एक ऐसा हिमाचल, जहां आज हर 100 में करीब 99 से अधिक लोग पढ़ने-लिखने में सक्षम हैं, कभी देश के सबसे कम साक्षर राज्यों में गिना जाता था। आज उसी हिमाचल प्रदेश को शिक्षा के क्षेत्र में हासिल की गई इस ऐतिहासिक उपलब्धि के लिए दिल्ली में सम्मानित किया जाएगा। दिल्ली में अंतरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस के अवसर पर केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय की ओर से आयोजित कार्यक्रम में हिमाचल प्रदेश को पूर्ण साक्षरता हासिल करने के लिए सम्मान मिलेगा। प्रदेश के शिक्षा मंत्री रोहित ठाकुर यह सम्मान ग्रहण करेंगे। उन्हें कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में भी आमंत्रित किया गया है। हिमाचल प्रदेश की वर्तमान साक्षरता दर करीब 99.5 प्रतिशत पहुंच चुकी है। इस उपलब्धि ने प्रदेश को देश के अग्रणी राज्यों की कतार में खड़ा कर दिया है। साक्षरता दर के मामले में हिमाचल प्रदेश गोवा के बाद देश में दूसरे स्थान पर है।
पहाड़ी और दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों वाले राज्य के लिए यह उपलब्धि इसलिए और महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि शिक्षा की राह यहां कभी आसान नहीं रही। आज हिमाचल के गांवों, कस्बों और दूरदराज के पहाड़ी क्षेत्रों में शिक्षा की पहुंच सामान्य बात लगती है, लेकिन आजादी के शुरुआती वर्षों में तस्वीर बिल्कुल अलग थी। प्रदेश के सामने भौगोलिक कठिनाइयों के साथ-साथ संसाधनों की कमी और शिक्षा के सीमित अवसरों की बड़ी चुनौती थी। उस दौर में हिमाचल की साक्षरता दर करीब 5 प्रतिशत के आसपास थी। शिक्षा मंत्री रोहित ठाकुर ने इस उपलब्धि को हिमाचल के लिए गौरव का विषय बताते हुए कहा कि प्रदेश ने बेहद कम साक्षरता वाले राज्य से लगभग पूर्ण साक्षरता तक का सफर तय किया है। उन्होंने कहा कि यह बदलाव अचानक नहीं आया, बल्कि इसके पीछे दशकों की मेहनत, शिक्षा के क्षेत्र में निरंतर निवेश और सरकारों की प्राथमिकता रही है। रोहित ठाकुर के अनुसार, आजादी के समय पूरे देश की साक्षरता दर करीब 13 प्रतिशत थी, जबकि हिमाचल में यह लगभग 5 प्रतिशत थी। यानी प्रदेश उस समय देश के सबसे पिछड़े राज्यों में शामिल था।
ऐसे में करीब 99.5 प्रतिशत साक्षरता दर तक पहुंचना अपने आप में एक असाधारण परिवर्तन है। इस परिवर्तन की नींव हिमाचल प्रदेश के गठन और उसके शुरुआती विकास के दौर में ही रखी गई थी। प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री डॉ. यशवंत सिंह परमार ने शिक्षा को राज्य के विकास का महत्वपूर्ण आधार माना और ग्रामीण तथा दूरस्थ क्षेत्रों तक शिक्षा पहुंचाने की दिशा में मजबूत आधार तैयार किया। इसके बाद प्रदेश में आने वाली विभिन्न सरकारों ने भी शिक्षा को प्राथमिकता दी।हिमाचल में स्कूलों का विस्तार हुआ, नए शिक्षण संस्थान खोले गए और धीरे-धीरे शिक्षा की पहुंच उन इलाकों तक बनाई गई, जहां पहाड़ों की कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के कारण पहुंचना चुनौतीपूर्ण था। गांवों में विद्यालय खुलने से बच्चों को शिक्षा हासिल करने का अवसर मिला और आने वाली पीढ़ियों में पढ़ाई को लेकर जागरूकता बढ़ी।
कम साक्षरता वाले राज्य से 99.5 प्रतिशत तक पहुंचा हिमाचल प्रदेश
