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उत्तराखंड में खत्म होगी पटवारी पुलिस की व्यवस्था, 2440 राजस्व गांवों को सिविल पुलिस के हवाले करने की तैयारी

उत्तराखंड में दशकों से चली आ रही पटवारी पुलिस व्यवस्था को पूरी तरह समाप्त कर नियमित सिविल पुलिस व्यवस्था लागू करने की दिशा में सरकार ने एक और महत्वपूर्ण कदम बढ़ाया है। राज्य के राजस्व पुलिस क्षेत्रों को चरणबद्ध तरीके से सिविल पुलिस के अधीन लाने की प्रक्रिया आगे बढ़ रही है। पहले चरण में बड़ी संख्या में राजस्व गांवों को नियमित पुलिस व्यवस्था से जोड़ा जा चुका है। अब सरकार ने दूसरे चरण के लिए भी व्यापक खाका तैयार कर लिया है। दूसरे चरण में प्रदेश के शेष 2440 राजस्व गांवों को सिविल पुलिस व्यवस्था के अधीन लाने की तैयारी है। इन क्षेत्रों में कानून-व्यवस्था को मजबूत करने के लिए नौ नए थाने और 44 पुलिस चौकियां स्थापित करने का प्रस्ताव तैयार किया गया है। प्रस्ताव को अमल में लाने के बाद इन इलाकों में पुलिस व्यवस्था पहले की तुलना में अधिक संगठित और प्रभावी हो सकेगी। उत्तराखंड में लंबे समय से राजस्व पुलिस की व्यवस्था चली आ रही है। राज्य गठन के बाद भी पर्वतीय और दूरस्थ क्षेत्रों के अनेक गांवों में पुलिसिंग की जिम्मेदारी राजस्व विभाग के अधिकारियों के पास रही। राजस्व पुलिस व्यवस्था के तहत पटवारी और तहसीलदार जैसे अधिकारी ही कई मामलों में पुलिस संबंधी जिम्मेदारियां निभाते थे। बदलते समय के साथ प्रदेश में आबादी, पर्यटन और आर्थिक गतिविधियों में तेजी से वृद्धि हुई है। ऐसे में कानून-व्यवस्था से जुड़ी चुनौतियां भी पहले की तुलना में बढ़ी हैं।

उत्तराखंड की भौगोलिक परिस्थितियां लंबे समय से राजस्व पुलिस व्यवस्था के पीछे एक प्रमुख कारण रही हैं। पर्वतीय क्षेत्रों में दूर-दराज बसे गांवों तक नियमित पुलिस की पहुंच बनाना आसान नहीं रहा। सीमित संसाधनों और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के कारण अंग्रेजी शासनकाल से चली आ रही व्यवस्था को लंबे समय तक जारी रखा गया। हालांकि राज्य गठन के बाद प्रदेश की परिस्थितियां तेजी से बदलीं और राजस्व पुलिस व्यवस्था में बदलाव की आवश्यकता लगातार महसूस की जाने लगी। पर्यटन प्रदेश होने के कारण उत्तराखंड में हर वर्ष बड़ी संख्या में देश-विदेश से पर्यटक पहुंचते हैं। चारधाम यात्रा, धार्मिक पर्यटन, साहसिक पर्यटन और पहाड़ी क्षेत्रों में बढ़ती पर्यटक गतिविधियों ने राज्य के दूरस्थ इलाकों को भी देश-दुनिया से जोड़ दिया है। इसके साथ ही इन क्षेत्रों में होटल, होमस्टे, निर्माण और अन्य व्यावसायिक गतिविधियों का विस्तार हुआ है। सरकार का मानना है कि बदलती परिस्थितियों में कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी विशेषज्ञ और नियमित पुलिस बल के हाथों में होना जरूरी है।

राजस्व क्षेत्रों में बढ़ती गतिविधियों के साथ अपराध की प्रकृति भी बदल रही है। पहले जहां छोटे-मोटे विवाद और स्थानीय स्तर के मामले अधिक सामने आते थे, वहीं अब पर्यटन और व्यावसायिक गतिविधियों के विस्तार के साथ चोरी, धोखाधड़ी, नशे से जुड़े मामले, महिला अपराध और अन्य आपराधिक घटनाओं की चुनौती भी सामने आती है। ऐसे मामलों की जांच और कार्रवाई के लिए प्रशिक्षित पुलिस तंत्र की आवश्यकता महसूस की जा रही है। धामी सरकार की योजना इसी आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए राजस्व पुलिस क्षेत्रों को चरणबद्ध तरीके से सिविल पुलिस के अधीन लाने की है। पहले चरण में 1983 राजस्व गांवों को सिविल पुलिस व्यवस्था में शामिल किया गया था। इसके बाद अब दूसरे चरण में शेष 2440 गांवों को भी नियमित पुलिस व्यवस्था से जोड़ने की तैयारी की जा रही है। इसके लिए नए थानों और चौकियों की स्थापना का प्रस्ताव महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

