देश में ईंधन नीति और वाहन उद्योग को लेकर केंद्र सरकार एक बड़ा बदलाव करने की तैयारी में है। सरकार अब नई गाड़ियों के लिए बनने वाले आगामी ईंधन दक्षता नियमों में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रण की जगह 25 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रण को आधार बनाने पर गंभीरता से विचार कर रही है। अगर यह फैसला लागू होता है तो आने वाले वर्षों में भारत की बड़ी संख्या में कारें और दोपहिया वाहन ऐसे पेट्रोल पर चलेंगे जिसमें सामान्य पेट्रोल के मुकाबले अधिक एथेनॉल मिला होगा। यह बदलाव केवल तकनीकी नहीं बल्कि आर्थिक, रणनीतिक और पर्यावरणीय दृष्टि से भी बेहद अहम माना जा रहा है। सरकार का मानना है कि पेट्रोल में एथेनॉल की मात्रा बढ़ाने से विदेशी कच्चे तेल पर निर्भरता कम होगी, आयात बिल घटेगा और देश के भीतर तैयार होने वाले जैव ईंधन को बढ़ावा मिलेगा।
खास बात यह है कि पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और कच्चे तेल की अस्थिर सप्लाई ने भी सरकार को तेजी से वैकल्पिक ईंधन की दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया है। सरकारी स्तर पर इस समय जिन नए नियमों पर चर्चा चल रही है, उन्हें वाहन ईंधन दक्षता मानक के तीसरे चरण के रूप में देखा जा रहा है। ये नियम अप्रैल 2027 से लागू हो सकते हैं और अगले पांच वर्षों तक प्रभावी रहेंगे। इन नियमों के तहत यह तय किया जाता है कि किसी वाहन निर्माता कंपनी की गाड़ियों से औसतन कितना कार्बन उत्सर्जन होना चाहिए। सरकार का उद्देश्य प्रदूषण कम करना और ईंधन बचत को बढ़ावा देना है। अब तक देश में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल को बढ़ावा दिया जा रहा था। यानी एक लीटर पेट्रोल में 20 प्रतिशत हिस्सा एथेनॉल का होता है। लेकिन अब सरकार 25 प्रतिशत मिश्रण वाले ईंधन की दिशा में तेजी से कदम बढ़ा रही है।
एथेनॉल मुख्य रूप से गन्ने, मक्का और दूसरे कृषि उत्पादों से तैयार किया जाता है। यही वजह है कि इस नीति को किसानों और घरेलू उद्योगों के लिए भी लाभकारी माना जा रहा है। सरकार का मानना है कि अगर पेट्रोल में एथेनॉल की मात्रा बढ़ती है तो देश को हर साल अरबों डॉलर के कच्चे तेल आयात से राहत मिल सकती है। भारत दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातक देशों में शामिल है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में उतार-चढ़ाव का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। ऐसे में घरेलू स्तर पर तैयार ईंधन का उपयोग बढ़ाना ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। फरवरी 2026 में पश्चिम एशिया में हालात अचानक तनावपूर्ण हो गए थे, जब अमेरिका और इजराइल की ओर से ईरान पर सैन्य कार्रवाई की खबरों के बाद वैश्विक तेल बाजार में उथल-पुथल मच गई।
कच्चे तेल की सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ी और कई देशों ने वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों पर तेजी से काम शुरू कर दिया। भारत में भी इसी दौरान सरकार के विभिन्न विभागों और वाहन कंपनियों के बीच कई दौर की बैठकें हुईं। सूत्रों के मुताबिक इन बैठकों में यह चर्चा हुई कि यदि भविष्य में ईंधन आपूर्ति संकट और गहराता है तो भारत को पेट्रोल में अधिक एथेनॉल मिश्रण की दिशा में तेजी से आगे बढ़ना होगा। इसी कारण अब नए वाहन मानकों में 25 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रण को आधार मानने की तैयारी की जा रही है। सरकारी अधिकारियों का मानना है कि जब भविष्य की गाड़ियां बड़े स्तर पर 25 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल पर चलेंगी, तब पुराने 20 प्रतिशत मानक के आधार पर नियम बनाना व्यावहारिक नहीं रहेगा। इसलिए नए उत्सर्जन और ईंधन दक्षता परीक्षण भी उसी हिसाब से तैयार किए जा सकते हैं।
