बांग्लादेश की राजनीति में आज का दिन बेहद अहम माना जा रहा है। करीब 35 साल बाद देश में राष्ट्रपति पद के लिए सीधा मुकाबला होने जा रहा है। खास बात यह है कि बांग्लादेश में राष्ट्रपति का चुनाव आम जनता सीधे नहीं करती, बल्कि संसद के निर्वाचित सदस्य मतदान के जरिए देश के राष्ट्रपति का चुनाव करते हैं। गुरुवार को होने वाले इस चुनाव में संसद के कुल 349 सदस्य अपने मताधिकार का इस्तेमाल कर सकेंगे। चुनाव प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के लिए मतों की गिनती का सीधा प्रसारण भी किया जाएगा। राष्ट्रपति पद के लिए इस बार सत्तारूढ़ पार्टी बीएनपी के उम्मीदवार मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर और मुख्य विपक्षी दल जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व वाले 11 दलों के गठबंधन के प्रत्याशी कर्नल (सेवानिवृत्त) ओली अहमद के बीच मुकाबला है। हालांकि संसद में बीएनपी को प्राप्त भारी बहुमत को देखते हुए फखरुल इस्लाम आलमगीर की जीत लगभग तय मानी जा रही है।
राष्ट्रपति चुनाव के लिए मतदान गुरुवार दोपहर 2 बजे शुरू होगा और शाम 5 बजे तक चलेगा। सांसद राष्ट्रीय संसद के सत्र कक्ष में अपने मताधिकार का इस्तेमाल करेंगे। मतदान शुरू होने से पहले मुख्य चुनाव आयुक्त एएमएम नासिर उद्दीन सांसदों को मतदान की पूरी प्रक्रिया और वोट डालने के तरीके की जानकारी देंगे। इस चुनाव की सबसे बड़ी खासियत यह है कि लंबे अंतराल के बाद राष्ट्रपति पद के लिए दो उम्मीदवार आमने-सामने हैं। 1991 में संसदीय शासन व्यवस्था दोबारा लागू होने के बाद से राष्ट्रपति चुनावों में विपक्ष की ओर से उम्मीदवार उतारने की परंपरा लगभग खत्म हो गई थी। इसके चलते कई चुनाव बिना किसी मुकाबले के ही संपन्न होते रहे।
फरवरी में हुए आम चुनाव में बीएनपी ने संसद में दो-तिहाई बहुमत हासिल किया था। यही वजह है कि राष्ट्रपति चुनाव में भी पार्टी के उम्मीदवार की जीत को लेकर राजनीतिक विश्लेषकों के बीच लगभग कोई संदेह नहीं है। संसद में संख्या बल पूरी तरह बीएनपी के पक्ष में होने के कारण विपक्षी उम्मीदवार के लिए चुनाव जीतना बेहद मुश्किल माना जा रहा है। बांग्लादेश के राष्ट्रपति चुनाव का इतिहास देश की राजनीतिक व्यवस्था में हुए बड़े बदलावों से जुड़ा रहा है। अब तक देश में कुल 12 राष्ट्रपति चुनाव हो चुके हैं। इनमें आठ मौकों पर राष्ट्रपति निर्विरोध चुने गए हैं। संविधान लागू होने के बाद पहला राष्ट्रपति चुनाव वर्ष 1974 में हुआ था। उस समय सांसदों ने मतदान कर मोहम्मद मोहम्मदुल्लाह को राष्ट्रपति चुना था। हालांकि इसके कुछ ही समय बाद राष्ट्रपति के चुनाव की व्यवस्था में बड़ा बदलाव किया गया। वर्ष 1975 में संविधान में संशोधन के बाद राष्ट्रपति का चुनाव सीधे जनता से कराने का प्रावधान किया गया। इस व्यवस्था के तहत वर्ष 1978, 1981 और 1986 में लगातार तीन बार जनता ने सीधे मतदान करके राष्ट्रपति का चुनाव किया।
इसके बाद वर्ष 1991 में बांग्लादेश की राजनीतिक व्यवस्था में एक और महत्वपूर्ण बदलाव हुआ। देश में संसदीय शासन प्रणाली दोबारा लागू की गई और राष्ट्रपति के चुनाव की जिम्मेदारी फिर से संसद सदस्यों को दे दी गई। इसके बाद से आम जनता सीधे राष्ट्रपति के चुनाव में मतदान नहीं करती है। 1991 में संसदीय व्यवस्था बहाल होने के बाद हुए राष्ट्रपति चुनाव में दो उम्मीदवारों के बीच मुकाबला हुआ था। लेकिन इसके बाद लंबे समय तक राष्ट्रपति चुनाव में विपक्ष की ओर से प्रभावी चुनौती देखने को नहीं मिली। वर्ष 1991 से 2023 तक हुए चुनावों में सभी राष्ट्रपति निर्विरोध चुने गए। विपक्षी दलों के उम्मीदवार मैदान में नहीं उतरने के कारण सांसदों को कई मौकों पर केवल एक ही उम्मीदवार के पक्ष में मतदान करना पड़ा। इस तरह राष्ट्रपति चुनाव महज औपचारिक प्रक्रिया बनकर रह गया था। ऐसे में इस बार का चुनाव बांग्लादेश की राजनीति के लिहाज से इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि 35 साल के लंबे अंतराल के बाद राष्ट्रपति पद के लिए वास्तविक मुकाबला देखने को मिल रहा है।
