहीं, बल्कि विद्यार्थी को जानकारी के सही उपयोग, आलोचनात्मक सोच और मानवीय मूल्यों की समझ देने वाला मार्गदर्शक है।
शिक्षक दिवस के अवसर पर देशभर में शिक्षकों के योगदान को याद करते हुए उन्हें शुभकामनाएं दी गईं। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ समेत कई प्रमुख नेताओं ने शिक्षकों को शिक्षक दिवस की बधाई दी और राष्ट्र निर्माण में उनकी भूमिका को रेखांकित किया। संदेशों में शिक्षकों को नई पीढ़ी के भविष्य का निर्माता बताते हुए उनके समर्पण और योगदान के प्रति सम्मान व्यक्त किया गया।
हर साल शिक्षक दिवस पर उत्कृष्ट शिक्षकों को राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार से सम्मानित किया जाता है
शिक्षक दिवस के अवसर पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु शनिवार को नई दिल्ली के विज्ञान भवन में 48 स्कूली शिक्षकों को राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार प्रदान करेंगी। समारोह के दौरान पुरस्कार प्राप्त करने वाले प्रत्येक शिक्षक के कार्य और उपलब्धियों पर आधारित लघु वृत्तचित्र भी प्रदर्शित किए जाएंगे। इनके माध्यम से यह बताया जाएगा कि संबंधित शिक्षकों ने स्कूली शिक्षा में किस तरह योगदान दिया और अपने विद्यार्थियों के जीवन में किस प्रकार सकारात्मक बदलाव लाया। शिक्षा मंत्रालय के स्कूल शिक्षा और साक्षरता विभाग की ओर से हर वर्ष शिक्षक दिवस पर देशभर के उत्कृष्ट शिक्षकों को राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार से सम्मानित किया जाता है। इन शिक्षकों का चयन कठोर, पारदर्शी और ऑनलाइन प्रक्रिया के माध्यम से किया जाता है। इसका उद्देश्य ऐसे शिक्षकों को पहचान देना है, जिन्होंने अपने पेशे के प्रति असाधारण समर्पण दिखाया और शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के साथ विद्यार्थियों के जीवन को बेहतर बनाने में उल्लेखनीय भूमिका निभाई।
राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार 2026 के लिए पात्र शिक्षकों को शिक्षा मंत्रालय के पोर्टल के माध्यम से ऑनलाइन स्वयं नामांकन करने का अवसर दिया गया था। नामांकन प्रक्रिया 15 जून से 20 जुलाई तक चली। इसके बाद जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर तीन चरणों वाली चयन प्रक्रिया के माध्यम से कुल 48 शिक्षकों का चयन किया गया। चयनित 48 शिक्षकों में 26 पुरुष और 22 महिलाएं हैं। ये शिक्षक देश के 27 राज्यों, सात केंद्र शासित प्रदेशों और केंद्र सरकार के छह संगठनों से चुने गए हैं। पुरस्कार का उद्देश्य उन शिक्षकों के योगदान को सामने लाना है, जिन्होंने बेहतर सीखने का वातावरण तैयार किया, शिक्षा के परिणामों में सुधार किया और विद्यार्थियों को नई दिशा देने के लिए नवाचार तथा समर्पण के साथ काम किया।
विज्ञान भवन में होने वाले समारोह में देशभर से चयनित शिक्षक एक साथ जुटेंगे। उनके कार्यों पर तैयार लघु वृत्तचित्र उनके नवाचार, उपलब्धियों और शिक्षण पद्धतियों से आए बदलाव को सामने लाएंगे। यह सम्मान केवल पुरस्कार पाने वाले शिक्षकों के लिए गौरव का अवसर नहीं होगा, बल्कि देश के लाखों शिक्षकों के योगदान को सम्मान देने का भी प्रतीक बनेगा।


















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