वाहन कंपनियों पर बढ़ेगा दबाव, इंजन तकनीक में बड़े बदलाव की तैयारी
नई नीति का सबसे बड़ा असर वाहन कंपनियों पर पड़ सकता है। कंपनियों को अपने इंजन और ईंधन प्रणाली में ऐसे बदलाव करने होंगे जिससे वाहन अधिक एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल पर बेहतर तरीके से चल सकें। विशेषज्ञों के मुताबिक एथेनॉल की मात्रा बढ़ने से इंजन की ट्यूनिंग, माइलेज और कुछ तकनीकी हिस्सों में बदलाव जरूरी हो जाता है। वाहन निर्माता कंपनियां लंबे समय से सरकार से नए नियमों को अंतिम रूप देने की मांग कर रही हैं। कंपनियों का कहना है कि स्पष्ट नीति आने के बाद ही वे भविष्य की गाड़ियों, निवेश और नई तकनीक पर अंतिम निर्णय ले पाएंगी। यही कारण है कि पिछले दो वर्षों में सरकार और उद्योग जगत के बीच लगातार बातचीत चल रही है। सरकार ने इस दिशा में कई प्रारूप जारी किए हैं। पहला मसौदा जून 2024 में सामने आया था।
इसके बाद सितंबर 2025 में संशोधित प्रस्ताव जारी किया गया। फिर फरवरी और अप्रैल 2026 में भी नए सुझाव वाहन कंपनियों के साथ साझा किए गए। अब माना जा रहा है कि अंतिम नियमों में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। ईंधन परीक्षण के दौरान इस्तेमाल होने वाला पेट्रोल वाहन उत्सर्जन तय करने में बेहद अहम भूमिका निभाता है। एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल में सामान्य पेट्रोल की तुलना में कार्बन उत्सर्जन कम माना जाता है। यही वजह है कि अगर पेट्रोल में एथेनॉल का हिस्सा बढ़ाया जाता है तो वाहन कंपनियों के उत्सर्जन आंकड़े भी बदल जाएंगे।विशेषज्ञों का कहना है कि भारत आने वाले वर्षों में केवल इलेक्ट्रिक वाहनों पर निर्भर रहने के बजाय मिश्रित ईंधन मॉडल पर भी तेजी से आगे बढ़ सकता है। क्योंकि देश में अभी भी बड़ी संख्या में पारंपरिक पेट्रोल वाहन इस्तेमाल हो रहे हैं और अचानक पूरी तरह इलेक्ट्रिक व्यवस्था में बदलाव आसान नहीं माना जाता।
दूसरी ओर कृषि क्षेत्र के लिए भी यह नीति महत्वपूर्ण मानी जा रही है। एथेनॉल उत्पादन बढ़ने से गन्ना और अनाज उत्पादकों को नया बाजार मिलेगा। इससे चीनी मिलों और जैव ईंधन उद्योग को भी फायदा हो सकता है। सरकार पहले ही एथेनॉल उत्पादन बढ़ाने के लिए कई योजनाओं पर काम कर रही है। हालांकि एथेनॉल मिश्रण बढ़ाने के साथ-साथ वाहन मालिकों को नई तकनीक और ईंधन अनुकूलता के बारे में जागरूक करना जरूरी होगा। पुराने इंजन वाली कुछ गाड़ियों में अधिक एथेनॉल मिश्रण तकनीकी दिक्कतें पैदा कर सकता है। इसलिए कंपनियों और सरकार दोनों को इस बदलाव के लिए चरणबद्ध तैयारी करनी होगी। फिलहाल पूरे वाहन उद्योग की नजर सरकार के अंतिम फैसले पर टिकी हुई है। माना जा रहा है कि आने वाले महीनों में नए नियमों को अंतिम रूप दिया जा सकता है। अगर ऐसा होता है तो भारत की ईंधन नीति, वाहन तकनीक और ऊर्जा रणनीति में एक बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा।

















Leave a Reply