इस बार राष्ट्रपति चुनाव में संसद के कुल 349 सदस्य मतदान कर सकते हैं
इस बार राष्ट्रपति चुनाव में संसद के कुल 349 सदस्य मतदान कर सकते हैं। मतदान राष्ट्रीय संसद के सत्र कक्ष में होगा। निर्वाचन आयोग ने चुनाव प्रक्रिया को व्यवस्थित और पारदर्शी बनाने के लिए विशेष तैयारियां की हैं। मतदान शुरू होने से पहले मुख्य चुनाव आयुक्त सांसदों को मतदान की प्रक्रिया समझाएंगे। मतदान समाप्त होने के बाद मतों की गिनती की जाएगी और इसे लाइव प्रसारित करने की व्यवस्था की गई है। इससे चुनाव प्रक्रिया पर लोगों की नजर बनी रहेगी और पारदर्शिता को लेकर किसी तरह के सवाल उठने की संभावना कम होगी।
राष्ट्रपति चुनाव में बीएनपी की ओर से मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर की उम्मीदवारी को सत्ता पक्ष के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। दूसरी ओर कर्नल (सेवानिवृत्त) ओली अहमद विपक्षी गठबंधन के उम्मीदवार के तौर पर मैदान में हैं। हालांकि दोनों उम्मीदवारों के बीच मुकाबला होने के बावजूद संसद में बीएनपी की मजबूत स्थिति के कारण परिणाम को लेकर तस्वीर काफी हद तक साफ दिखाई दे रही है।
फरवरी में हुए आम चुनाव में बीएनपी को संसद में दो-तिहाई बहुमत मिला था। राष्ट्रपति का चुनाव चूंकि सांसदों के मतों से होता है, इसलिए पार्टी के पास अपने उम्मीदवार को जिताने के लिए पर्याप्त संख्या बल मौजूद है। यही कारण है कि मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर को राष्ट्रपति पद का सबसे मजबूत दावेदार माना जा रहा है।
दूसरी ओर विपक्षी गठबंधन के उम्मीदवार ओली अहमद के सामने सबसे बड़ी चुनौती संसद में पर्याप्त समर्थन जुटाने की है। ऐसे में चुनाव परिणाम से ज्यादा चर्चा इस बात की हो रही है कि 35 साल बाद राष्ट्रपति पद के लिए दो उम्मीदवारों के बीच मुकाबला आखिर किस तरह संपन्न होता है और विपक्ष कितने सांसदों का समर्थन हासिल कर पाता है।
बांग्लादेश के राजनीतिक इतिहास में राष्ट्रपति पद का चुनाव हमेशा से सत्ता व्यवस्था के बदलावों के साथ जुड़ा रहा है। कभी जनता को सीधे राष्ट्रपति चुनने का अधिकार मिला तो कभी यह अधिकार संसद को दे दिया गया। 1991 के बाद संसदीय प्रणाली की वापसी के साथ राष्ट्रपति की भूमिका भी मुख्य रूप से संवैधानिक पद तक सीमित होती गई। अब 2026 का यह चुनाव उस लंबे दौर के बाद हो रहा है, जब राष्ट्रपति पद के लिए कोई वास्तविक चुनावी मुकाबला देखने को नहीं मिला था। इसलिए परिणाम भले ही पहले से काफी हद तक तय माना जा रहा हो, लेकिन चुनाव प्रक्रिया अपने आप में बांग्लादेश की लोकतांत्रिक राजनीति के लिए एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम है।
35 साल बाद होने वाला यह मुकाबला यह भी दिखाता है कि बांग्लादेश में राष्ट्रपति चुनाव एक बार फिर राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का मंच बन रहा है। गुरुवार को होने वाले मतदान और उसके बाद मतगणना के साथ यह साफ हो जाएगा कि संसद के सदस्य किस उम्मीदवार के पक्ष में अपना समर्थन दर्ज करते हैं। हालांकि मौजूदा संख्या बल को देखते हुए मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर की जीत की संभावना सबसे अधिक मानी जा रही है।

















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