देश में रेल संपर्क और परिवहन क्षमता को बढ़ाने की दिशा में केंद्र सरकार ने बड़ा फैसला लिया है। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने बुधवार को नौ राज्यों में फैली आठ मल्टी-ट्रैकिंग रेल परियोजनाओं को मंजूरी दे दी। इन परियोजनाओं पर कुल 20,804 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत आएगी। रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने परियोजनाओं की जानकारी देते हुए कहा कि इनका उद्देश्य रेलवे के व्यस्त मार्गों पर क्षमता बढ़ाना, ट्रेनों की आवाजाही को सुगम बनाना और माल ढुलाई को तेज करना है। इन आठ परियोजनाओं में दक्षिण भारत से जुड़ी पांच और पूर्वी तथा पूर्वी-मध्य भारत से जुड़ी तीन परियोजनाएं शामिल हैं। इनके पूरा होने के बाद भारतीय रेलवे के मौजूदा नेटवर्क में करीब 1,196 किलोमीटर की वृद्धि होगी। परियोजनाओं का विस्तार तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तेलंगाना, पश्चिम बंगाल, झारखंड, ओडिशा, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ तक होगा।
दक्षिण भारत में प्रस्तावित पांच परियोजनाएं तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तेलंगाना के 17 जिलों से होकर गुजरेंगी। इन परियोजनाओं से करीब 540 किलोमीटर रेल नेटवर्क बढ़ेगा। इनमें अराक्कोणम-रेनीगुंटा तीसरी और चौथी लाइन, बंगारपेट तीसरी और चौथी लाइन, होसुर-ओमालूर रेलखंड का दोहरीकरण, सेलम-करूर-डिंडिगुल रेलखंड का दोहरीकरण तथा सिकंदराबाद (घाटकेसर)-काजीपेट मल्टी-ट्रैकिंग परियोजना शामिल है।
अराक्कोणम-रेनीगुंटा रेलखंड पर तीसरी और चौथी लाइन का निर्माण 77 किलोमीटर क्षेत्र में किया जाएगा। इसी तरह बंगारपेट में 47 किलोमीटर लंबे रेलखंड पर तीसरी और चौथी लाइन बनाई जाएगी। होसुर-ओमालूर के बीच 147 किलोमीटर रेलखंड का दोहरीकरण किया जाएगा। सेलम-करूर-डिंडिगुल के 159 किलोमीटर रेलखंड को भी दोहरीकरण के जरिए मजबूत किया जाएगा। सिकंदराबाद के घाटकेसर से काजीपेट तक 110 किलोमीटर क्षेत्र में मल्टी-ट्रैकिंग की जाएगी। केंद्र सरकार का मानना है कि दक्षिण भारत के इन रेलखंडों पर अतिरिक्त पटरियां बनने से यात्री और मालगाड़ियों के संचालन की क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि होगी। फिलहाल कई महत्वपूर्ण रेल मार्गों पर ट्रेनों की संख्या बढ़ने के कारण क्षमता पर दबाव बना हुआ है। ऐसे में तीसरी और चौथी लाइन तथा दोहरीकरण जैसी परियोजनाएं रेल यातायात को अलग-अलग पटरियों पर व्यवस्थित करने में मदद करेंगी।
इन परियोजनाओं का लाभ केवल रेल यात्रियों तक सीमित नहीं रहेगा। बेहतर रेल संपर्क से औद्योगिक क्षेत्रों, व्यापारिक केंद्रों और माल परिवहन से जुड़े इलाकों को भी फायदा मिलने की उम्मीद है। रेलवे की अतिरिक्त क्षमता का इस्तेमाल कृषि उत्पादों, औद्योगिक सामान और अन्य माल की तेज आवाजाही के लिए किया जा सकेगा। पूर्वी और पूर्वी-मध्य भारत के लिए भी मंत्रिमंडल ने तीन महत्वपूर्ण परियोजनाओं को मंजूरी दी है। इनमें खड़गपुर-झारसुगुड़ा (बागडेही) चौथी लाइन, कटनी-पेंड्रा रोड चौथी लाइन और बिलासपुर (उसलापुर)-पेंड्रा रोड तीसरी लाइन शामिल हैं।
इन परियोजनाओं का विस्तार पश्चिम बंगाल, झारखंड, ओडिशा, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के 14 जिलों तक होगा। सरकार के मुताबिक इन तीन परियोजनाओं से रेलवे के मौजूदा नेटवर्क में करीब 656 किलोमीटर की वृद्धि होगी। इस क्षेत्र में कोयला, खनिज, कृषि उत्पाद और औद्योगिक माल की आवाजाही बड़े पैमाने पर होती है। ऐसे में अतिरिक्त रेल लाइनों से मालगाड़ियों के संचालन की क्षमता बढ़ने और परिवहन व्यवस्था अधिक प्रभावी होने की उम्मीद है।
