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भारत की बड़ी कूटनीतिक पहल, दिल्ली में आयोजित एससीओ के मंच पर पाकिस्तान को भी बुलावा

भारत और पाकिस्तान के बीच राजनीतिक तनाव के बावजूद सांस्कृतिक संवाद के लिए एक महत्वपूर्ण पहल होने जा रही है। भारत 20 से 22 नवंबर 2026 तक नई दिल्ली में पहली बार शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) सभ्यतागत संवाद मंच की मेजबानी करेगा। इस तीन दिवसीय आयोजन में संगठन के सभी 10 सदस्य देशों को आमंत्रित किया गया है। इनमें पाकिस्तान भी शामिल है। भारत की ओर से पाकिस्तान के राष्ट्रीय विरासत एवं संस्कृति मंत्री औरंगजेब खान खिची को भी मंच में भाग लेने के लिए निमंत्रण भेजा गया है। इस आयोजन का उद्देश्य सदस्य देशों के बीच सांस्कृतिक संबंधों को मजबूत करना और सदियों पुरानी साझा सभ्यताओं, परंपराओं तथा ऐतिहासिक विरासत के माध्यम से आपसी समझ को बढ़ावा देना है।इस मंच को भारत की उस कूटनीतिक पहल के रूप में देखा जा रहा है, जिसमें सांस्कृतिक विरासत और सभ्यतागत जुड़ाव को क्षेत्रीय सहयोग का आधार बनाने पर जोर दिया जा रहा है। एससीओ के सदस्य देशों के बीच भौगोलिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक स्तर पर कई समानताएं रही हैं। प्राचीन व्यापार मार्गों, साहित्य, कला, संगीत, स्थापत्य और धार्मिक परंपराओं ने इन क्षेत्रों के समाजों को अलग-अलग दौर में एक-दूसरे से जोड़ा है। ऐसे में नई दिल्ली में आयोजित होने वाला यह संवाद मंच इन साझा संबंधों को सामने लाने और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के नए अवसर तलाशने का माध्यम बन सकता है।

इस आयोजन की खास बात यह है कि भारत ने इसमें पाकिस्तान को भी शामिल होने का निमंत्रण दिया है। दोनों देशों के संबंध लंबे समय से तनावपूर्ण रहे हैं और राजनीतिक तथा सुरक्षा संबंधी मुद्दों का असर द्विपक्षीय संपर्कों पर भी पड़ा है। ऐसे माहौल में पाकिस्तान के संस्कृति मंत्री को आमंत्रित किया जाना सांस्कृतिक संवाद के लिए एक अलग अवसर उपलब्ध कराने की पहल है। हालांकि, निमंत्रण भेजे जाने का अर्थ यह नहीं है कि पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल की भागीदारी की पुष्टि हो गई है। उसकी वास्तविक भागीदारी को लेकर स्थिति संबंधित पक्षों की प्रतिक्रिया के बाद ही स्पष्ट होगी।

आयोजन के लिए संस्कृति मंत्रालय और विदेश मंत्रालय मिलकर काम करेंगे। नई दिल्ली में इसके आयोजन स्थल के रूप में पुराने किले का नाम सामने आया है, हालांकि स्थल को लेकर अंतिम पुष्टि की स्थिति स्पष्ट होना बाकी है। ऐतिहासिक महत्व वाले स्थान पर इस तरह का आयोजन भारत की सांस्कृतिक विरासत को अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रस्तुत करने का अवसर भी दे सकता है।

भारत की मेजबानी में होने वाला यह पहला एससीओ सभ्यतागत संवाद मंच संगठन के सदस्य देशों को अपनी सांस्कृतिक पहचान, ऐतिहासिक अनुभव और परंपराओं को साझा करने के लिए एक साझा मंच उपलब्ध कराएगा। इसका महत्व केवल सांस्कृतिक कार्यक्रम तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे क्षेत्रीय स्तर पर संवाद और सहयोग को व्यापक बनाने के प्रयास के रूप में भी देखा जा रहा है।

