उत्तराखंड के सरकारी स्कूलों में “नो बैग डे” पर बच्चों के कंधों से उतरा बस्ते का बोझ

उत्तराखंड के सरकारी स्कूलों में शनिवार, 25 जुलाई का दिन इस बार बच्चों के लिए कुछ अलग और खास रहा। छात्रों को रोज की तरह भारी बस्ता लेकर स्कूल नहीं जाना होगा। किताबों, कॉपियों और गृहकार्य के दबाव से अलग यह दिन सीखने के नए अनुभवों हुआ, जहां पढ़ाई कक्षा की चारदीवारी से निकलकर खेल, कला, प्रयोग, संवाद और रचनात्मक गतिविधियों के माध्यम से हुई। इसका उद्देश्य बच्चों को केवल पाठ्यपुस्तकों तक सीमित रखना नहीं, बल्कि उनकी जिज्ञासा, रचनात्मकता, आत्मविश्वास और व्यवहारिक कौशल को विकसित करना है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के तहत राज्य में प्रत्येक माह के अंतिम शनिवार को ‘बस्ता रहित दिवस’ (नो बैग डे) मनाया जाएगा । इसी क्रम में राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एससीईआरटी) ने प्रदेश के सभी मुख्य शिक्षा अधिकारियों और जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थानों (डायट) के प्राचार्यों को निर्देश जारी करते हुए कहा है कि 25 जुलाई को यह कार्यक्रम प्रभावी ढंग से आयोजित किया जाए। परिषद ने स्पष्ट किया है कि इस दिन सभी विद्यालयों में निर्धारित गतिविधियों का पालन अनिवार्य रूप से किया जाएगा और केवल औपचारिकता निभाने की बजाय बच्चों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित की जाएगी। 

एससीईआरटी के अनुसार कार्यक्रम की शुरुआत “आनंदम” गतिविधियों से होगी। इसके बाद गतिविधि पुस्तिका में निर्धारित कार्यक्रमों के अनुसार बच्चों को विभिन्न रचनात्मक कार्यों में शामिल किया जाएगा। इन गतिविधियों का उद्देश्य विद्यार्थियों के मानसिक, सामाजिक और भावनात्मक विकास को बढ़ावा देना है। शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि जब बच्चे बिना किसी परीक्षा या पाठ्यपुस्तक के दबाव के सीखते हैं तो उनकी सीखने की क्षमता और समझ दोनों बेहतर होती हैं। ‘बस्ता रहित दिवस’ केवल एक दिन का आयोजन नहीं बल्कि शिक्षा व्यवस्था में बदलाव की सोच का हिस्सा है। नई शिक्षा नीति इस बात पर जोर देती है कि बच्चों को रटने की बजाय समझने, अनुभव करने और व्यवहारिक जीवन से जोड़कर पढ़ाया जाए। इसी सोच के तहत विद्यालयों में खेल आधारित शिक्षा, कला आधारित गतिविधियां, स्थानीय ज्ञान, हस्तकौशल, विज्ञान के सरल प्रयोग, कहानी लेखन, चित्रकला, समूह चर्चा और सांस्कृतिक गतिविधियों को बढ़ावा दिया जा रहा है। 

इस बार एससीईआरटी ने कार्यक्रम की निगरानी को लेकर भी सख्त रुख अपनाया है। सभी जिलों को निर्देश दिए गए हैं कि आयोजन के अधिकतम पांच फोटो और दो वीडियो गूगल ड्राइव लिंक के माध्यम से शाम चार बजे तक परिषद को भेजे जाएं। इसके अलावा जिला और राज्य स्तर पर भी कार्यक्रम के प्रभावी क्रियान्वयन की निगरानी की जाएगी। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सभी विद्यालयों में कार्यक्रम गंभीरता से आयोजित हो और बच्चे इसका वास्तविक लाभ प्राप्त कर सकें। शिक्षा विभाग के अधिकारियों का मानना है कि इस प्रकार की गतिविधियों से विद्यार्थियों की विद्यालय में उपस्थिति बढ़ेगी, पढ़ाई के प्रति सकारात्मक माहौल बनेगा और उनमें नई चीजें सीखने की उत्सुकता विकसित होगी। विशेष रूप से प्राथमिक और जूनियर कक्षाओं के बच्चों के लिए यह पहल काफी उपयोगी मानी जा रही है क्योंकि इस आयु में खेल और अनुभव के माध्यम से सीखना अधिक प्रभावी होता है।

