केरल में बदलती राजनीतिक दिशा, यूडीएफ के पक्ष में जनादेश, देश में आखिरी वाम दलों का किला भी ढहा

केरल विधानसभा चुनाव की मतगणना के साथ ही राज्य की राजनीति में बड़े बदलाव के संकेत मिलने लगे हैं। सोमवार सुबह आठ बजे शुरू हुई वोटों की गिनती के शुरुआती छह घंटों में आए रुझानों ने स्पष्ट कर दिया कि कांग्रेस के नेतृत्व वाला यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) निर्णायक बढ़त की ओर बढ़ रहा है। 140 सदस्यीय विधानसभा में यूडीएफ 100 के आंकड़े को पार करने की दहलीज पर नजर आ रहा है, जबकि सत्तारूढ़ वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (एलडीएफ) काफी पीछे छूटता दिख रहा है। ताजा रुझानों के अनुसार यूडीएफ 101 सीटों पर आगे चल रहा है, वहीं एलडीएफ 40 से भी कम सीटों पर सिमटता नजर आ रहा है। 

यदि ये रुझान अंतिम परिणामों में बदलते हैं, तो यह केरल की राजनीति में बड़ा बदलाव साबित होगा। वाम मोर्चे के लिए यह हार सिर्फ एक चुनावी पराजय नहीं होगी, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी उसका प्रभाव कम होने का संकेत होगी, क्योंकि तब देश में उसका कोई भी मजबूत सत्ता वाला राज्य नहीं बचेगा। वहीं भाजपा नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) महज दो सीटों पर बढ़त बनाए हुए है, जिससे उसकी मौजूदगी सीमित ही दिख रही है। चुनाव परिणामों के बीच कई दिग्गज नेताओं की स्थिति भी चर्चा में है। मुख्यमंत्री पिनराई विजयन, जो शुरुआत में अपने पारंपरिक गढ़ धर्मदम सीट पर पीछे चल रहे थे, बाद में बढ़त बनाने में सफल रहे। 15 में से 12 दौर की मतगणना पूरी होने के बाद वे 8,000 से अधिक वोटों से आगे हो गए। 

हालांकि, एलडीएफ के कई मंत्री अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्रों में पिछड़ते नजर आए, जिनमें वीणा जॉर्ज, एम बी राजेश, आर बिंदु, पी राजीव और वी शिवनकुट्टी जैसे प्रमुख नाम शामिल हैं। इससे साफ संकेत मिल रहा है कि सत्ता विरोधी लहर का असर जमीनी स्तर तक पहुंचा है। दूसरी ओर, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रमेश चेन्निथला ने शानदार प्रदर्शन करते हुए अपने प्रतिद्वंद्वी को 23,000 से अधिक वोटों से हराया। यह जीत यूडीएफ के आत्मविश्वास को और मजबूत करती है। वहीं त्रिशूर सीट पर पद्मजा वेणुगोपाल को लगातार तीसरी बार हार का सामना करना पड़ा। पय्यन्नूर सीट से यूडीएफ समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार वी कुन्हीकृष्णन की जीत भी गठबंधन के पक्ष में माहौल को दर्शाती है। 

राज्यभर में कांग्रेस कार्यकर्ताओं के बीच उत्साह का माहौल है। शुरुआती रुझानों के बाद पार्टी कार्यालयों में ढोल-नगाड़ों के साथ जश्न मनाया गया। केरल प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष सनी जोसेफ ने इसे जनता द्वारा एलडीएफ सरकार की नीतियों के खिलाफ दिया गया स्पष्ट संदेश बताया। इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आईयूएमएल) ने भी यूडीएफ की बढ़त का श्रेय गठबंधन की एकजुटता को दिया, जहां वह खुद 27 में से 23 सीटों पर आगे चल रही है। इस बार चुनाव में सत्ता विरोधी लहर, भ्रष्टाचार के आरोप, प्रशासनिक मुद्दों पर जनता की नाराजगी और अल्पसंख्यक मतदाताओं का यूडीएफ की ओर झुकाव निर्णायक साबित हुआ है। कांग्रेस ने अपने अभियान में सामाजिक कल्याण योजनाओं और महिला मतदाताओं पर खास ध्यान दिया, जिसका सकारात्मक असर दिखाई दे रहा है।