भीड़भाड़ वाले मार्गों पर चार लाइन बनाने की बड़ी योजना
रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा कि सरकार ने देश के अत्यधिक व्यस्त रेल नेटवर्क को ध्यान में रखते हुए बड़ी योजना तैयार की है। इसके तहत ऐसे मार्गों पर कम से कम चार रेल लाइनें उपलब्ध कराने की दिशा में काम किया जा रहा है, जहां यात्री और माल यातायात का दबाव सबसे ज्यादा है। बुधवार को मंजूर की गई परियोजनाओं को इसी व्यापक योजना का हिस्सा बताया गया है। रेलवे में मल्टी-ट्रैकिंग का सीधा फायदा ट्रेनों की आवाजाही को मिलेगा। किसी एक लाइन पर यात्री ट्रेन चलने के दौरान दूसरी लाइन पर मालगाड़ी या अन्य ट्रेन का संचालन किया जा सकेगा। इससे ट्रेनों को लंबे समय तक एक-दूसरे के पीछे चलने या रास्ते में रोकने की जरूरत कम होगी। परिणामस्वरूप रेल परिचालन की गति और समयबद्धता में सुधार आने की संभावना है। सरकार के अनुसार इन परियोजनाओं से नौ राज्यों की करीब एक करोड़ आबादी को बेहतर रेल संपर्क का लाभ मिलेगा। जिन क्षेत्रों से ये रेल लाइनें गुजरेंगी, वहां यात्रियों के लिए आवागमन के विकल्प बढ़ेंगे और प्रमुख शहरों तथा औद्योगिक क्षेत्रों से संपर्क मजबूत होगा। इसके साथ ही महानगरों और प्रमुख रेल मार्गों पर मौजूद भीड़ को कम करने में भी इन परियोजनाओं की भूमिका होगी।
मल्टी-ट्रैकिंग परियोजनाओं का एक बड़ा उद्देश्य माल परिवहन की क्षमता बढ़ाना भी है। सरकार को उम्मीद है कि इन परियोजनाओं के पूरा होने के बाद रेलवे के जरिए करीब 7.4 करोड़ टन अतिरिक्त माल की ढुलाई की जा सकेगी। इससे सड़क परिवहन पर निर्भरता कम करने और लंबी दूरी के माल परिवहन को रेल की ओर स्थानांतरित करने में मदद मिल सकती है। रेलवे के लिए यह कदम यात्री सुविधाओं के साथ-साथ आर्थिक गतिविधियों को गति देने के लिहाज से भी अहम है। अतिरिक्त रेल लाइनें बनने से मालगाड़ियों को अधिक आसानी से चलाया जा सकेगा। इससे बंदरगाहों, औद्योगिक क्षेत्रों, खनन क्षेत्रों और बड़े बाजारों के बीच माल की आवाजाही बेहतर होने की उम्मीद है।
किसी भी रेल मार्ग की क्षमता बढ़ाने के लिए नई लाइनों का निर्माण सबसे महत्वपूर्ण उपायों में से एक है। मौजूदा रेल नेटवर्क पर यात्री और मालगाड़ियों की संख्या बढ़ रही है। ऐसे में केवल नई ट्रेनों की घोषणा करने के बजाय बुनियादी ढांचे की क्षमता बढ़ाना जरूरी है। मल्टी-ट्रैकिंग परियोजनाएं इसी जरूरत को पूरा करती हैं। दक्षिण भारत की परियोजनाएं जहां प्रमुख शहरों और औद्योगिक क्षेत्रों के बीच संपर्क को मजबूत करेंगी, वहीं पूर्वी और मध्य भारत की परियोजनाएं खनिज तथा माल ढुलाई वाले महत्वपूर्ण गलियारों को अतिरिक्त क्षमता देंगी। इससे रेलवे के संचालन में अधिक लचीलापन आएगा और व्यस्त रेल मार्गों पर ट्रेनों को चलाने के लिए अतिरिक्त विकल्प उपलब्ध होंगे।
कुल मिलाकर, 20,804 करोड़ रुपये की इन आठ परियोजनाओं को मंजूरी रेलवे के बुनियादी ढांचे के विस्तार की दिशा में बड़ा कदम है। करीब 1,196 किलोमीटर अतिरिक्त रेल नेटवर्क बनने से नौ राज्यों में यात्री और माल परिवहन दोनों की क्षमता बढ़ेगी। सरकार की योजना व्यस्त मार्गों पर चार या उससे अधिक लाइनों का नेटवर्क तैयार करने की है, ताकि बढ़ते रेल यातायात को बेहतर तरीके से संभाला जा सके। आने वाले वर्षों में इन परियोजनाओं के पूरा होने से देश के कई महत्वपूर्ण रेल गलियारों पर ट्रेनों की रफ्तार, संचालन क्षमता और माल ढुलाई में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।


















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