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बारिश ने फिर बढ़ाई पहाड़ की मुश्किलें, सड़कें बंद, भूस्खलन और उफनती नदियों से बढ़ा खतरा

पहाड़ में बारिश सिर्फ आसमान से गिरता पानी नहीं है। यहां हर तेज बौछार के साथ किसी सड़क के टूटने, किसी पहाड़ी के दरकने, किसी नदी-नाले के अचानक उफान पर आने और किसी गांव के बाकी दुनिया से कट जाने का खतरा साथ आता है। सितंबर शुरू होते ही उत्तराखंड में मौसम ने एक बार फिर यही तस्वीर सामने रख दी है। बीते कई दिनों से लगातार बारिश ने पहाड़ी जिलों में जनजीवन को प्रभावित किया है। सड़कें मलबे से पट रही हैं, बोल्डर गिर रहे हैं, नदियों का जलस्तर बढ़ रहा है और कई इलाकों में आवाजाही मुश्किल हुई है। 4 सितंबर तक प्रदेश में 108 सड़कें बंद होने की सूचना सामने आई थी, जबकि इससे पहले यह संख्या 150 से अधिक और एक समय 172 तक पहुंच गई थी। अब शनिवार को भी आठ जिलों में भारी बारिश की संभावना जताई गई है। यह तस्वीर किसी एक दिन की नहीं है। उत्तराखंड में मानसून के दौरान हर साल पहाड़ इसी तरह की चुनौती से जूझते हैं, लेकिन इस बार सितंबर की शुरुआत में फिर सक्रिय हुए मौसम ने उन पुराने जख्मों को कुरेद दिया है। पहाड़ों में सड़कें केवल आवागमन का साधन नहीं, बल्कि गांवों की जीवनरेखा हैं। इनके बंद होते ही स्कूल, अस्पताल, बाजार और रोजमर्रा की जरूरतों तक पहुंच प्रभावित होने लगती है। अल्मोड़ा इसका एक उदाहरण है। 

लगातार बारिश और भूस्खलन के कारण जिले की 23 ग्रामीण सड़कें बंद हुईं, जिनमें 15 को खोल दिया गया, लेकिन आठ सड़कें बंद रहने से 20 हजार से अधिक लोगों का जिला मुख्यालय से संपर्क प्रभावित हुआ। पिथौरागढ़ में भी बारिश के बाद मलबे, बोल्डर और पेड़ गिरने से कई मार्गों पर आवाजाही बाधित हुई। एक सितंबर को जिले में 12 ग्रामीण सड़कें बंद होने की सूचना थी। पहाड़ी क्षेत्रों में ऐसी स्थिति का सीधा असर उन लोगों पर पड़ता है जिन्हें इलाज, राशन, शिक्षा या जरूरी काम के लिए मुख्य बाजार अथवा जिला मुख्यालय तक पहुंचना होता है। रुद्रप्रयाग में भी मौसम की मार चारधाम यात्रा तक पहुंची। हाईवे पर मलबा आने से केदारनाथ यात्रा करीब दो घंटे प्रभावित रही। इसी जिले के बनतोली क्षेत्र में चट्टान टूटने से मोरखंडा नदी में भारी मलबा और पत्थर आने की सूचना सामने आई, जिससे मंदाकिनी के जलस्तर को लेकर भी चिंता बढ़ी। 

चमोली, पौड़ी और दूसरे पर्वतीय जिलों में भी बारिश के साथ भूस्खलन का खतरा लगातार बना हुआ है। 4 सितंबर को राज्य के कई हिस्सों में बारिश जारी रही और पौड़ी-देवप्रयाग तथा गोपेश्वर-चोपता समेत कई मार्ग प्रभावित हुए। हालांकि बदरीनाथ-ऋषिकेश मार्ग सहित अधिकांश राष्ट्रीय राजमार्ग यातायात के लिए खुले रहे। बंद मार्गों को खोलने के लिए जेसीबी मशीनों से लगातार काम किया जाता रहा। बारिश का असर सिर्फ सड़कों तक सीमित नहीं है। पहाड़ों से निकलने वाली नदियों और बरसाती गदेरों का जलस्तर बढ़ने के साथ निचले इलाकों में चिंता बढ़ जाती है। अलकनंदा, मंदाकिनी और गंगा समेत कई प्रमुख नदियां 4 सितंबर को कई स्थानों पर खतरे के निशान से करीब एक से दो मीटर नीचे बह रही थीं। इसका अर्थ यह है कि प्रशासन और स्थानीय लोगों के लिए नदी किनारे बसे क्षेत्रों में लगातार सतर्कता जरूरी बनी हुई है। 