हिमाचल की साक्षरता की कहानी केवल आंकड़ों की कहानी नहीं है, बल्कि यह सामाजिक बदलाव की भी कहानी है। जब किसी राज्य में शिक्षा का स्तर बढ़ता है तो उसका असर केवल स्कूलों तक सीमित नहीं रहता। लोगों में जागरूकता बढ़ती है, रोजगार के अवसरों तक पहुंच आसान होती है और स्वास्थ्य, महिला सशक्तीकरण तथा सामाजिक विकास के क्षेत्र में भी सकारात्मक बदलाव देखने को मिलते हैं। प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा के विस्तार ने खास तौर पर सामाजिक परिवर्तन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले बच्चों को स्थानीय स्तर पर स्कूल उपलब्ध होने से उन्हें शिक्षा के लिए लंबी दूरी तय करने की जरूरत कम हुई। इससे स्कूलों में नामांकन बढ़ा और धीरे-धीरे शिक्षा जीवन का अभिन्न हिस्सा बनती चली गई। हिमाचल की इस उपलब्धि में महिलाओं की शिक्षा का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है। जैसे-जैसे लड़कियों की शिक्षा को लेकर समाज में जागरूकता बढ़ी, वैसे-वैसे महिला साक्षरता में भी सुधार आया। शिक्षित महिलाएं परिवार में बच्चों की शिक्षा के प्रति अधिक जागरूक हुईं और इसका सीधा असर अगली पीढ़ी पर पड़ा। शिक्षा के क्षेत्र में लगातार किए गए सरकारी निवेश ने भी इस बदलाव को गति दी। स्कूलों का विस्तार, शिक्षकों की उपलब्धता, शिक्षा संबंधी योजनाएं और दूरदराज के क्षेत्रों तक संस्थागत ढांचा पहुंचाने के प्रयासों ने प्रदेश की साक्षरता दर को लगातार ऊपर उठाया।
हिमाचल के लिए यह उपलब्धि इसलिए भी खास है क्योंकि प्रदेश की बड़ी आबादी पहाड़ी और दुर्गम क्षेत्रों में रहती है। कई गांव ऐसे रहे हैं जहां सड़क और परिवहन की सुविधाएं देर से पहुंचीं। इसके बावजूद शिक्षा का नेटवर्क लगातार मजबूत किया गया। कठिन परिस्थितियों में भी शिक्षकों, विद्यार्थियों और अभिभावकों के प्रयासों ने साक्षरता अभियान को आगे बढ़ाया। शिक्षा मंत्री रोहित ठाकुर ने इस उपलब्धि का श्रेय प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने में योगदान देने वाले सभी लोगों को दिया है। उन्होंने कहा कि हिमाचल को इस मुकाम तक पहुंचाने में पूर्व सरकारों और वर्तमान सरकार के साथ-साथ शिक्षकों, विद्यार्थियों, अभिभावकों और समाज की सामूहिक भूमिका रही है। हिमाचल प्रदेश की करीब 99.5 प्रतिशत साक्षरता दर अब दूसरे राज्यों के लिए भी उदाहरण बन सकती है। यह उपलब्धि बताती है कि यदि किसी राज्य में शिक्षा को लंबे समय तक प्राथमिकता दी जाए और लगातार संसाधन उपलब्ध कराए जाएं, तो पिछड़ेपन की स्थिति से निकलकर शिक्षा के क्षेत्र में नई ऊंचाइयां हासिल की जा सकती हैं।
अंतरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस पर दिल्ली में मिलने वाला सम्मान इसी लंबी यात्रा की सार्वजनिक पहचान है। यह सम्मान सिर्फ वर्तमान सरकार या किसी एक कार्यकाल की उपलब्धि नहीं माना जा रहा, बल्कि हिमाचल की कई दशकों की शैक्षिक यात्रा का परिणाम है। आज जब हिमाचल पूर्ण साक्षरता के करीब पहुंच चुका है, तब उसके सामने अगली चुनौती केवल लोगों को पढ़ना-लिखना सिखाने तक सीमित नहीं है। अब गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, डिजिटल साक्षरता, रोजगारपरक कौशल और उच्च शिक्षा तक समान पहुंच सुनिश्चित करना भी उतना ही महत्वपूर्ण होगा। करीब 99.5 प्रतिशत साक्षरता दर हिमाचल के लिए निश्चित रूप से गौरव का विषय है, लेकिन यह उपलब्धि राज्य के लिए आगे की जिम्मेदारी भी तय करती है। जिस प्रदेश ने कभी करीब 5 प्रतिशत साक्षरता से शुरुआत की थी, उसने आज लगभग हर नागरिक तक शिक्षा की रोशनी पहुंचाने का लंबा सफर तय कर लिया है। दिल्ली में मिलने वाला यह सम्मान उसी ऐतिहासिक बदलाव की गवाही देगा।


















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