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दिल्ली-एनसीआर में सालभर चलेगा प्रदूषण के खिलाफ अभियान, परिवहन व्यवस्था में होगा बड़ा बदलाव 

दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण से निपटने की रणनीति अब केवल सर्दियों तक सीमित नहीं रहेगी। प्रदूषण बढ़ने के बाद पाबंदियां लगाने के बजाय पूरे साल हवा की गुणवत्ता सुधारने के लिए एयरशेड आधारित योजना पर काम किया जाएगा। इसके तहत दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के शहरों में सड़क ढांचे को बेहतर करने, इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने और सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को मजबूत करने पर विशेष जोर दिया जाएगा। इस दिशा में इस वर्ष करीब 3000 किलोमीटर सड़कों को शुरू से अंत तक पक्का करने और 3000 नई इलेक्ट्रिक बसें लाने का प्रस्ताव रखा गया है। दिल्ली में प्रदूषण की समस्या हर साल खास तौर पर अक्टूबर से जनवरी के बीच गंभीर हो जाती है। इस दौरान हवा की गति कम होने, पराली जलाने, वाहनों से निकलने वाले धुएं, निर्माण गतिविधियों और धूल जैसे कई कारणों से वायु गुणवत्ता खराब हो जाती है। इसके बाद प्रदूषण के स्तर के आधार पर अलग-अलग पाबंदियां लागू की जाती हैं। हालांकि, अब विशेषज्ञों और अधिकारियों का मानना है कि केवल सर्दियों में आपात कदम उठाने से समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकता। इसके लिए पूरे साल प्रदूषण के स्रोतों पर काम करना जरूरी है। 

एयरशेड आधारित व्यवस्था में प्रदूषण को किसी एक शहर या प्रशासनिक सीमा तक सीमित मानने के बजाय उस पूरे भौगोलिक क्षेत्र को ध्यान में रखा जाता है, जहां हवा के साथ प्रदूषक एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचते हैं। दिल्ली के आसपास के एनसीआर शहरों में होने वाली गतिविधियों का असर राजधानी की हवा पर भी पड़ता है। ऐसे में दिल्ली के साथ आसपास के क्षेत्रों में भी एक समान और समन्वित रणनीति अपनाने की जरूरत महसूस की जा रही है। इस प्रस्तावित योजना में सड़क निर्माण और रखरखाव को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति के अध्यक्ष विजय कुमार बिधूड़ी ने बताया कि इस वर्ष करीब 3000 किलोमीटर सड़कों को शुरू से आखिर तक पक्का करने का प्रस्ताव है। इसका उद्देश्य सड़कों से उड़ने वाली धूल को कम करना है। सड़क की खराब सतह, खुले किनारे और निर्माण सामग्री से निकलने वाली धूल लंबे समय तक हवा में मौजूद रह सकती है और स्थानीय स्तर पर प्रदूषण बढ़ा सकती है। सड़क सुधार के साथ-साथ सार्वजनिक परिवहन को प्रदूषण कम करने के प्रमुख साधन के तौर पर देखा जा रहा है। 

इसी क्रम में करीब 3000 नई इलेक्ट्रिक बसें लाने का प्रस्ताव है। इलेक्ट्रिक बसों के बढ़ने से सार्वजनिक परिवहन की क्षमता बढ़ेगी और पारंपरिक ईंधन से चलने वाले वाहनों पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है। इससे निजी वाहनों के इस्तेमाल को कम करने और यातायात से होने वाले उत्सर्जन पर नियंत्रण पाने की दिशा में भी मदद मिलने की उम्मीद है। पूरे साल की रणनीति का एक महत्वपूर्ण पहलू यह होगा कि प्रदूषण को केवल उस समय नियंत्रित करने की कोशिश न की जाए जब वायु गुणवत्ता बेहद खराब हो चुकी हो। इसके बजाय प्रदूषण के स्रोतों पर लगातार निगरानी और कार्रवाई की जाएगी। इसमें सड़क की धूल, वाहन उत्सर्जन, निर्माण एवं विध्वंस गतिविधियां, औद्योगिक प्रदूषण और अन्य स्थानीय स्रोतों को शामिल किया जा सकता है।

