Advertisement

नवाचार से बदली पढ़ाई की तस्वीर, राष्ट्रपति मुर्मु ने विज्ञान भवन में देश के 85 शिक्षकों को किया सम्मानित

कोई शिक्षक गांव-गांव जाकर बच्चों को दोबारा स्कूल से जोड़ रहा है, कोई कम लागत में विज्ञान की प्रयोगशाला तैयार कर रहा है, तो कोई क्यूआर कोड के माध्यम से पेड़-पौधों को पढ़ाई का हिस्सा बना रहा है। किसी ने जरूरतमंद छात्राओं की शिक्षा का जिम्मा उठाया तो किसी ने पुनर्चक्रित वस्तुओं से ऐसा विज्ञान और ज्ञान पार्क तैयार किया, जहां बच्चों को खेल-खेल में सीखने का अवसर मिल सके। शिक्षा के क्षेत्र में ऐसे ही अभिनव और अनुकरणीय कार्य करने वाले शिक्षकों को शिक्षक दिवस के अवसर पर राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किया गया।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने शनिवार, 5 सितंबर को नई दिल्ली के विज्ञान भवन में राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार प्रदान किए। इस वर्ष पुरस्कार के दायरे में स्कूली शिक्षा के साथ उच्च शिक्षा, पॉलिटेक्निक और कौशल प्रशिक्षण क्षेत्र से जुड़े शिक्षक भी शामिल रहे। शिक्षा मंत्रालय के अनुसार, स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता विभाग के 48 शिक्षक, उच्च शिक्षण संस्थानों और पॉलिटेक्निक के 21 शिक्षक एवं संकाय सदस्य तथा कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय के 16 प्रशिक्षकों को राष्ट्रीय सम्मान के लिए चुना गया। इस तरह इस वर्ष कुल 85 शिक्षकों और प्रशिक्षकों को सम्मान मिला।

राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार का उद्देश्य ऐसे शिक्षकों के योगदान को पहचान देना है, जिन्होंने अपने समर्पण, नवाचार और प्रभावी शिक्षण के माध्यम से विद्यार्थियों के सीखने के अनुभव को बेहतर बनाया है। पुरस्कारों के लिए शिक्षकों के कार्यों का विभिन्न स्तरों पर मूल्यांकन किया गया। राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार की आधिकारिक प्रक्रिया में जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर चयन तथा स्वतंत्र राष्ट्रीय निर्णायक मंडल की भूमिका शामिल रही। इस बार पुरस्कार पाने वाले शिक्षकों के कार्यों में तकनीक के इस्तेमाल के साथ-साथ सामुदायिक भागीदारी, बालिका शिक्षा, बुनियादी साक्षरता, विज्ञान शिक्षा, पर्यावरण जागरूकता और स्कूल से बाहर हो चुके बच्चों को दोबारा शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ने जैसे प्रयास प्रमुख रहे। इन शिक्षकों ने यह दिखाया कि सीमित संसाधनों के बावजूद रचनात्मक सोच और स्थानीय जरूरतों के अनुरूप किए गए प्रयास शिक्षा की गुणवत्ता में बड़ा बदलाव ला सकते हैं।

राजस्थान के झालावाड़ स्थित महात्मा गांधी राजकीय विद्यालय के दिव्येंदु सेन को शिक्षा में तकनीक और नवाचार के प्रभावी इस्तेमाल के लिए सम्मानित किया गया। उन्होंने आभासी जीव विज्ञान प्रयोगशाला, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित जीव विज्ञान शिक्षा और ‘ट्री टॉक’ जैसी क्यूआर कोड आधारित वनस्पति अध्ययन प्रणाली विकसित की। इन पहलों का उद्देश्य विद्यार्थियों को केवल किताबों तक सीमित रखने के बजाय उन्हें प्रयोग, अवलोकन और तकनीक के माध्यम से सीखने का अवसर देना है। ‘ट्री टॉक’ जैसी पहल विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इसमें पेड़-पौधों के बारे में जानकारी को क्यूआर कोड के माध्यम से विद्यार्थियों तक पहुंचाने की व्यवस्था की गई है। इससे स्कूल परिसर और आसपास मौजूद वनस्पतियां स्वयं सीखने की सामग्री बन जाती हैं। कम लागत में तैयार किए जा सकने वाले ऐसे समाधान सरकारी स्कूलों में विज्ञान और प्रौद्योगिकी की शिक्षा को अधिक प्रभावी बनाने की क्षमता रखते हैं।

