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दिल्ली में पेइंग गेस्ट आवासों पर कसेगा शिकंजा, पुरानी इमारतों के लिए सुरक्षा प्रमाणपत्र होगा जरूरी

दक्षिण दिल्ली के सत्य निकेतन में पेइंग गेस्ट आवास वाली इमारत के ढहने की घटना ने राजधानी में पुराने भवनों की सुरक्षा और उनमें चल रही व्यावसायिक गतिविधियों को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हादसे के बाद दिल्ली सरकार ने पेइंग गेस्ट आवासों के लिए नई सुरक्षा नीति तैयार करने की दिशा में कदम बढ़ाने का फैसला किया है। सरकार की प्रस्तावित नीति में पुरानी इमारतों की संरचनात्मक मजबूती की जांच को अनिवार्य किए जाने की तैयारी है। इसके तहत इमारत मालिकों को संरचनात्मक जांच की रिपोर्ट जमा करने के साथ यह प्रमाणित करना होगा कि भवन सुरक्षित है। इसके बाद ही ऐसी इमारतों का इस्तेमाल पेइंग गेस्ट आवास, नर्सिंग होम, स्कूल या अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के रूप में किए जाने की अनुमति दी जा सकेगी। मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने सोमवार को कहा कि दिल्ली सरकार ऐसी नीति तैयार कर रही है, जिसका उद्देश्य राजधानी में पुराने भवनों में संचालित होने वाली विभिन्न व्यावसायिक गतिविधियों के लिए सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करना है। सरकार का जोर इस बात पर है कि किसी पुरानी इमारत का व्यावसायिक इस्तेमाल करने से पहले उसकी वास्तविक स्थिति की जांच हो और यह सुनिश्चित किया जाए कि वहां रहने या आने-जाने वाले लोगों की जान को खतरा न हो।

मुख्यमंत्री की घोषणा ऐसे समय हुई है, जब सत्य निकेतन में पेइंग गेस्ट आवास वाली इमारत के ढहने की घटना ने दिल्ली में भवनों की निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं। इस हादसे ने यह भी सामने ला दिया है कि राजधानी में बड़ी संख्या में पुराने भवनों का इस्तेमाल आवासीय और व्यावसायिक दोनों तरह के कामों के लिए किया जाता है। ऐसे में इन इमारतों की संरचनात्मक स्थिति की नियमित जांच और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है। सरकार की प्रस्तावित नीति में पुराने भवनों को लेकर विशेष प्रावधान किए जाने की बात कही गई है। इसके तहत भवन मालिकों को संरचनात्मक जांच से संबंधित रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी। इसके साथ ही भवन की सुरक्षा का प्रमाणपत्र भी देना होगा। सरकार का मानना है कि इस तरह की व्यवस्था लागू होने से कमजोर और असुरक्षित इमारतों में पेइंग गेस्ट आवास तथा अन्य व्यावसायिक गतिविधियां चलाने पर रोक लगाई जा सकेगी।

दिल्ली में पेइंग गेस्ट आवासों को नियंत्रित और नियमित करने की कोशिश कोई नई बात नहीं है। राजधानी में इन आवासों को नियमों के दायरे में लाने के प्रयास वर्ष 1993 से ही किए जा रहे हैं। यानी तीन दशक से अधिक समय से पीजी आवासों के नियमन को लेकर चर्चा और प्रयास होते रहे हैं, लेकिन अब तक इस दिशा में ऐसी व्यापक व्यवस्था लागू नहीं हो सकी है, जिससे पीजी आवासों को प्रभावी तरीके से नियंत्रित किया जा सके। सत्य निकेतन की घटना के बाद एक बार फिर यह मुद्दा दिल्ली सरकार के सामने प्रमुखता से आया है। सरकार अब पीजी आवासों की सुरक्षा को लेकर ऐसी नीति बनाने की तैयारी में है, जिसमें भवन की संरचनात्मक मजबूती को अहम आधार बनाया जाएगा। इससे उन इमारतों पर भी निगरानी बढ़ने की संभावना है, जिनका इस्तेमाल लंबे समय से अलग-अलग व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए किया जा रहा है।

मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता के बयान से साफ है कि सरकार केवल पेइंग गेस्ट आवासों तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि पुरानी इमारतों में संचालित अन्य संस्थानों की सुरक्षा को भी नीति के दायरे में लाने की तैयारी कर रही है। नर्सिंग होम, स्कूल और दूसरे व्यावसायिक प्रतिष्ठान भी इसके दायरे में आ सकते हैं। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होगा कि किसी भवन को सार्वजनिक उपयोग में लाने से पहले उसकी संरचनात्मक स्थिति की पर्याप्त जांच हो। सत्य निकेतन की घटना के बाद इस मुद्दे पर दिल्ली हाई कोर्ट में भी सुनवाई हुई। अदालत ने हादसे को गंभीरता से लेते हुए कहा कि इसके लिए केवल इमारत के मालिकों को ही जिम्मेदार नहीं माना जा सकता। हाई कोर्ट ने दिल्ली नगर निगम और दिल्ली विश्वविद्यालय की जवाबदेही का भी उल्लेख किया। अदालत की टिप्पणी से यह सवाल और महत्वपूर्ण हो गया है कि भवनों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी केवल भवन मालिकों की है या संबंधित सरकारी और संस्थागत एजेंसियों की भी इसमें भूमिका है।

