इजरायल की राजनीति एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की सत्ता बरकरार रहेगी या विपक्ष बदलाव की नई पटकथा लिखेगा, इस सवाल का जवाब फिलहाल किसी के पास नहीं है। चुनाव के बाद सामने आए शुरुआती अनुमानों ने मुकाबले को बेहद दिलचस्प बना दिया है। नेतन्याहू के नेतृत्व वाले दक्षिणपंथी गठबंधन और विपक्षी नेता गादी आइज़ेनकोट के नेतृत्व वाले खेमे के बीच सीटों का अंतर इतना कम है कि किसी भी पक्ष को स्पष्ट विजेता कहना जल्दबाजी होगी। सबसे बड़ी चिंता यह है कि दोनों ही खेमे सरकार बनाने के लिए जरूरी बहुमत के आंकड़े से पीछे नजर आ रहे हैं। ऐसे में चुनावी नतीजों के साथ-साथ अब राजनीतिक जोड़तोड़, सहयोगी दलों की रणनीति और गठबंधन की संभावनाएं भी चर्चा के केंद्र में आ गई हैं।
इजरायल की 120 सदस्यीय संसद को क्नीसेट कहा जाता है। यहां सरकार बनाने के लिए किसी एक दल को अपने दम पर बहुमत मिलना जरूरी नहीं है, लेकिन सरकार को समर्थन देने वाले दलों की कुल संख्या कम से कम 61 होनी चाहिए। यही 61 सीटों का आंकड़ा इस चुनाव की सबसे बड़ी कसौटी बन गया है। शुरुआती अनुमानों में किसी भी प्रमुख खेमे के इस सीमा तक पहुंचने के संकेत नहीं मिलने से राजनीतिक अनिश्चितता बढ़ गई है।
चुनाव के शुरुआती अनुमानों में नेतन्याहू के गठबंधन को करीब 50 से 57 सीटें मिलने की संभावना जताई गई है, जबकि आइज़ेनकोट के नेतृत्व वाले विपक्षी खेमे को लगभग 51 से 52 सीटें मिलने का अनुमान है। कुछ अनुमानों में नेतन्याहू के गठबंधन को मामूली बढ़त दिखाई गई है, जबकि दूसरे अनुमानों में विपक्ष आगे नजर आ रहा है। कहीं दोनों खेमों के बीच लगभग बराबरी का मुकाबला बताया गया है। इन आंकड़ों में अंतर बताता है कि मुकाबला कितना करीबी है और अंतिम परिणाम आने तक तस्वीर बदलने की गुंजाइश बनी हुई है। नेतन्याहू के लिए यह चुनाव केवल सीटें जीतने का सवाल नहीं है, बल्कि उनके राजनीतिक नेतृत्व और सरकार के भविष्य से भी जुड़ा हुआ है। लंबे समय से इजरायल की राजनीति में प्रभावशाली भूमिका निभाने वाले नेतन्याहू के सामने अपने सहयोगी दलों को एकजुट रखने और बहुमत का रास्ता तलाशने की चुनौती है। उनकी पार्टी लिकुड का प्रदर्शन महत्वपूर्ण माना जा रहा है, लेकिन सबसे बड़ी पार्टी बनना और सरकार बनाने की स्थिति में पहुंचना दो अलग-अलग बातें हैं। संसदीय व्यवस्था में सहयोगी दलों का समर्थन ही तय करता है कि सत्ता की चाबी किसके हाथ में जाएगी।
दूसरी ओर, आइज़ेनकोट के नेतृत्व वाला विपक्ष इस चुनाव को सत्ता परिवर्तन के अवसर के रूप में देख रहा है। पूर्व सैन्य प्रमुख आइज़ेनकोट के लिए चुनौती यह है कि विपक्षी दलों के समर्थन को एकजुट कर सरकार बनाने का रास्ता तैयार किया जाए। यदि विपक्षी दल आपसी मतभेद दूर कर साझा रणनीति बनाने में सफल रहते हैं, तो वे नेतन्याहू के सामने मजबूत चुनौती पेश कर सकते हैं। लेकिन यदि गठबंधन के भीतर सहमति नहीं बनती, तो मामूली बढ़त भी सत्ता तक पहुंचने के लिए पर्याप्त साबित नहीं होगी।