छत्तीसगढ़ के खिचड़ी स्थित राजकीय मध्य विद्यालय की सुनीता यादव को ग्रामीण समुदाय के साथ मिलकर शिक्षा को मजबूत करने के प्रयासों के लिए राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार दिया गया। उन्होंने सामुदायिक भागीदारी के माध्यम से बच्चों की शिक्षा और पोषण दोनों पर काम किया। उनकी पहल ‘न्योता भोजन’ ने समुदाय को स्कूल से जोड़ने का काम किया और बाद में यह पहल राज्य के दूसरे क्षेत्रों तक भी पहुंची। सुनीता यादव के प्रयासों में घर-घर पुस्तक वाचन अभियान भी शामिल रहा। इसका उद्देश्य बच्चों में पढ़ने की आदत विकसित करने के साथ परिवारों को भी शिक्षा की प्रक्रिया से जोड़ना था। उनके विद्यालय ने मूलभूत साक्षरता और संख्या ज्ञान के क्षेत्र में शत-प्रतिशत लक्ष्य हासिल किया। उनके कार्यों को स्कूल के समग्र शैक्षिक विकास और ग्रामीण समुदाय को सशक्त बनाने के उदाहरण के तौर पर देखा गया।

महाराष्ट्र के नासिक की कुंडा जयवंत बछाव को विद्यार्थियों के लिए समान और नवोन्मेषी शैक्षणिक अवसर तैयार करने के लिए सम्मानित किया गया। उन्होंने जरूरतमंद छात्राओं की शिक्षा में व्यक्तिगत स्तर पर मदद की और उन्हें आगे पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया। उनके मार्गदर्शन से 150 से अधिक जरूरतमंद लड़कियों को आर्थिक तथा शैक्षणिक सहायता मिली। इससे कई छात्राओं को कम उम्र में विवाह के बजाय उच्च शिक्षा की ओर बढ़ने का अवसर मिला। बछाव ने सामुदायिक सहयोग और सामाजिक उत्तरदायित्व के माध्यम से 55 लाख रुपये से अधिक की सहायता राशि जुटाकर विद्यार्थियों की शिक्षा में सहयोग किया। उनके प्रयास केवल कक्षा तक सीमित नहीं रहे, बल्कि उन्होंने शिक्षा के माध्यम से सामाजिक बदलाव और बालिकाओं के आत्मनिर्भर भविष्य की दिशा में भी काम किया। उनके काम को समावेशी शिक्षा और समुदाय के भरोसे का उदाहरण माना गया है।

कम लागत के नवाचारों से विज्ञान शिक्षा को नई दिशा

चंडीगढ़ के राजकीय आदर्श माध्यमिक विद्यालय के रवि जायसवाल को नए और कम लागत वाले शिक्षण प्रयोगों के लिए राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उन्होंने ऐसे कई मॉडल विकसित किए, जिन्हें सीमित संसाधनों वाले विद्यालयों में भी अपनाया जा सकता है। इनमें सीवी रमन डोम थिएटर, वाहन पर स्थापित सचल विज्ञान प्रयोगशाला और पुनर्चक्रित वस्तुओं से तैयार संवादात्मक आउटडोर विज्ञान एवं ज्ञान पार्क प्रमुख हैं।

सचल विज्ञान प्रयोगशाला का उद्देश्य उन विद्यार्थियों तक प्रयोग आधारित विज्ञान शिक्षा पहुंचाना है, जिनके विद्यालयों में स्थायी प्रयोगशाला की सुविधा उपलब्ध नहीं है। वाहन पर प्रयोगशाला की व्यवस्था होने से इसे अलग-अलग स्कूलों और क्षेत्रों तक ले जाया जा सकता है। इस तरह विद्यार्थियों को विज्ञान केवल पढ़ने के बजाय उसे प्रयोग करके समझने का अवसर मिलता है।

