दिवाली का त्योहार खुशियां, खरीदारी, मिठाइयां, नए कपड़े और अपनों को उपहार देने का अवसर लेकर आता है। इस दौरान घर की सजावट से लेकर पूजा-पाठ और मेहमानों की खातिरदारी तक कई तरह के खर्च बढ़ जाते हैं। त्योहार के उत्साह में लोग अक्सर अपनी जेब और आमदनी का हिसाब रखना भूल जाते हैं। कई बार जरूरत से ज्यादा खरीदारी, क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल और आसान किस्तों के आकर्षक प्रस्ताव लोगों को ऐसे खर्चों की ओर धकेल देते हैं, जिनका असर अगले महीने की आर्थिक स्थिति पर पड़ता है। दिवाली बीतने के बाद जब स्कूल की फीस, राशन, बिजली-पानी के बिल, मकान का किराया और ईएमआई चुकाने की बारी आती है, तब बजट बिगड़ने का अहसास होता है। ऐसे में त्योहार की खुशियों के साथ अपनी आर्थिक सेहत का ध्यान रखना भी जरूरी है। वित्तीय विशेषज्ञों की सलाह है कि दिवाली पर खर्च करने से पहले बजट तैयार करें और बोनस या अतिरिक्त आमदनी का इस्तेमाल सोच-समझकर करें। थोड़ी सी योजना आपको त्योहार का आनंद लेने के साथ-साथ भविष्य की जरूरतों के लिए पैसा बचाने में मदद कर सकती है।
अगर दिवाली पर आपको वेतन के साथ बोनस, प्रोत्साहन राशि या कोई दूसरी अतिरिक्त आमदनी मिली है, तो उसे एक साथ खर्च करने के बजाय अलग-अलग जरूरतों के लिए बांटना बेहतर विकल्प हो सकता है। इसके लिए 33-33-33 का नियम अपनाया जा सकता है। इस तरीके में बोनस की लगभग एक-तिहाई रकम त्योहार के खर्चों, दूसरी एक-तिहाई रकम कर्ज चुकाने और शेष रकम बचत या निवेश के लिए रखी जाती है। हालांकि, इसे कोई कठोर नियम नहीं समझना चाहिए। अपनी आमदनी, मौजूदा कर्ज और घरेलू जरूरतों के अनुसार इस अनुपात में बदलाव किया जा सकता है।
बोनस का पहला हिस्सा दिवाली की खरीदारी और जरूरी खर्चों के लिए रखें। इसमें कपड़े, मिठाइयां, उपहार, घर की सजावट, पूजा सामग्री और मेहमानों की खातिरदारी जैसे खर्च शामिल किए जा सकते हैं। खरीदारी की सूची पहले से तैयार करने और हर मद के लिए अधिकतम रकम तय करने से अनावश्यक खर्च पर लगाम लगती है। उदाहरण के लिए, यदि आपको 30,000 रुपये का बोनस मिला है, तो करीब 10,000 रुपये त्योहार के खर्चों के लिए रख सकते हैं। इससे आप अपनी जरूरतों के अनुसार खरीदारी कर पाएंगे और केवल छूट या आकर्षक विज्ञापन देखकर सामान खरीदने से बच सकेंगे।
बोनस का दूसरा हिस्सा कर्ज चुकाने में इस्तेमाल करना समझदारी हो सकती है। यदि आपके क्रेडिट कार्ड पर बकाया है या आपने अधिक ब्याज वाला व्यक्तिगत कर्ज लिया हुआ है, तो उसे कम करने को प्राथमिकता दें। क्रेडिट कार्ड के बकाया पर ब्याज की दर कई मामलों में सालाना 36 से 42 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। ऐसे में समय पर भुगतान नहीं करने से छोटी रकम भी धीरे-धीरे बड़ा आर्थिक बोझ बन सकती है। इसलिए त्योहार के दौरान नई देनदारी बढ़ाने के बजाय पुराना कर्ज कम करने की कोशिश करें। हालांकि, कर्ज चुकाने से पहले उसकी ब्याज दर, भुगतान की शर्तें और किसी संभावित शुल्क को जरूर समझ लें।
बोनस का तीसरा हिस्सा बचत और निवेश के लिए अलग रखें। अचानक बीमारी, नौकरी या आमदनी में कमी अथवा घर की किसी जरूरी मरम्मत जैसी परिस्थितियों में आपातकालीन निधि काम आती है। यदि आपके पास अभी पर्याप्त आपातकालीन बचत नहीं है, तो अतिरिक्त आमदनी का कुछ हिस्सा इस निधि में जमा करना उपयोगी रहेगा। इसके अलावा, भविष्य के लक्ष्यों के लिए अपनी जरूरत और जोखिम उठाने की क्षमता के अनुसार बचत योजनाओं पर विचार कर सकते हैं। राष्ट्रीय बचत प्रमाणपत्र जैसी डाकघर की योजनाएं भी एक विकल्प हैं। हालांकि, किसी योजना में निवेश करने से पहले उसकी मौजूदा ब्याज दर, अवधि, कर संबंधी नियम और निकासी की शर्तों की जानकारी जरूर लें।
