तमिलनाडु की राजनीति में एक बार फिर एक्टर की वापसी, फिल्मी दुनिया से सत्ता तक पहुंचे थलपति विजय 

तमिलनाडु की राजनीति ने एक बार फिर इतिहास को दोहराया है, जहां फिल्मी दुनिया से निकले एक बड़े चेहरे ने जनता के भरोसे को राजनीतिक ताकत में बदल दिया। अभिनेता से नेता बने थलपति विजय ने अपनी पार्टी तमिलगा वेट्री कड़गम (TVK) के जरिए वह कर दिखाया, जिसे लंबे समय तक असंभव माना जा रहा था। चुनाव से पहले जिस आंदोलन को विजय ने ‘ह्विसिल रिवोल्यूशन’ का नाम दिया था, वह अब वास्तविक सत्ता में बदलता नजर आ रहा है। फोर्ट सेंट जॉर्ज, जो तमिलनाडु की सत्ता का प्रतीक है, अब TVK के नियंत्रण में आने जा रहा है।यह जीत सिर्फ एक राजनीतिक सफलता नहीं है, बल्कि तमिलनाडु की दशकों पुरानी द्रविड़ राजनीति के वर्चस्व को चुनौती देने वाली ऐतिहासिक घटना है। पिछले 59 वर्षों में यह पहला मौका होगा, जब राज्य में DMK या AIADMK के अलावा कोई अन्य दल सत्ता में आने जा रहा है। इस बदलाव ने राज्य की राजनीतिक दिशा को पूरी तरह से बदल दिया है। 

विजय की इस जीत की तुलना स्वाभाविक रूप से तमिलनाडु के महान नेता और अभिनेता एम जी रामचंद्रन (एमजीआर) से की जा रही है। एमजीआर ने भी 1977 के विधानसभा चुनाव में अपने फिल्मी करिश्मे और जनता के प्यार को राजनीतिक ताकत में बदलते हुए ऐतिहासिक जीत हासिल की थी। उन्होंने 1972 में AIADMK की स्थापना की और कुछ ही वर्षों में राज्य की राजनीति में अपनी मजबूत पकड़ बना ली। 1987 में अपनी मृत्यु तक उन्होंने राज्य की राजनीति पर गहरा प्रभाव बनाए रखा। इसी तरह, विजय ने भी अपने प्रशंसकों के नेटवर्क को संगठित राजनीतिक ढांचे में बदलने का काम किया। हालांकि, दोनों के सफर में कुछ महत्वपूर्ण अंतर भी हैं। एमजीआर को अपनी पार्टी को मजबूत करने के लिए पांच साल का समय मिला था, जबकि विजय ने अपेक्षाकृत कम समय में ही यह उपलब्धि हासिल कर ली। तमिल लेखक और कार्यकर्ता मालन नारायणन के अनुसार, “दोनों नेताओं को शुरुआत में ‘फैंस की पार्टी’ चलाने के लिए आलोचना झेलनी पड़ी, लेकिन दोनों ने अपने जनाधार को मजबूत राजनीतिक समर्थन में बदल दिया।” तमिलनाडु की राजनीति में अभिनेता-राजनेताओं का इतिहास काफी पुराना रहा है। 

एन टी रामा राव (एनटीआर) का उदाहरण भी अक्सर दिया जाता है, जिन्होंने 1982 में तेलुगु देशम पार्टी की स्थापना के मात्र नौ महीने बाद सत्ता हासिल कर ली थी। इसी कड़ी में जयललिता का नाम भी प्रमुख है, जिन्होंने एक सफल अभिनेत्री से एक प्रभावशाली मुख्यमंत्री तक का सफर तय किया। हालांकि, हर फिल्म स्टार राजनीति में सफल नहीं हो सका। रजनीकांत और कमल हासन जैसे बड़े नाम भी राजनीतिक स्तर पर वैसी सफलता हासिल नहीं कर पाए, जैसी उनसे उम्मीद की जा रही थी। वहीं विजयकांत जरूर विपक्ष के नेता बनने में सफल रहे, लेकिन सत्ता तक नहीं पहुंच सके। विजय का राजनीतिक सफर अचानक शुरू नहीं हुआ। उन्होंने 2009 में अपने फैन क्लब ‘विजय मक्कल इयक्कम’ (VMI) के जरिए जमीनी स्तर पर काम शुरू कर दिया था। इसके बाद 2011 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने जे जयललिता के नेतृत्व वाली AIADMK का समर्थन किया, जिससे उनकी राजनीतिक समझ और रणनीति का संकेत मिला। इसके अलावा, उन्होंने सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर भी अपनी सक्रियता दिखाई। दिल्ली के रामलीला मैदान में जन लोकपाल आंदोलन के दौरान अन्ना हजारे से मुलाकात कर उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर भी एक संदेश देने की कोशिश की। 