खेल, कला और रचनात्मक गतिविधियों से पढ़ाई में बढ़ेगी बच्चों की रुचि

लगातार किताबों और गृहकार्य के दबाव के कारण कई बच्चों में पढ़ाई के प्रति तनाव और ऊब की भावना विकसित हो जाती है। ‘बस्ता रहित दिवस’ (नो बैग डे) इस स्थिति को बदलने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास है। इस दिन बच्चों को पारंपरिक पढ़ाई से कुछ समय की राहत मिलेगी और वे अपनी रुचि के अनुसार विभिन्न गतिविधियों में भाग ले सकेंगे। इससे उनका आत्मविश्वास बढ़ेगा और सीखने की प्रक्रिया अधिक सहज तथा आनंददायक बनेगी। विद्यालयों में चित्रकला, संगीत, नाटक, लोककला, विज्ञान प्रयोग, योग, खेलकूद, पर्यावरण संरक्षण, पौधारोपण, समूह चर्चा, प्रश्नोत्तरी, हस्तशिल्प, स्थानीय शिल्पकला और जीवन कौशल से जुड़ी गतिविधियां आयोजित की जाएंगी। 

इन कार्यक्रमों के माध्यम से बच्चों को केवल जानकारी ही नहीं मिलेगी, बल्कि टीम भावना, नेतृत्व क्षमता, संवाद कौशल और समस्या समाधान जैसे गुण भी विकसित होंगे। नई शिक्षा नीति का प्रमुख उद्देश्य बच्चों को केवल परीक्षा तक सीमित शिक्षा देने के बजाय जीवनोपयोगी शिक्षा प्रदान करना है। इसी कारण विद्यालयों में अनुभव आधारित शिक्षण पद्धति को लगातार बढ़ावा दिया जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि जब बच्चे स्वयं किसी गतिविधि में भाग लेते हैं तो वे उसे लंबे समय तक याद रखते हैं। यही कारण है कि आज दुनिया के कई देशों में भी गतिविधि आधारित शिक्षण को प्राथमिकता दी जा रही है। ‘बस्ता रहित दिवस’ का एक और महत्वपूर्ण उद्देश्य स्थानीय कला, संस्कृति और पारंपरिक ज्ञान से बच्चों को जोड़ना भी है। विद्यालय अपने क्षेत्र की विशेषताओं के अनुसार स्थानीय कलाकारों, कारीगरों और विशेषज्ञों को भी आमंत्रित कर सकते हैं ताकि बच्चे अपने आसपास के ज्ञान और कौशल से परिचित हो सकें।

 इससे उनमें स्थानीय संस्कृति के प्रति सम्मान और नई चीजें सीखने की प्रेरणा विकसित होगी। शिक्षा विभाग का मानना है कि यदि इस पहल का प्रभावी ढंग से क्रियान्वयन किया गया तो भविष्य में विद्यालयों का वातावरण अधिक रचनात्मक और विद्यार्थियों के अनुकूल बन सकेगा। इससे बच्चों के मानसिक तनाव में कमी आएगी, उनकी उपस्थिति में सुधार होगा और पढ़ाई के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित होगा। ‘बस्ता रहित दिवस’ केवल एक दिन के लिए बस्ता हटाने की पहल नहीं है, बल्कि यह शिक्षा को आनंददायक, व्यवहारिक और विद्यार्थी केंद्रित बनाने की दिशा में उठाया गया महत्वपूर्ण कदम है। यदि इस व्यवस्था को निरंतर प्रभावी ढंग से लागू किया गया तो आने वाले समय में प्रदेश के सरकारी विद्यालयों में शिक्षा की गुणवत्ता के साथ-साथ विद्यार्थियों की सीखने की क्षमता और रचनात्मक सोच में भी उल्लेखनीय सुधार देखने को मिल सकता है। नई शिक्षा नीति की भावना के अनुरूप यह पहल बच्चों को परीक्षा के दबाव से बाहर निकालकर सीखने का आनंद देने की दिशा में एक सार्थक प्रयास साबित हो सकती है।

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