देहरादून-ऋषिकेश फोर/सिक्स लेन सड़क परियोजना के तहत सात मोड़ के जंगल में प्रस्तावित 4,369 पेड़ों की कटाई पर उत्तराखंड सरकार ने फिलहाल रोक लगा दी है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने स्पष्ट किया है कि स्थानीय लोगों, पर्यावरणविदों, जनप्रतिनिधियों और अन्य हितधारकों की चिंताओं को गंभीरता से देखते हुए यह निर्णय लिया गया है। उन्होंने कहा कि जब तक सभी पक्षों के बीच संतोषजनक सहमति और विश्वास का वातावरण नहीं बन जाता, तब तक पेड़ों का कटान नहीं किया जाएगा। हालांकि इस बीच 350 से अधिक पेड़ पहले ही काटे जा चुके हैं। धामी सरकार का यह फैसला ऐसे समय आया है, जब सात मोड़ क्षेत्र में पिछले 13 दिनों से लगातार आंदोलन चल रहा था।
स्थानीय नागरिक, छात्र, पर्यावरण प्रेमी और सामाजिक संगठन पेड़ों की कटाई का विरोध कर रहे थे। आंदोलनकारियों का कहना था कि सड़क चौड़ीकरण के नाम पर बड़ी संख्या में पेड़ों की कटाई से जंगल, वन्यजीवों और पर्यावरण को गंभीर नुकसान पहुंचेगा। यही वजह रही कि लगातार धरना-प्रदर्शन, विरोध मार्च और पेड़ों से चिपककर कटान रोकने जैसे अभियान चलाए गए। शुक्रवार को कांग्रेस सांसद और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के देहरादून दौरे के दौरान भी यह मुद्दा प्रमुखता से सामने आया। कार्यक्रम से लौटते समय सात मोड़ क्षेत्र में प्रदर्शनकारियों ने उनका काफिला रोककर हस्तक्षेप की मांग की।
राहुल गांधी ने प्रदर्शनकारियों को आश्वासन दिया कि वह इस विषय को संसद में उठाएंगे। इसके बाद यह मामला और अधिक चर्चा में आ गया। मुख्यमंत्री धामी ने कहा कि राज्य सरकार विकास कार्यों को गति देने के लिए प्रतिबद्ध है, लेकिन विकास की कीमत पर पर्यावरण और जनभावनाओं की अनदेखी नहीं की जा सकती। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड की प्राकृतिक धरोहर राज्य की सबसे बड़ी पहचान है और सरकार विकास तथा पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाए रखने की नीति पर काम कर रही है। मुख्यमंत्री ने इस पूरे मामले में प्रमुख सचिव और संबंधित अधिकारियों को दोबारा विस्तृत बातचीत की जिम्मेदारी सौंपी है। उन्होंने निर्देश दिए हैं कि स्थानीय नागरिकों, जनप्रतिनिधियों, पर्यावरण विशेषज्ञों, सामाजिक संगठनों और अन्य सभी संबंधित पक्षों के साथ खुलकर संवाद किया जाए।
सभी पक्षों के सुझाव और आपत्तियां सुनने के बाद ही आगे की कार्रवाई तय की जाएगी। धामी सरकार का मानना है कि किसी भी बड़े विकास कार्य में स्थानीय लोगों का विश्वास और सहभागिता सबसे महत्वपूर्ण है। इसलिए केवल प्रशासनिक प्रक्रिया पूरी कर लेने से काम नहीं चलेगा, बल्कि जनसहमति भी उतनी ही आवश्यक है। मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार संवाद के माध्यम से ऐसा समाधान तलाशना चाहती है, जिससे विकास भी प्रभावित न हो और पर्यावरण संरक्षण भी सुनिश्चित किया जा सके।
संवाद, पर्यावरण संरक्षण और विकास के संतुलन पर रहेगा सरकार का जोर
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि देहरादून-ऋषिकेश सड़क परियोजना राज्य के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे यातायात सुगम होगा, यात्रा का समय घटेगा और क्षेत्रीय विकास को नई गति मिलेगी। इसके बावजूद सरकार यह सुनिश्चित करना चाहती है कि परियोजना के कारण पर्यावरण को न्यूनतम नुकसान पहुंचे। उन्होंने बताया कि परियोजना में वन्यजीव संरक्षण को भी विशेष महत्व दिया गया है। हाथियों और अन्य वन्यजीवों के सुरक्षित आवागमन के लिए लगभग साढ़े तीन किलोमीटर लंबा हाथी अंडरपास बनाया जाएगा। इसके अलावा छोटे वन्यजीवों के लिए विशेष मार्ग और कल्वर्ट भी विकसित किए जाएंगे, ताकि जंगल के दोनों हिस्सों के बीच उनका आवागमन सुरक्षित बना रहे और मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाओं में कमी आए।
मुख्यमंत्री ने यह भी स्पष्ट किया कि इस परियोजना से जुड़े मामले में उच्च न्यायालय के सभी आदेशों और निर्देशों का पूरी तरह पालन किया जाएगा। आगे की प्रत्येक कार्रवाई निर्धारित कानूनी प्रक्रिया और पर्यावरणीय मानकों के अनुरूप ही होगी।उधर, सात मोड़ क्षेत्र में चला आंदोलन उत्तराखंड के हाल के प्रमुख पर्यावरण आंदोलनों में शामिल हो गया है। पिछले 13 दिनों से स्थानीय लोगों ने लगातार धरना दिया। कई बार प्रदर्शनकारी पेड़ों से चिपक गए और कटाई रोकने का प्रयास किया। इस दौरान राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण की टीम और आंदोलनकारियों के बीच कई बार तीखी बहस और नोकझोंक भी देखने को मिली। हरेला पर्व के अवसर पर भी आंदोलनकारियों ने विरोध का अनोखा तरीका अपनाया। जहां पूरे प्रदेश में हरियाली और पौधारोपण का संदेश दिया जा रहा था, वहीं सात मोड़ में प्रदर्शनकारियों ने ‘ब्लैक हरेला’ मनाकर सरकार के फैसले का विरोध किया।
लोगों ने पौधे लगाने के बजाय हाथों में काले पोस्टर और बैनर लेकर पर्यावरण संरक्षण की मांग उठाई। उत्तराखंड क्रांति दल सहित कई सामाजिक संगठनों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने भी इस आंदोलन को अपना समर्थन दिया। अब सरकार द्वारा पेड़ कटान पर अस्थायी रोक लगाए जाने के बाद आंदोलनकारियों ने इसे जनदबाव की पहली बड़ी सफलता माना है। हालांकि उनका कहना है कि केवल कटान रोकना पर्याप्त नहीं है, बल्कि परियोजना की रूपरेखा की दोबारा समीक्षा कर ऐसे विकल्प तलाशे जाने चाहिए, जिनसे जंगल और पर्यावरण को कम से कम नुकसान पहुंचे। फिलहाल सरकार और आंदोलनकारियों के बीच संवाद की नई प्रक्रिया शुरू होने की उम्मीद है। आने वाले दिनों में यही बातचीत तय करेगी कि सात मोड़ की सड़क परियोजना किस स्वरूप में आगे बढ़ेगी। राज्य सरकार ने साफ कर दिया है कि प्रकृति, जनभावनाओं और विकास तीनों के बीच संतुलन बनाते हुए ही अंतिम निर्णय लिया जाएगा।

















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