दिवाली के बाद नवंबर का बजट बिगड़ने से ऐसे बचें
त्योहार के खर्चों की योजना बनाते समय केवल दिवाली तक की जरूरतों को ध्यान में रखना पर्याप्त नहीं है। नवंबर में आने वाले नियमित खर्चों के लिए भी रकम सुरक्षित रखना जरूरी है। वेतनभोगी परिवारों को विशेष रूप से यह हिसाब लगाना चाहिए कि अगली तनख्वाह आने तक किन-किन मदों में भुगतान करना होगा। स्कूल की फीस, राशन, बिजली का बिल, किराया, दवाइयां, यात्रा और कर्ज की किस्तों जैसे जरूरी खर्चों की सूची बनाएं। इसके बाद इन सभी खर्चों की अनुमानित रकम अलग रख दें। जो पैसा इन जरूरतों के लिए निर्धारित है, उसे त्योहार की खरीदारी में इस्तेमाल न करें। यदि बोनस मिलने के बावजूद महीने के जरूरी खर्च पूरे करने के लिए पर्याप्त रकम नहीं बच रही है, तो खरीदारी का बजट घटाना बेहतर होगा। महंगे कपड़ों, इलेक्ट्रॉनिक सामान या सजावटी वस्तुओं की खरीद को कुछ समय के लिए टाला जा सकता है। इसी तरह, केवल इसलिए कोई वस्तु न खरीदें कि उस पर बड़ी छूट मिल रही है। छूट का वास्तविक फायदा तभी है, जब वह किसी जरूरी या पहले से तय खरीदारी पर मिले। गैरजरूरी सामान पर खर्च की गई रकम आखिरकार बजट पर अतिरिक्त दबाव ही डालती है।
त्योहारों के दौरान कई दुकानदार और वित्तीय संस्थान बिना ब्याज वाली किस्तों या आसान कर्ज के प्रस्ताव देते हैं। ऐसे प्रस्ताव पहली नजर में आकर्षक लग सकते हैं, लेकिन खरीदारी करने से पहले उनकी पूरी शर्तें पढ़ना जरूरी है। कुछ योजनाओं में प्रक्रिया शुल्क, अन्य अतिरिक्त शुल्क या निर्धारित समय पर भुगतान नहीं करने की स्थिति में जुर्माना लग सकता है। कभी-कभी छूट और किस्तों के प्रस्तावों की तुलना करने पर यह भी पता चलता है कि एकमुश्त भुगतान करना अधिक किफायती है। इसलिए केवल मासिक किस्त छोटी होने के आधार पर किसी योजना को सस्ता न मानें।
क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल करते समय अपनी भुगतान क्षमता का ध्यान रखें। कार्ड की सीमा को अपनी आमदनी न समझें और उतना ही खर्च करें, जितनी रकम नियत समय पर चुका सकें। यदि पहले से कार्ड पर बकाया है, तो दिवाली की खरीदारी के लिए उसी पर निर्भर रहने से बचें। समय पर पूरा भुगतान करने से ब्याज और अतिरिक्त शुल्क से बचने में मदद मिल सकती है। वहीं, किसी भी नई किस्त या कर्ज को स्वीकार करने से पहले यह देख लें कि उसका भुगतान नवंबर और आने वाले महीनों के बजट में आसानी से समायोजित हो सकेगा या नहीं।
दिवाली का असली आनंद अपनी क्षमता के अनुसार खुशियां बांटने में है, न कि दूसरों की खरीदारी की बराबरी करने में। परिवार के साथ बैठकर खर्चों की प्राथमिकताएं तय करना, खरीदारी की सूची बनाना और बचत के लिए रकम अलग रखना छोटी लेकिन असरदार आदतें हैं। बोनस को सही तरीके से बांटने, महंगे कर्ज को कम करने और अगले महीने के जरूरी खर्चों के लिए पैसा सुरक्षित रखने से त्योहार के बाद आर्थिक तनाव से बचा जा सकता है। समझदारी इसी में है कि दिवाली की रोशनी घर के साथ-साथ आपके आर्थिक भविष्य को भी रोशन करे।


















Leave a Reply