दोहरी मार : गर्मी से तप रहा देश, ऊपर से कमजोर मानसून की आशंका, अब ‘सुपर एल नीनो’ ने बढ़ाई टेंशन

देश इस वक्त दोहरी मार झेलने की तैयारी में दिखाई दे रहा है। एक तरफ मई खत्म होने से पहले ही कई राज्यों में तापमान 45 डिग्री के पार पहुंच रहा है, दूसरी तरफ मौसम वैज्ञानिक पहले ही कमजोर मानसून की आशंका जता चुके हैं। अब इन दोनों के बीच एक नया खतरा तेजी से चर्चा में है ‘सुपर एल नीनो’। दुनियाभर के वैज्ञानिक मान रहे हैं कि इस साल बनने वाला एल नीनो सामान्य नहीं, बल्कि पिछले कई दशकों के सबसे ताकतवर एल नीनो में बदल सकता है। अगर ऐसा हुआ तो भारत समेत दुनिया के कई देशों में मौसम का संतुलन बिगड़ सकता है।

वैज्ञानिकों के मुताबिक प्रशांत महासागर में समुद्री तापमान तेजी से बढ़ रहा है। यही बदलाव एल नीनो की शुरुआत माना जाता है। आम तौर पर एल नीनो हर कुछ वर्षों में आता है, लेकिन इस बार इसकी रफ्तार और शुरुआती संकेत वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ा रहे हैं। 

कई मौसम मॉडल बता रहे हैं कि 2026 का एल नीनो 1982-83, 1997-98 और 2015-16 जैसे बड़े एल नीनो की बराबरी कर सकता है। एल नीनो दरअसल एक प्राकृतिक जलवायु घटना है। यह तब बनती है जब प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से का पानी सामान्य से ज्यादा गर्म हो जाता है। समुद्र के तापमान में यह बदलाव दुनिया भर की हवाओं और मौसम के पैटर्न को प्रभावित करता है। इसका असर हजारों किलोमीटर दूर देशों तक दिखाई देता है। कहीं बारिश कम हो जाती है तो कहीं बाढ़ जैसे हालात बन जाते हैं। कई देशों में सूखा, जंगलों में आग और भीषण गर्मी का खतरा बढ़ जाता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि जब समुद्री तापमान सामान्य से 2 डिग्री सेल्सियस या उससे ज्यादा ऊपर चला जाए, तब स्थिति ‘सुपर एल नीनो’ कहलाती है। 

यह सामान्य एल नीनो की तुलना में कहीं ज्यादा खतरनाक माना जाता है। ऐसे समय में मौसम की चरम घटनाएं तेजी से बढ़ती हैं और कई देशों की अर्थव्यवस्था तक प्रभावित हो जाती है। अमेरिका की मौसम एजेंसी NOAA ने भी चेतावनी दी है कि इस साल एल नीनो काफी मजबूत रूप ले सकता है। एजेंसी के मुताबिक प्रशांत महासागर में तेजी से बदलाव दिखाई दे रहे हैं और साल के दूसरे हिस्से तक यह मजबूत या बहुत मजबूत स्थिति में पहुंच सकता है। समुद्री सतह का तापमान पहले ही सामान्य से ऊपर दर्ज किया जा रहा है।

सबसे बड़ी चिंता इस बार ला नीना से एल नीनो में तेजी से हो रहा बदलाव है। आमतौर पर यह प्रक्रिया धीरे-धीरे होती है, लेकिन इस बार समुद्री हालात तेजी से बदल रहे हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि ग्लोबल वार्मिंग के बढ़ते असर के साथ अगर सुपर एल नीनो बना तो दुनिया रिकॉर्ड तोड़ गर्मी का सामना कर सकती है। भारत के लिए खतरा सबसे ज्यादा मानसून को लेकर माना जा रहा है। देश की खेती और जल व्यवस्था काफी हद तक जून से सितंबर के बीच आने वाली दक्षिण-पश्चिम मानसूनी बारिश पर निर्भर करती है। एल नीनो मजबूत होने पर मानसूनी हवाएं कमजोर पड़ने लगती हैं, जिससे कई राज्यों में बारिश सामान्य से कम हो सकती है।

कमजोर बारिश, बढ़ती महंगाई और खेती पर संकट की आशंका

भारत में पहले भी सुपर एल नीनो के दौरान मानसून पर असर देखा जा चुका है। 1951 से 2022 के बीच जितने एल नीनो वर्ष आए, उनमें बड़ी संख्या में सामान्य से कम बारिश दर्ज की गई। देश के कई बड़े सूखे भी एल नीनो से जुड़े रहे हैं। मौसम विभाग पहले ही संकेत दे चुका है कि इस साल कई हिस्सों में बारिश कमजोर रह सकती है।

महाराष्ट्र, कर्नाटक, गुजरात, राजस्थान, आंध्र प्रदेश और ओडिशा जैसे राज्य एल नीनो के दौरान सबसे ज्यादा प्रभावित माने जाते हैं। इन इलाकों में सूखे और पानी की कमी का खतरा बढ़ जाता है। वहीं कुछ तटीय क्षेत्रों में अचानक भारी बारिश और बाढ़ जैसी स्थिति भी बन सकती है। 

कमजोर मानसून का सीधा असर खेती पर पड़ता है। धान, दालें, तिलहन, गन्ना और दूसरी फसलें पर्याप्त बारिश पर निर्भर रहती हैं। बारिश कम होने से उत्पादन घट सकता है और किसानों की लागत बढ़ सकती है। इसका असर आम लोगों की जेब पर भी दिखाई देता है। चावल, दाल, सब्जियां और खाने के तेल जैसी जरूरी चीजों की कीमतें बढ़ सकती हैं। 2015-16 के सुपर एल नीनो के दौरान भारत में मानसून सामान्य से काफी कमजोर रहा था। उस समय कई राज्यों में सूखे जैसे हालात बन गए थे। वहीं हाल के एल नीनो वर्षों में भीषण गर्मी, अनियमित बारिश और फसलों को नुकसान देखने को मिला था। दक्षिण भारत में आम और काजू की फसल प्रभावित हुई थी, जबकि पहाड़ी राज्यों में गर्म मौसम का असर सेब की खेती तक पर पड़ा था। 

इस बार बिजली संकट की आशंका भी जताई जा रही है। तापमान बढ़ने से एसी और कूलर का इस्तेमाल तेजी से बढ़ेगा, जिससे बिजली की मांग रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच सकती है। दूसरी ओर कमजोर मानसून के कारण जलाशयों में पानी कम हुआ तो हाइड्रो पावर उत्पादन भी प्रभावित हो सकता है। यानी मांग बढ़ेगी लेकिन सप्लाई पर दबाव रहेगा। फिलहाल दुनियाभर के वैज्ञानिक प्रशांत महासागर के तापमान और मौसम के पैटर्न पर लगातार नजर बनाए हुए हैं। आने वाले महीनों में स्थिति और साफ होगी, लेकिन शुरुआती संकेतों ने चिंता जरूर बढ़ा दी है। अगर सुपर एल नीनो ने ताकतवर रूप लिया तो इसका असर सिर्फ मौसम तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि खेती, महंगाई, बिजली और पूरी अर्थव्यवस्था पर दिखाई दे सकता है।

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