संसद के मानसून सत्र के बीच बुधवार को हुई एक मुलाकात ने देश की राजनीति में नई चर्चा छेड़ दी। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार गुट) के प्रमुख शरद पवार ने संसद भवन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की। इस दौरान उनकी बेटी और पार्टी की वरिष्ठ नेता सुप्रिया सुले भी मौजूद रहीं। करीब 20 मिनट तक चली इस बैठक के दौरान प्रधानमंत्री ने शरद पवार का गर्मजोशी से स्वागत किया। मुलाकात के समय शरद पवार ने प्रधानमंत्री को एक पत्र भी सौंपा, लेकिन उस पत्र में क्या लिखा था और दोनों नेताओं के बीच किन मुद्दों पर चर्चा हुई, इसकी आधिकारिक जानकारी अभी सामने नहीं आई है। ऐसे में इस बैठक ने राजनीतिक गलियारों में अटकलों का दौर तेज कर दिया है। खासकर ऐसे समय में जब पिछले कई दिनों से यह चर्चा चल रही है कि क्या शरद पवार की पार्टी एनडीए के करीब जा रही है या फिर केंद्र सरकार किसी बड़े विधायी एजेंडे पर उनका समर्थन चाहती है।
इस मुलाकात का समय भी राजनीतिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। संसद में कई अहम विधेयकों और राजनीतिक मुद्दों पर बहस जारी है। ऐसे में प्रधानमंत्री और शरद पवार की आमने-सामने बैठक को सामान्य शिष्टाचार भेंट मानने के बजाय राजनीतिक रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है। हालांकि दोनों पक्षों की ओर से फिलहाल यही कहा गया है कि मुलाकात सौहार्दपूर्ण रही, लेकिन बातचीत के विषयों पर किसी ने भी खुलकर कुछ नहीं बताया। दिलचस्प बात यह है कि प्रधानमंत्री से मिलने से ठीक एक दिन पहले शरद पवार विपक्षी दलों की ओर से आयोजित प्रदर्शन में भी शामिल हुए थे। वे जंतर-मंतर पहुंचे और वहां प्रदर्शन कर रहे कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के नेता अभिजीत दिपके से मुलाकात की थी। इस वजह से यह सवाल और भी अहम हो गया है कि आखिर एक ओर विपक्ष के मंच पर सक्रियता और दूसरी ओर प्रधानमंत्री से अलग बैठक इन दोनों घटनाओं का राजनीतिक संदेश क्या है।
शरद पवार हमेशा से ऐसे नेता रहे हैं जो विभिन्न दलों के नेताओं से संवाद बनाए रखने के पक्षधर रहे हैं। अपने लंबे राजनीतिक जीवन में उन्होंने कई बार यह साबित किया है कि वैचारिक मतभेद के बावजूद संवाद के रास्ते खुले रखने चाहिए। यही कारण है कि प्रधानमंत्री मोदी और शरद पवार की मुलाकात को लेकर अलग-अलग तरह के राजनीतिक अर्थ निकाले जा रहे हैं। हाल के दिनों में यह चर्चा भी तेज रही है कि केंद्र सरकार जल्द ही परिसीमन से जुड़े बड़े फैसलों पर आगे बढ़ सकती है। माना जा रहा है कि ऐसे किसी भी महत्वपूर्ण विधेयक को संसद में पारित कराने के लिए सरकार को कुछ क्षेत्रीय दलों के समर्थन की आवश्यकता पड़ सकती है। इसी संदर्भ में एनसीपी (शरद पवार गुट) के आठ सांसदों की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जा रही है। राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा है कि प्रधानमंत्री और शरद पवार की मुलाकात में इसी विषय पर बातचीत हुई हो सकती है। हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि किसी भी पक्ष ने नहीं की है।
परिसीमन, एनडीए और सुप्रिया सुले के बयान से बढ़ा सस्पेंस
परिसीमन विधेयक को लेकर एनसीपी (शरद पवार गुट) का रुख पूरी तरह विरोध का नहीं माना जा रहा है। पार्टी की कार्यकारी अध्यक्ष और सांसद सुप्रिया सुले पहले ही संकेत दे चुकी हैं कि यदि देश की कुल लोकसभा सीटों में 50 प्रतिशत तक बढ़ोतरी की लिखित गारंटी दी जाती है, तो उनकी पार्टी इस प्रस्ताव पर सशर्त समर्थन देने पर विचार कर सकती है। इस बयान के बाद राजनीतिक चर्चाओं को और बल मिला कि सरकार और एनसीपी के बीच किसी स्तर पर संवाद जारी है। हालांकि, सुप्रिया सुले ने उन सभी अटकलों को सिरे से खारिज कर दिया है जिनमें एनसीपी (शरद पवार गुट) के एनडीए में शामिल होने या भाजपा के साथ विलय जैसी संभावनाएं जताई जा रही थीं। उन्होंने साफ कहा है कि उनकी पार्टी अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बनाए रखेगी और किसी गठबंधन में शामिल होने का फिलहाल कोई सवाल नहीं है।
इसके बावजूद बुधवार की मुलाकात ने इन बयानों के बावजूद नई राजनीतिक संभावनाओं को जन्म दे दिया है। विपक्षी दल इस बैठक पर नजर बनाए हुए हैं, जबकि भाजपा की ओर से भी फिलहाल कोई विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। ऐसे में यह सवाल बना हुआ है कि क्या यह केवल शिष्टाचार भेंट थी, किसी राज्य या राष्ट्रीय मुद्दे पर चर्चा हुई या फिर संसद के आगामी विधायी एजेंडे को लेकर कोई महत्वपूर्ण राजनीतिक संवाद हुआ। शरद पवार भारतीय राजनीति के उन नेताओं में गिने जाते हैं जिनकी स्वीकार्यता दलगत सीमाओं से परे मानी जाती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी कई मौकों पर उनके प्रशासनिक अनुभव और राजनीतिक समझ की सार्वजनिक रूप से सराहना कर चुके हैं। इसी वजह से दोनों नेताओं की मुलाकातें हमेशा राजनीतिक महत्व रखती हैं और उनके कई मायने निकाले जाते हैं।
संसद का मौजूदा सत्र कई महत्वपूर्ण राजनीतिक और विधायी फैसलों के लिहाज से अहम माना जा रहा है। ऐसे समय में यदि सरकार को किसी बड़े विधेयक पर अतिरिक्त समर्थन की जरूरत पड़ती है तो क्षेत्रीय दलों की भूमिका निर्णायक हो सकती है। एनसीपी (शरद पवार गुट) के सांसदों का रुख भी ऐसे मामलों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। फिलहाल इस मुलाकात के बाद सियासी गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म है, लेकिन जब तक प्रधानमंत्री कार्यालय या शरद पवार की ओर से बैठक के एजेंडे और पत्र की सामग्री को लेकर कोई आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आती, तब तक इन सभी संभावनाओं को केवल राजनीतिक अटकलें ही माना जाएगा। हालांकि इतना तय है कि संसद भवन में हुई यह 20 मिनट की मुलाकात आने वाले दिनों में राष्ट्रीय राजनीति की दिशा और विपक्ष सत्ता पक्ष के समीकरणों पर असर डाल सकती है।

















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