सर्दियों की पाबंदियों से आगे बढ़कर स्थायी समाधान पर जोर

इंटरनेशनल डे आफ क्लीन एयर फार ब्लू स्काईज के अवसर पर सोमवार को इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में आयोजित क्लीन एयर डायलाग्स में भी सालभर की कार्ययोजना की जरूरत पर चर्चा हुई। यह कार्यक्रम वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग के रिसोर्स लैब और राहगिरी फाउंडेशन की ओर से आयोजित किया गया था। कार्यक्रम में विशेषज्ञों और संबंधित क्षेत्रों से जुड़े वक्ताओं ने दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण नियंत्रण की मौजूदा व्यवस्था और भविष्य की रणनीति पर विचार रखे। वक्ताओं ने कहा कि अभी सर्दियों में प्रदूषण की स्थिति गंभीर होने पर ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान यानी ग्रेप के तहत अलग-अलग उपाय किए जाते हैं। प्रदूषण का स्तर बढ़ने के साथ निर्माण गतिविधियों पर रोक, वाहनों से संबंधित प्रतिबंध और अन्य आपात कदम उठाए जाते हैं। हालांकि, इस तरह की व्यवस्था मुख्य रूप से तत्काल स्थिति को संभालने पर केंद्रित रहती है। लंबे समय में प्रदूषण के स्रोतों को कम करने के लिए सालभर लगातार काम करने की आवश्यकता है।

एयरशेड आधारित दृष्टिकोण इसी जरूरत को ध्यान में रखता है। इसके तहत दिल्ली को अकेले देखकर योजना बनाने के बजाय पूरे एनसीआर और आसपास के प्रभावित क्षेत्रों को एक साझा वायु क्षेत्र के रूप में देखा जाएगा। प्रदूषण की आवाजाही और उसके स्रोतों को ध्यान में रखते हुए अलग-अलग विभागों और शहरों के बीच बेहतर तालमेल की जरूरत होगी। सड़क से उड़ने वाली धूल को कम करने के लिए बड़े पैमाने पर सड़कें पक्की करने की योजना इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा है। वहीं इलेक्ट्रिक बसों की संख्या बढ़ाने का उद्देश्य सार्वजनिक परिवहन को अधिक मजबूत और पर्यावरण के अनुकूल बनाना है। अधिकारियों के अनुसार, परिवहन क्षेत्र में बदलाव प्रदूषण नियंत्रण की दीर्घकालिक रणनीति में अहम भूमिका निभा सकता है।

दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण कई स्रोतों से पैदा होता है और मौसम बदलने के साथ इसका असर अलग-अलग तरीके से दिखाई देता है। इसलिए किसी एक मौसम में लगाए जाने वाले प्रतिबंधों से समस्या का स्थायी समाधान मुश्किल है। सालभर चलने वाली योजना में प्रदूषण के स्रोतों की पहचान, निगरानी, रोकथाम और उनके प्रभाव का आकलन लगातार किया जा सकता है। इस नई सोच का उद्देश्य यह है कि जब सर्दियों का प्रदूषण चरम पर पहुंचे, तब प्रशासन को केवल आपात प्रतिबंध लगाने की जरूरत न पड़े। यदि पूरे वर्ष सड़क की धूल, वाहन उत्सर्जन और अन्य स्रोतों को नियंत्रित करने के उपाय चलते रहें तो प्रदूषण के स्तर को पहले से कम रखने में मदद मिल सकती है। नई इलेक्ट्रिक बसों और सड़क सुधार की योजनाओं के साथ यह भी जरूरी होगा कि दिल्ली और एनसीआर के अलग-अलग शहरों में योजनाओं का क्रियान्वयन समान गति से हो। क्योंकि हवा किसी प्रशासनिक सीमा को नहीं मानती, इसलिए एक क्षेत्र में प्रदूषण कम करने के बावजूद आसपास के क्षेत्र से आने वाले प्रदूषकों का असर बना रह सकता है।

आने वाले समय में एयरशेड आधारित योजना के तहत दिल्ली-एनसीआर के विभिन्न विभागों के बीच समन्वय को भी मजबूत किए जाने की उम्मीद है। सड़क, परिवहन, नगर निकाय, उद्योग और पर्यावरण से जुड़े विभागों को एक साझा लक्ष्य के साथ काम करना होगा। इससे प्रदूषण नियंत्रण के प्रयासों को केवल सर्दियों की कार्रवाई के बजाय पूरे वर्ष चलने वाले अभियान का रूप दिया जा सकेगा। 3000 किलोमीटर सड़कों को पक्का करने और 3000 नई इलेक्ट्रिक बसें लाने का प्रस्ताव दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण नियंत्रण की दिशा में दीर्घकालिक बदलाव की ओर संकेत करता है। अब चुनौती इन योजनाओं को समयबद्ध तरीके से जमीन पर उतारने की होगी। यदि सालभर प्रदूषण के स्रोतों पर लगातार काम किया गया तो सर्दियों में हर साल सामने आने वाले गंभीर वायु प्रदूषण से निपटने के लिए केवल आपात प्रतिबंधों पर निर्भरता कम की जा सकती है।

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