उनकी फिल्मों ‘मर्सल’ और ‘थलाइवा’ में भी राजनीतिक संकेत स्पष्ट रूप से देखने को मिले। 2017 में ‘मर्सल’ की रिलीज के दौरान विजय ने अपनी छवि को और मजबूत करते हुए ‘इलैयाथलपति’ (युवा कमांडर) से ‘थलपति’ (कमांडर) की उपाधि अपनाई। यह सिर्फ एक नाम परिवर्तन नहीं था, बल्कि उनके राजनीतिक इरादों का संकेत भी माना गया। 2021 के स्थानीय निकाय चुनावों में विजय के संगठन ने 169 में से 115 सीटों पर जीत हासिल की, जो उनकी बढ़ती राजनीतिक ताकत का संकेत था। यही आधार आगे चलकर विधानसभा चुनाव में उनके लिए मजबूत नींव साबित हुआ। इस बार भले ही पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिला हो, लेकिन करीब 110 सीटों के साथ सरकार बनाने की स्थिति में आना अपने आप में बड़ी उपलब्धि है।

एमजीआर से तुलना के बीच विजय की नई राजनीतिक दिशा और चुनौतियां

विजय की इस ऐतिहासिक जीत के बाद उनकी तुलना लगातार एम जी रामचंद्रन से की जा रही है, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि असली चुनौती अब शुरू होती है। सत्ता तक पहुंचना एक बड़ी उपलब्धि है, लेकिन उसे संभालना और जनता की उम्मीदों पर खरा उतरना कहीं ज्यादा कठिन होता है। TVK के प्रवक्ता फेलिक्स गेराल्ड ने इस जीत का श्रेय पूरी तरह विजय को दिया। उनका कहना है कि जनता को अपने नेता पर पूरा भरोसा था और पार्टी को शुरू से ही इस तरह के परिणाम की उम्मीद थी। यह विश्वास ही इस जीत की सबसे बड़ी ताकत बना। 

विजय को अब गठबंधन की राजनीति को समझदारी से संभालना होगा। जिस तरह एमजीआर ने अपने समय में वामपंथी दलों के साथ संतुलन बनाकर सरकार चलाई, उसी तरह विजय को भी केंद्र सरकार के साथ टकराव से बचते हुए संतुलित रणनीति अपनानी होगी। तमिलनाडु की जनता ने इस बार बदलाव के लिए मतदान किया है और यह बदलाव सिर्फ चेहरों का नहीं, बल्कि राजनीति के तरीके का भी संकेत देता है। विजय के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती इस भरोसे को कायम रखने की होगी। उन्हें यह साबित करना होगा कि वे सिर्फ एक लोकप्रिय अभिनेता ही नहीं, बल्कि एक सक्षम प्रशासक भी हैं। इस जीत ने यह भी साबित कर दिया है कि भारतीय राजनीति में अब पारंपरिक ढांचे बदल रहे हैं। 

जनता नए विकल्पों को अपनाने के लिए तैयार है, बशर्ते उन्हें विश्वास और नेतृत्व की स्पष्ट दिशा मिले। विजय ने इस विश्वास को जीत में बदला है, लेकिन अब उनकी असली परीक्षा सत्ता के संचालन में होगी। अगर वे इस परीक्षा में सफल होते हैं, तो वे न सिर्फ एमजीआर की विरासत को आगे बढ़ाएंगे, बल्कि तमिलनाडु की राजनीति में एक नया अध्याय भी लिखेंगे।

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