एक दशक बाद सत्ता परिवर्तन के संकेत, परंपरा फिर दोहराने की ओर केरल

केरल विधानसभा चुनावों की मतगणना के बीच उभरते रुझानों ने राज्य की सियासत में एक बार फिर बड़े बदलाव के संकेत दे दिए हैं। शुरुआती आंकड़ों से यह साफ होता जा रहा है कि राज्य में लगभग एक दशक बाद सत्ता परिवर्तन की तस्वीर बन रही है। लंबे समय से चली आ रही राजनीतिक परंपरा जहां वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (एलडीएफ) और यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) बारी-बारी से सत्ता में आते रहे हैं इस बार भी दोहराई जाती नजर आ रही है। सोमवार सुबह आठ बजे से शुरू हुई मतगणना में जैसे-जैसे राउंड आगे बढ़े, यूडीएफ ने लगातार अपनी बढ़त मजबूत की। शुरुआती घंटों में ही मिले संकेतों ने यह स्पष्ट कर दिया कि मतदाता इस बार बदलाव के मूड में हैं। 

यूडीएफ कई सीटों पर निर्णायक बढ़त बनाता दिखा, जबकि सत्तारूढ़ एलडीएफ अपेक्षा के विपरीत पीछे छूटता नजर आया। केरल की राजनीति में सत्ता परिवर्तन का यह चक्र कोई नया नहीं है। पिछले कई दशकों से राज्य में मतदाता हर चुनाव में सरकार बदलने की परंपरा निभाते आए हैं। हालांकि, पिछली बार एलडीएफ ने इस ट्रेंड को तोड़ते हुए लगातार दूसरी बार सत्ता हासिल की थी, जिससे यह माना जा रहा था कि राज्य की राजनीति में बदलाव आ सकता है। लेकिन इस बार के रुझानों ने संकेत दिया है कि मतदाता फिर से पुराने पैटर्न की ओर लौटते दिख रहे हैं। इस संभावित सत्ता परिवर्तन के पीछे कई कारण बताए जा रहे हैं। सबसे प्रमुख वजह सत्ता विरोधी लहर मानी जा रही है, जो लंबे समय तक किसी भी सरकार के खिलाफ बनना स्वाभाविक है। इसके अलावा, राज्य में प्रशासनिक मुद्दों, भ्रष्टाचार के आरोपों और कुछ नीतिगत फैसलों को लेकर जनता में असंतोष भी देखने को मिला। इन सभी कारकों ने मिलकर एलडीएफ के लिए चुनौती खड़ी की। वहीं दूसरी ओर, यूडीएफ ने इस चुनाव में अपनी रणनीति को काफी प्रभावी तरीके से लागू किया। 

गठबंधन की एकजुटता, जमीनी स्तर पर मजबूत अभियान, और खासकर महिला एवं सामाजिक कल्याण से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाने का असर साफ तौर पर दिखाई दे रहा है। अल्पसंख्यक समुदायों का समर्थन भी यूडीएफ के पक्ष में जाता दिखा, जिसने उसकी स्थिति को और मजबूत किया।मतगणना फिलहाल राज्य के सभी 140 केंद्रों पर जारी है और हर राउंड के साथ तस्वीर और स्पष्ट होती जा रही है। हालांकि अंतिम परिणाम आने में अभी समय है, लेकिन मौजूदा रुझान सत्ता परिवर्तन की ओर इशारा कर रहे हैं। यदि यही ट्रेंड बरकरार रहता है, तो केरल में एक बार फिर राजनीतिक परंपरा कायम होगी और सत्ता का बदलाव तय माना जाएगा। अब सभी की नजरें अंतिम नतीजों पर टिकी हैं, जो यह तय करेंगे कि क्या वाकई केरल की राजनीति में एक बार फिर वही पुराना चक्र दोहराया जाएगा या आखिरी समय में कोई बड़ा उलटफेर देखने को मिलेगा। फिलहाल, संकेत साफ हैं केरल एक बार फिर बदलाव की दहलीज पर खड़ा है।

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