इजरायल की चुनावी व्यवस्था में मतदाता सीधे प्रधानमंत्री का चुनाव नहीं करते, बल्कि राजनीतिक दलों को वोट देते हैं। इसके बाद संसद में सीटों के हिसाब से दल गठबंधन बनाते हैं और सरकार के गठन का रास्ता तैयार होता है। यही कारण है कि किसी दल का सबसे आगे रहना अपने आप में सरकार बनाने की गारंटी नहीं है। छोटे दलों का समर्थन, साझा कार्यक्रम पर सहमति और गठबंधन के भीतर नेतृत्व का सवाल अंतिम परिणाम जितने ही महत्वपूर्ण हो जाते हैं। इस बार भी यही स्थिति उभरती दिखाई दे रही है। यदि कोई भी खेमा 61 सीटों तक नहीं पहुंचता, तो उसे दूसरे दलों से समर्थन जुटाना होगा। गठबंधन की बातचीत में नीतिगत मतभेद, सुरक्षा से जुड़े मुद्दे और सरकार में हिस्सेदारी जैसे सवाल अहम हो सकते हैं। ऐसे में चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद भी सरकार के गठन की प्रक्रिया लंबी खिंच सकती है।
बहुमत की चाबी छोटे दलों के पास, राजनीतिक गतिरोध का खतरा बढ़ा
इस चुनाव में अरब दलों का प्रदर्शन भी निर्णायक माना जा रहा है। शुरुआती अनुमानों में अरब दलों को संयुक्त रूप से लगभग 16 सीटें मिलने की संभावना जताई गई है। यह संख्या इतनी महत्वपूर्ण है कि सरकार बनाने की कोशिश कर रहे दोनों प्रमुख खेमों को इन दलों की स्थिति पर नजर रखनी पड़ सकती है। यदि कोई खेमा बहुमत के करीब पहुंचता है, तो अरब दलों का समर्थन या मतदान के दौरान उनकी भूमिका सरकार गठन की संभावनाओं को प्रभावित कर सकती है। हालांकि, यह रास्ता आसान नहीं है। नेतन्याहू और विपक्षी खेमे के बीच अरब दलों के समर्थन को लेकर राजनीतिक और वैचारिक मतभेद रहे हैं। ऐसे में सीटों का गणित भले ही सहयोग की जरूरत दिखाए, लेकिन वास्तविक राजनीतिक समझौता करना अलग चुनौती होगी। यदि प्रमुख दल अरब पार्टियों के समर्थन के बिना सरकार बनाने पर अड़े रहते हैं, तो बहुमत जुटाने का रास्ता और कठिन हो सकता है।
इजरायल के सामने अब दो बड़ी संभावनाएं हैं। पहली, चुनाव के बाद विभिन्न दलों के बीच बातचीत से ऐसा गठबंधन तैयार हो जाए जो संसद में बहुमत साबित कर सके। दूसरी, यदि कोई भी पक्ष पर्याप्त समर्थन जुटाने में नाकाम रहता है, तो देश को लंबे राजनीतिक गतिरोध का सामना करना पड़ सकता है। ऐसी स्थिति में नए चुनाव की संभावना भी पैदा हो सकती है। हालांकि, केवल शुरुआती अनुमानों के आधार पर यह मान लेना सही नहीं होगा कि देश में दोबारा चुनाव कराना तय है। इसके लिए पहले अंतिम परिणाम और उसके बाद सरकार गठन की कोशिशों का नतीजा सामने आना जरूरी है।
फिलहाल मतगणना और आधिकारिक परिणामों पर सभी की निगाहें टिकी हैं। दी गई जानकारी के अनुसार, इजरायल का केंद्रीय चुनाव आयोग अंतिम चुनाव परिणाम 4 नवंबर 2026 को जारी करेगा। तब तक शुरुआती अनुमानों को केवल संभावित नतीजों के संकेत के रूप में ही देखा जाना चाहिए। अंतिम नतीजों में सीटों का वितरण बदल सकता है और उसके बाद गठबंधन की बातचीत सत्ता की दिशा तय करेगी। इजरायल का यह चुनाव फिलहाल किसी एक नेता की स्पष्ट जीत की कहानी नहीं, बल्कि बहुमत जुटाने की कठिन राजनीतिक परीक्षा बन गया है।
नेतन्याहू के सामने अपनी सत्ता बचाने की चुनौती है, तो आइज़ेनकोट के लिए विपक्षी बढ़त को सरकार में बदलना सबसे बड़ा लक्ष्य होगा। दोनों खेमों के बीच करीबी मुकाबले और अरब दलों की अहम संख्या ने चुनाव के बाद की राजनीति को और पेचीदा बना दिया है। अब निर्णायक सवाल केवल यह नहीं है कि किस दल को कितनी सीटें मिलीं, बल्कि यह है कि 120 सदस्यीय संसद में 61 का समर्थन कौन जुटा पाता है। यही आंकड़ा तय करेगा कि इजरायल में सत्ता का मौजूदा समीकरण कायम रहेगा या राजनीति नई दिशा में आगे बढ़ेगी।


















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