इस बीच मौसम विभाग के पूर्वानुमान ने राहत की उम्मीद को भी पूरी तरह खत्म नहीं होने दिया है, लेकिन फिलहाल खतरा टला नहीं है। छह सितंबर को भी हरिद्वार, देहरादून, पौड़ी, चमोली, बागेश्वर और नैनीताल में भारी बारिश की संभावना है। साथ ही गरज-चमक और बिजली गिरने का खतरा भी बना हुआ है। यानी सितंबर की शुरुआत में मानसून कमजोर पड़ने की उम्मीदों के बीच उत्तराखंड में बारिश ने अभी पूरी तरह पीछा नहीं छोड़ा है। मौसम विभाग के एक पूर्वानुमान में 4 से 10 सितंबर के दौरान उत्तराखंड में व्यापक बारिश, आंधी-तूफान और बिजली गिरने की संभावना भी बताई गई है।

हर बारिश के साथ वही सवाल, कब मिलेगी पहाड़ को स्थायी राहत?

उत्तराखंड के लिए बारिश नई चुनौती नहीं है। समस्या यह है कि हर साल बारिश के दौरान सामने आने वाली परेशानियां कई जगह फिर उसी रूप में लौट आती हैं। सड़क टूटती है, मलबा आता है, यातायात रुकता है, मशीनें पहुंचती हैं, रास्ता खुलता है और अगली बारिश में वही समस्या दोबारा खड़ी हो जाती है। यही चक्र पहाड़ के लिए सबसे बड़ी चिंता है। इस साल मानसून में अब तक आपदा संबंधी घटनाओं में 54 लोगों की मौत और 44 मौतों को बारिश से जुड़ी घटनाओं से जोड़े जाने की रिपोर्ट सामने आई है। यह आंकड़ा बताता है कि चुनौती केवल बारिश की मात्रा की नहीं, बल्कि उसके अचानक और स्थानीय स्तर पर बेहद तीव्र असर की भी है। यही वजह है कि पहाड़ में मौसम को केवल वर्षा के आंकड़ों से नहीं समझा जा सकता। किसी एक घाटी में कुछ घंटों की तेज बारिश छोटी नदी को उफनती धारा में बदल सकती है। पहाड़ी ढलानों पर जमा पानी मिट्टी और पत्थरों को कमजोर कर सकता है। सड़क काटकर बनाए गए ढलानों पर दबाव बढ़ सकता है और देखते ही देखते मलबा सड़क पर आ सकता है। 

नैनीताल में 3 सितंबर को 217 मिलीमीटर बारिश दर्ज होने की रिपोर्ट सामने आई। उसी दौरान अलकनंदा और गंगा के जलस्तर को लेकर भी चिंता बढ़ी और प्रदेश में 152 सड़कें बंद होने की सूचना दी गई। देहरादून जैसे मैदानी और पहाड़ी भूगोल के संक्रमण वाले क्षेत्रों में भी बारिश का असर अलग तरीके से दिखाई देता है। सड़कें गड्ढों और जलभराव से प्रभावित होती हैं, जबकि पहाड़ी क्षेत्रों में यही बारिश भूस्खलन का रूप ले लेती है। यानी प्रदेश में बारिश का संकट एक जैसा नहीं है, लेकिन उसका असर व्यापक है। सबसे ज्यादा मुश्किल उन ग्रामीण इलाकों में होती है जहां वैकल्पिक सड़कें नहीं हैं। मुख्य मार्ग बंद हुआ तो पूरा क्षेत्र अलग-थलग पड़ जाता है। मरीजों को अस्पताल पहुंचाना चुनौती बन जाता है। किसान अपनी उपज बाजार तक नहीं ले जा पाते। बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती है और रोज मजदूरी करने वालों के सामने रोजगार का संकट खड़ा हो जाता है।