हाई कोर्ट ने बचाव अभियान तेज करने का दिया निर्देश

सत्य निकेतन में इमारत ढहने की घटना पर सुनवाई के दौरान दिल्ली हाई कोर्ट ने बचाव अभियान में तेजी लाने पर जोर दिया। अदालत ने अधिकारियों से कहा कि बचाव कार्यों के प्रयासों को दोगुना किया जाए, ताकि मलबे में फंसे लोगों को जल्द से जल्द बाहर निकाला जा सके और अधिक से अधिक जानें बचाई जा सकें। हादसे के बाद राहत और बचाव कार्य प्रशासन के लिए सबसे बड़ी प्राथमिकता बना हुआ था। सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को आश्वासन दिया कि बचाव कार्यों के लिए सभी संभव कदम उठाए जा रहे हैं। प्रशासन की ओर से अदालत को बताया गया कि राहत और बचाव अभियान को प्रभावी तरीके से चलाने के लिए आवश्यक प्रयास किए जा रहे हैं। हाई कोर्ट ने प्रशासन से राहत और बचाव अभियान को और तेज करने का अनुरोध किया। अदालत की चिंता इस बात को लेकर थी कि मलबे में फंसे लोगों को जल्द से जल्द सुरक्षित बाहर निकाला जा सके। हादसे की गंभीरता को देखते हुए अदालत ने बचाव अभियान में किसी भी तरह की ढिलाई न बरतने पर जोर दिया।

सत्य निकेतन हादसे ने राजधानी में भवन सुरक्षा व्यवस्था को लेकर लंबे समय से चले आ रहे सवालों को फिर सामने ला दिया है। खासतौर पर उन पुरानी इमारतों को लेकर चिंता बढ़ी है, जिनमें बड़ी संख्या में लोग रहते हैं या जहां रोजाना लोगों की आवाजाही होती है। पेइंग गेस्ट आवासों में अलग-अलग स्थानों से आने वाले लोग रहते हैं, इसलिए भवन की सुरक्षा का महत्व और बढ़ जाता है।दिल्ली सरकार की प्रस्तावित नीति इसी चिंता को दूर करने की कोशिश के रूप में देखी जा रही है। यदि पुरानी इमारतों के लिए संरचनात्मक जांच और सुरक्षा प्रमाणपत्र की व्यवस्था लागू होती है, तो भवन मालिकों के लिए अपनी इमारत की वास्तविक स्थिति की जांच कराना जरूरी हो जाएगा। इससे असुरक्षित भवनों की पहचान करने और उनमें व्यावसायिक गतिविधियों पर रोक लगाने की दिशा में मदद मिल सकती है।

हालांकि, इस नीति को लागू करना सरकार के लिए बड़ी चुनौती भी होगा। दिल्ली में बड़ी संख्या में पुराने भवन हैं और कई इमारतों का इस्तेमाल अलग-अलग उद्देश्यों के लिए किया जाता है। ऐसे में उनकी जांच, रिपोर्ट तैयार करने और सुरक्षा प्रमाणपत्र जारी करने के लिए प्रभावी व्यवस्था बनानी होगी। साथ ही यह भी सुनिश्चित करना होगा कि नियम केवल कागजों तक सीमित न रहें और उनका जमीन पर सख्ती से पालन हो। पीजी आवासों के नियमन का मुद्दा वर्ष 1993 से लंबित रहा है। ऐसे में सत्य निकेतन हादसे के बाद सरकार की नई पहल से उम्मीद जगी है कि राजधानी में पेइंग गेस्ट आवासों की सुरक्षा को लेकर कोई ठोस व्यवस्था तैयार हो सकती है। 

मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता की घोषणा ने इस मुद्दे को एक बार फिर केंद्र में ला दिया है। अब नजर इस बात पर रहेगी कि प्रस्तावित नीति किस स्वरूप में सामने आती है और पुरानी इमारतों की सुरक्षा जांच तथा प्रमाणपत्र की व्यवस्था को किस तरह लागू किया जाता है। सत्य निकेतन की घटना ने यह संदेश भी दिया है कि भवनों की सुरक्षा को लेकर किसी भी स्तर पर लापरवाही भारी पड़ सकती है। ऐसे में सरकार, नगर निकाय और संबंधित संस्थाओं के साथ-साथ भवन मालिकों की जिम्मेदारी भी महत्वपूर्ण होगी। नई नीति का वास्तविक असर तभी दिखाई देगा, जब सुरक्षा मानकों की नियमित निगरानी हो और नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।

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