पीएम मोदी ने एससीओ शिखर सम्मेलन में रखा था प्रस्ताव, साझा विरासत पर होगा जोर

इस संवाद मंच की अवधारणा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सितंबर 2025 में चीन के तियानजिन में आयोजित एससीओ शिखर सम्मेलन के दौरान प्रस्तुत की थी। प्रस्ताव के पीछे सदस्य देशों की साझा सभ्यतागत विरासत को संवाद और सहयोग का आधार बनाने की सोच थी। अब नवंबर 2026 में नई दिल्ली में होने वाला आयोजन इसी विचार को आगे बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। एससीओ यूरेशियाई क्षेत्र का एक प्रमुख बहुपक्षीय संगठन है, जिसके सदस्य देशों के बीच सुरक्षा, आर्थिक सहयोग, क्षेत्रीय स्थिरता और लोगों के बीच संपर्क जैसे विषयों पर सहयोग होता है। सभ्यतागत संवाद मंच के माध्यम से इस सहयोग में सांस्कृतिक आयाम को अधिक प्रमुखता देने की कोशिश की जाएगी। कला, साहित्य, ऐतिहासिक स्मारकों, पारंपरिक ज्ञान, लोक संस्कृति और विभिन्न समाजों की विरासत से जुड़े विषय इस तरह के संवाद का हिस्सा बन सकते हैं।

इस आयोजन में रूस, चीन, भारत, पाकिस्तान, ईरान, बेलारूस, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान और उज्बेकिस्तान सहित एससीओ के सभी 10 सदस्य देशों को आमंत्रित किया गया है। इन देशों का इतिहास मध्य एशिया, दक्षिण एशिया, पूर्वी एशिया और यूरोप के विभिन्न सांस्कृतिक प्रभावों से जुड़ा रहा है। प्राचीन व्यापार मार्गों और ऐतिहासिक संपर्कों ने इन क्षेत्रों में विचारों, कलाओं, भाषाओं और परंपराओं के आदान-प्रदान को बढ़ावा दिया। मंच पर इन साझा ऐतिहासिक संबंधों को नए नजरिये से समझने का अवसर मिल सकता है।

भारत के लिए यह आयोजन अपनी बहुलतावादी सांस्कृतिक परंपरा, ऐतिहासिक धरोहर और कला-साहित्य की समृद्ध विरासत को अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधियों के सामने प्रस्तुत करने का अवसर भी होगा। साथ ही, सदस्य देशों के सांस्कृतिक संस्थानों, विशेषज्ञों और प्रतिनिधियों के बीच संपर्क बढ़ने से भविष्य में संयुक्त प्रदर्शनियों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों, शोध और विरासत संरक्षण से जुड़ी पहलों की संभावनाएं बन सकती हैं।

इस पहल का एक व्यापक उद्देश्य यह भी है कि देशों के बीच मतभेदों के बावजूद संवाद के ऐसे रास्ते खुले रहें, जिनसे समाजों के बीच परस्पर समझ विकसित हो सके। सांस्कृतिक संबंध हमेशा राजनीतिक विवादों को समाप्त नहीं कर सकते, लेकिन वे बातचीत के लिए अतिरिक्त अवसर उपलब्ध करा सकते हैं। इसी कारण सभ्यतागत संवाद को क्षेत्रीय सहयोग के एक पूरक माध्यम के रूप में देखा जा रहा है।

नई दिल्ली में होने वाला यह मंच कितना प्रभावी साबित होगा, यह सदस्य देशों की भागीदारी, चर्चा के विषयों और आगे तय की जाने वाली गतिविधियों पर निर्भर करेगा। फिलहाल, सभी सदस्य देशों को निमंत्रण और पाकिस्तान के संस्कृति मंत्री को आमंत्रित किए जाने से यह आयोजन क्षेत्रीय कूटनीति के लिहाज से भी चर्चा में है। नवंबर में होने वाली इस बैठक से साझा सांस्कृतिक विरासत को सामने लाने के साथ-साथ एससीओ देशों के बीच आपसी संवाद को नई दिशा मिलने की उम्मीद है।

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