नए थानों और चौकियों से मजबूत होगी पुलिस व्यवस्था

दूसरे चरण में नौ नए थाने और 44 पुलिस चौकियां बनाए जाने का प्रस्ताव तैयार किया गया है। इसका उद्देश्य केवल राजस्व पुलिस को हटाना नहीं, बल्कि नए क्षेत्रों में सिविल पुलिस की स्थायी और प्रभावी मौजूदगी सुनिश्चित करना है। नए थाने और चौकियां बनने के बाद संबंधित क्षेत्रों में शिकायत दर्ज कराने, पुलिस सहायता हासिल करने, अपराध की जांच और कानून-व्यवस्था बनाए रखने की प्रक्रिया अधिक व्यवस्थित हो सकेगी। सिविल पुलिस व्यवस्था लागू होने से राजस्व क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को भी नियमित पुलिसिंग की सुविधाएं मिल सकेंगी। किसी घटना की स्थिति में पुलिस तक पहुंच आसान होगी और जांच की जिम्मेदारी प्रशिक्षित पुलिस अधिकारियों और कर्मचारियों के पास होगी। इससे अपराध की सूचना पर त्वरित कार्रवाई के साथ ही विवेचना की गुणवत्ता में सुधार आने की उम्मीद है। राजस्व पुलिस व्यवस्था की सबसे बड़ी विशेषता यह रही है कि राजस्व विभाग के कर्मचारी अपने मूल प्रशासनिक कार्यों के साथ पुलिसिंग की जिम्मेदारी भी संभालते रहे हैं। पटवारी का प्रमुख काम राजस्व और भूमि संबंधी मामलों से जुड़ा होता है, लेकिन राजस्व पुलिस व्यवस्था में उन्हें पुलिस से जुड़े कई दायित्व भी निभाने पड़ते हैं। बदलती परिस्थितियों में इन दोनों जिम्मेदारियों को अलग-अलग करने की जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही है।

सिविल पुलिस व्यवस्था के विस्तार से राजस्व अधिकारियों पर भी पुलिसिंग का अतिरिक्त दबाव कम होगा। पटवारी और अन्य राजस्व कर्मचारी अपने मूल विभागीय कार्यों पर अधिक ध्यान दे सकेंगे। वहीं पुलिस विभाग को नए क्षेत्रों में कानून-व्यवस्था संभालने के लिए आवश्यक मानव संसाधन और संसाधन उपलब्ध कराने की दिशा में काम करना होगा। उत्तराखंड में राजस्व पुलिस व्यवस्था को समाप्त करने की मांग समय-समय पर उठती रही है। राज्य के गठन के बाद यह मुद्दा कई बार चर्चा में आया। विशेष रूप से गंभीर आपराधिक मामलों और बदलती सामाजिक परिस्थितियों के बीच यह सवाल उठता रहा कि पुलिसिंग का काम प्रशिक्षित पुलिस बल को ही सौंपा जाना चाहिए। सरकार ने अब चरणबद्ध तरीके से इस व्यवस्था को बदलने की दिशा में कदम बढ़ाया है। इस बदलाव का असर केवल पुलिस व्यवस्था तक सीमित नहीं रहेगा। गांवों में कानून-व्यवस्था, अपराध नियंत्रण और आम लोगों की सुरक्षा से जुड़े तंत्र में भी बदलाव आएगा। खास तौर पर ऐसे क्षेत्र जहां पिछले कुछ वर्षों में पर्यटन और निर्माण गतिविधियां तेजी से बढ़ी हैं, वहां नियमित पुलिस व्यवस्था की जरूरत और अधिक महसूस की जा रही है।

हालांकि, नए थानों और चौकियों के गठन के साथ पुलिस बल की उपलब्धता, भवन, वाहन, संचार व्यवस्था और अन्य आधारभूत सुविधाओं को मजबूत करना भी बड़ी चुनौती होगी। पहाड़ी क्षेत्रों में भौगोलिक परिस्थितियों के कारण कई स्थानों तक पहुंच कठिन है। ऐसे में केवल थाने और चौकियां खोलना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि वहां पर्याप्त पुलिसकर्मियों की तैनाती और आधुनिक संसाधनों की उपलब्धता भी सुनिश्चित करनी होगी।

सरकार की प्रस्तावित योजना लागू होने के बाद उत्तराखंड के बड़े हिस्से में नियमित सिविल पुलिस व्यवस्था का विस्तार हो जाएगा। इससे दशकों पुरानी पटवारी पुलिस व्यवस्था धीरे-धीरे इतिहास का हिस्सा बन सकती है। पहले चरण में 1983 गांवों को सिविल पुलिस के अधीन लाने के बाद अब 2440 गांवों को शामिल करने की तैयारी इस दिशा में बड़ा कदम है।

नौ नए थानों और 44 पुलिस चौकियों के प्रस्ताव को इसी व्यापक बदलाव की कड़ी माना जा रहा है। यदि योजना निर्धारित रूप से लागू होती है तो उत्तराखंड में पुलिसिंग की पुरानी व्यवस्था में बड़ा परिवर्तन देखने को मिलेगा। इसका सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य यही होगा कि राज्य के दूरस्थ गांवों तक भी कानून-व्यवस्था की नियमित, प्रशिक्षित और जवाबदेह पुलिस व्यवस्था पहुंच सके तथा बदलते उत्तराखंड की सुरक्षा संबंधी जरूरतों के अनुरूप पुलिस तंत्र को मजबूत किया जा सके।

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