पुनर्चक्रित वस्तुओं से तैयार विज्ञान एवं ज्ञान पार्क भी बच्चों के लिए सीखने का अलग अनुभव तैयार करता है। बेकार समझी जाने वाली वस्तुओं को शैक्षणिक गतिविधियों में बदलकर विद्यार्थियों को पर्यावरण संरक्षण, पुनर्चक्रण और रचनात्मक सोच से जोड़ा गया। ऐसे प्रयास यह संदेश देते हैं कि बेहतर शिक्षा के लिए हमेशा महंगे संसाधनों की जरूरत नहीं होती, बल्कि उपलब्ध साधनों का रचनात्मक उपयोग भी बड़ा बदलाव ला सकता है।

उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद स्थित राजकीय बालिका इंटर कॉलेज की रेनू त्रिपाठी को स्कूल छोड़ चुके और स्कूल से बाहर रह रहे बच्चों को दोबारा शिक्षा की मुख्यधारा में लाने के प्रयासों के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। उन्होंने करीब 60 गांवों में ऐसे बच्चों की पहचान और उन्हें विद्यालय तक वापस लाने के लिए काम किया। उनके प्रयासों में परिवारों से संपर्क, बच्चों की शिक्षा के प्रति जागरूकता और स्कूल में वापस लाने के लिए लगातार मार्गदर्शन जैसे कदम शामिल रहे। ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक, सामाजिक और पारिवारिक परिस्थितियों के कारण कई बच्चे पढ़ाई छोड़ देते हैं। ऐसे बच्चों तक पहुंचकर उन्हें दोबारा कक्षा में लाना शिक्षा व्यवस्था के सामने बड़ी चुनौती है। रेनू त्रिपाठी के प्रयास इसी चुनौती से निपटने का उदाहरण हैं।

राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार 2026 में उच्च शिक्षा और पॉलिटेक्निक क्षेत्र के 21 शिक्षकों एवं संकाय सदस्यों को भी सम्मानित किया गया। इनमें केंद्रीय उच्च शिक्षण संस्थानों से 12 शिक्षक, राज्य विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों से पांच और पॉलिटेक्निक संस्थानों से चार शिक्षक शामिल हैं। चयन में शिक्षण-अधिगम, अनुसंधान, नवाचार, विद्यार्थियों के मार्गदर्शन और समाज तक पहुंच जैसे विभिन्न पहलुओं को महत्व दिया गया। इसके अलावा कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय से जुड़े 16 प्रशिक्षकों को भी राष्ट्रीय सम्मान दिया गया। ये प्रशिक्षक देश के विभिन्न औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों और कौशल प्रशिक्षण संस्थानों से चुने गए हैं। इससे स्पष्ट है कि राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार का दायरा अब पारंपरिक स्कूल शिक्षा से आगे बढ़कर उच्च शिक्षा और कौशल विकास तक विस्तृत हो चुका है।

शिक्षक दिवस पर दिए गए ये पुरस्कार केवल व्यक्तिगत उपलब्धियों का सम्मान नहीं हैं, बल्कि देशभर के शिक्षकों को नवाचार, समावेशी शिक्षा और विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास के लिए प्रेरित करने का माध्यम भी हैं। राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित शिक्षकों की पहल यह दिखाती है कि एक शिक्षक केवल पाठ्यक्रम पूरा करने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि समाज और अगली पीढ़ी के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला मार्गदर्शक भी है। राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार की आधिकारिक जानकारी के अनुसार, यह सम्मान ऐसे शिक्षकों के योगदान को सार्वजनिक पहचान देने के लिए दिया जाता है, जिन्होंने विद्यार्थियों के जीवन को समृद्ध करने और शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने में उल्लेखनीय योगदान दिया हो। इस वर्ष के पुरस्कारों में विज्ञान और कृत्रिम बुद्धिमत्ता से लेकर पुस्तक वाचन, बालिका शिक्षा, सामुदायिक भागीदारी, पर्यावरण, पुनर्चक्रण और स्कूल से बाहर बच्चों की वापसी तक कई क्षेत्रों को जगह मिली है। यही विविधता इस साल के राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कारों को खास बनाती है। यह भी संदेश देती है कि शिक्षा में बदलाव केवल बड़ी योजनाओं से नहीं, बल्कि कक्षा और समुदाय के स्तर पर शिक्षक द्वारा किए गए छोटे-छोटे नवाचारों से भी संभव है। 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *