पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और लगातार सैन्य टकराव के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बड़ा बयान देकर दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। ट्रंप ने बुधवार को कहा कि ईरान के साथ संभावित समझौता अब भी “पूरी तरह संभव” है और पिछले 44 घंटों में दोनों देशों के बीच हुई बातचीत काफी सकारात्मक रही है। ऐसे समय में जब होर्मुज स्ट्रेट से लेकर खाड़ी क्षेत्र तक युद्ध जैसे हालात बने हुए हैं, ट्रंप का यह बयान वैश्विक राजनीति के लिए अहम संकेत माना जा रहा है। व्हाइट हाउस में आयोजित UFC Freedom 250 कार्यक्रम की झलक पेश करने के दौरान ओवल ऑफिस में पत्रकारों से बातचीत करते हुए ट्रंप ने कहा कि ईरान समझौता करना चाहता है और अमेरिका भी कूटनीतिक समाधान की दिशा में आगे बढ़ने को तैयार है। हालांकि उन्होंने साफ कर दिया कि किसी भी समझौते की सबसे बड़ी शर्त यही होगी कि ईरान परमाणु हथियार हासिल नहीं करेगा।
ट्रंप ने दावा किया कि हालिया सैन्य कार्रवाइयों के बाद ईरान की रणनीतिक ताकत गंभीर रूप से कमजोर हो चुकी है। उन्होंने कहा कि ईरान की नौसेना, वायुसेना और मिसाइल क्षमता को भारी नुकसान पहुंचा है। ट्रंप के मुताबिक, “उनके पास 159 जहाजों वाली नौसेना थी, अब लगभग सब तबाह हो चुके हैं। एयरफोर्स खत्म हो चुकी है, रडार सिस्टम नष्ट हो चुके हैं और उनकी मिसाइल क्षमता भी लगभग समाप्त हो गई है।” हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन ट्रंप के बयान से यह स्पष्ट है कि अमेरिका ईरान पर दबाव बनाए रखते हुए बातचीत की मेज पर समाधान तलाशना चाहता है। उन्होंने कहा कि हालात कठिन जरूर हैं, लेकिन कूटनीतिक रास्ता अब भी खुला हुआ है। दरअसल, पिछले कई महीनों से पश्चिम एशिया में हालात बेहद तनावपूर्ण बने हुए हैं। अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी, होर्मुज स्ट्रेट पर नियंत्रण को लेकर शक्ति संघर्ष और ईरान पर लगातार बढ़ता दबाव क्षेत्र को बड़े युद्ध की ओर धकेल रहा था।
इसी बीच अब अमेरिका और ईरान के बीच बैक-चैनल बातचीत में प्रगति की खबरों ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय को राहत की उम्मीद दी है। रिपोर्ट्स के अनुसार, दोनों देशों के बीच एक प्रारंभिक समझौते की रूपरेखा पर चर्चा चल रही है। अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट में दावा किया गया है कि “एक पन्ने के 14-बिंदुओं वाले समझौता ज्ञापन” पर काम हो रहा है। इसका मकसद तत्काल युद्धविराम लागू करना और अगले 30 दिनों तक व्यापक परमाणु वार्ता के लिए माहौल तैयार करना है। इस प्रस्तावित समझौते में सैन्य गतिविधियों को सीमित करने, समुद्री मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और परमाणु कार्यक्रम पर निगरानी बढ़ाने जैसे बिंदु शामिल हो सकते हैं। हालांकि अभी तक किसी भी पक्ष ने आधिकारिक तौर पर दस्तावेज सार्वजनिक नहीं किया है।
भारत के लिए क्यों अहम है अमेरिका-ईरान समझौते की संभावना?
पश्चिम एशिया में जारी तनाव का सबसे बड़ा असर तेल बाजार और वैश्विक व्यापार पर पड़ रहा है। भारत, जो अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के आयात से पूरा करता है, इस संकट से सीधे प्रभावित हो रहा है। अगर अमेरिका और ईरान के बीच समझौता आगे बढ़ता है और क्षेत्र में तनाव कम होता है, तो भारत को कई स्तरों पर राहत मिल सकती है। सबसे पहला फायदा कच्चे तेल की कीमतों में स्थिरता के रूप में देखने को मिल सकता है। होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल आपूर्ति मार्गों में से एक है और भारत का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से आने वाले तेल पर निर्भर करता है। युद्ध या नाकेबंदी की स्थिति में तेल की कीमतें तेजी से बढ़ सकती थीं, जिससे भारत में पेट्रोल-डीजल महंगा होता और महंगाई बढ़ती।
दूसरा बड़ा प्रभाव व्यापार और समुद्री परिवहन पर पड़ सकता है। पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने से भारतीय जहाजों और निर्यात-आयात गतिविधियों पर खतरा बढ़ गया था।
अगर समझौता होता है तो समुद्री मार्ग सुरक्षित होंगे और व्यापारिक लागत में कमी आ सकती है। भारत के लिए एक और महत्वपूर्ण पहलू वहां काम करने वाले लाखों भारतीय नागरिक हैं। खाड़ी देशों में बड़ी संख्या में भारतीय काम करते हैं और किसी बड़े युद्ध की स्थिति में उनकी सुरक्षा सबसे बड़ी चिंता बन सकती थी। ऐसे में कूटनीतिक समाधान भारत के लिए रणनीतिक राहत माना जाएगा। इस बीच अमेरिकी विदेश मंत्री Marco Rubio ने भी संकेत दिए हैं कि वॉशिंगटन अब व्यापक समाधान की दिशा में आगे बढ़ना चाहता है। उन्होंने कहा कि ईरान को “जमीनी हकीकत स्वीकार करनी होगी” और बातचीत की मेज पर लौटना होगा।
रुबियो ने यह भी स्पष्ट किया कि शुरुआती समझौता किसी अंतिम समाधान के बजाय व्यापक सिद्धांतों पर आधारित हो सकता है। अमेरिका फिलहाल दोहरी रणनीति पर काम कर रहा है। एक ओर सैन्य दबाव बनाए रखा जा रहा है, वहीं दूसरी ओर बातचीत के जरिए संकट को नियंत्रित करने की कोशिश हो रही है। ट्रंप प्रशासन यह संदेश देना चाहता है कि अगर ईरान परमाणु कार्यक्रम को सीमित करने पर सहमत होता है, तो तनाव कम किया जा सकता है। हालांकि स्थिति अब भी बेहद संवेदनशील बनी हुई है। किसी भी छोटी सैन्य घटना से बातचीत पटरी से उतर सकती है। लेकिन ट्रंप के ताजा बयान और बैक-चैनल वार्ता की खबरों ने यह संकेत जरूर दिया है कि दोनों पक्ष फिलहाल पूर्ण युद्ध से बचना चाहते हैं। अब पूरी दुनिया की नजर इस बात पर टिकी है कि क्या आने वाले दिनों में अमेरिका और ईरान किसी औपचारिक समझौते तक पहुंच पाएंगे या फिर पश्चिम एशिया एक बार फिर बड़े संघर्ष की आग में झुलस जाएगा।

















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