इसके बावजूद हर बारिश में स्थानीय लोगों के भीतर एक गहरी उम्मीद भी दिखाई देती है,सड़क जल्द खुलेगी, मलबा हट जाएगा और जिंदगी फिर सामान्य हो जाएगी। प्रशासन और विभाग भी मशीनों के साथ मोर्चे पर जुटते हैं। कई मार्ग कुछ घंटों में खुल जाते हैं, लेकिन जिन इलाकों में भूस्खलन लगातार हो रहा है, वहां अस्थायी समाधान पर्याप्त नहीं साबित होता। 

यही वजह है कि अब सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि बारिश में कितनी सड़कें बंद हुईं और कितनी खोल दी गईं। बड़ा सवाल यह है कि बार-बार भूस्खलन वाले स्थानों के लिए स्थायी उपचार कितना हुआ? संवेदनशील ढलानों का वैज्ञानिक उपचार कितना हुआ? जल निकासी की व्यवस्था कितनी मजबूत है? सड़कों के किनारे सुरक्षा दीवारों और नालियों की स्थिति क्या है? और सबसे अहम, क्या पिछले वर्षों की आपदाओं से सबक लेकर संवेदनशील क्षेत्रों का जोखिम कम किया गया है? उत्तराखंड में विकास और आपदा के बीच यही सबसे बड़ी चुनौती है। पहाड़ों में सड़कें भी चाहिए, पर्यटन भी चाहिए, गांवों तक संपर्क भी चाहिए और रोजगार भी। लेकिन विकास का तरीका ऐसा होना जरूरी है जो पहाड़ की भौगोलिक संवेदनशीलता को समझे। सड़क बनाने के बाद उसके किनारे पानी की निकासी, ढलान की सुरक्षा और मलबे के प्रबंधन की व्यवस्था उतनी ही जरूरी है। बारिश के दिनों में चारधाम और दूसरे पर्यटन स्थलों की यात्रा करने वालों के लिए भी यह चेतावनी महत्वपूर्ण है। सड़क खुली होने का अर्थ हमेशा यह नहीं कि पूरा मार्ग जोखिममुक्त है। पहाड़ में मौसम तेजी से बदल सकता है और ऊपर की ढलान से अचानक मलबा आने की स्थिति बन सकती है। 

इसलिए प्रशासन की सलाह, मौसम की चेतावनी और सड़क की ताजा स्थिति देखकर ही यात्रा करना जरूरी है। उत्तराखंड की पहाड़ियां बारिश को रोकती नहीं, उसे अपने भीतर समेटती हैं। लेकिन जब पानी की मात्रा, ढलान की कमजोरी और मानवीय हस्तक्षेप एक साथ आते हैं तो यही पानी आफत बन जाता है। इसलिए हर मानसून के बाद सिर्फ नुकसान का हिसाब नहीं, बल्कि उन कारणों का भी हिसाब होना चाहिए जो नुकसान को बार-बार जन्म देते हैं। फिलहाल सितंबर की बारिश ने पहाड़ को फिर सतर्क कर दिया है। सड़कें खुल रही हैं, मशीनें मलबा हटा रही हैं, प्रशासन निगरानी कर रहा है और मौसम विभाग लगातार चेतावनी जारी कर रहा है। लेकिन पहाड़ का असली सवाल इससे आगे का है, क्या अगली बारिश तक उन रास्तों, ढलानों और नालों को इतना सुरक्षित किया जा सकेगा कि बारिश फिर आए तो पहाड़ केवल भीगे, टूटे नहीं? यही सवाल इस पूरे मानसूनी दौर की सबसे बड़ी तस्वीर बनकर सामने आया है।

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