कब तक थमे रहेंगे पेट्रोल-डीजल के दाम, बढ़ते घाटे ने बढ़ाई सरकार और कंपनियों की चिंता

पश्चिम एशिया में जारी तनाव और वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में लगातार उछाल के बीच भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतें लंबे समय से स्थिर बनी हुई हैं। दुनिया के कई देशों में जहां ईंधन की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं, वहीं भारत में आम उपभोक्ताओं को अब तक बड़ी राहत मिली हुई है। दिल्ली से लेकर देहरादून और मुंबई से चेन्नई तक पेट्रोल पंपों पर दामों में कोई बड़ा बदलाव नहीं दिख रहा। लेकिन इस राहत की एक बड़ी कीमत भी चुकानी पड़ रही है। सरकारी तेल कंपनियां अंतरराष्ट्रीय बाजार से महंगा कच्चा तेल खरीदकर घरेलू बाजार में कम कीमत पर ईंधन बेच रही हैं। इससे इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम जैसी कंपनियों पर भारी आर्थिक दबाव बनता जा रहा है। 

फिलहाल सरकार महंगाई को नियंत्रण में रखने के लिए कीमतों को रोकने की कोशिश कर रही है, लेकिन अगर कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रहीं तो यह रणनीति ज्यादा समय तक टिकना आसान नहीं होगा। भारत दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातक देशों में शामिल है और अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से खरीदता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में हर बढ़ोतरी का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।एक तरफ आम जनता राहत महसूस कर रही है, तो दूसरी तरफ तेल कंपनियों की बैलेंस शीट पर घाटे का बोझ लगातार बढ़ रहा है। यही वजह है कि अब यह सवाल उठने लगा है कि आखिर सरकार और तेल कंपनियां कब तक कीमतों को स्थिर रख पाएंगी।

आम जनता को राहत, लेकिन तेल कंपनियों पर बढ़ता जा रहा आर्थिक दबाव

भारत में फिलहाल पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतें कई महीनों से लगभग स्थिर बनी हुई हैं। दिल्ली में पेट्रोल करीब 94 रुपये प्रति लीटर और डीजल लगभग 87 रुपये प्रति लीटर बिक रहा है। घरेलू एलपीजी सिलेंडर की कीमत भी नियंत्रित स्तर पर रखी गई है। हालांकि दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लगातार ऊंचे स्तर पर बनी हुई हैं। ऐसे में तेल कंपनियों को आयातित कच्चे तेल की लागत और घरेलू बिक्री मूल्य के बीच बड़ा अंतर झेलना पड़ रहा है। सरकारी आकलनों के अनुसार कुछ समय पहले पेट्रोल पर करीब 26 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर 80 रुपये से अधिक प्रति लीटर तक की कम वसूली की स्थिति बन रही थी। 

इसका मतलब यह है कि कंपनियां वास्तविक लागत से कम कीमत पर ईंधन बेच रही हैं। यह स्थिति अल्पकाल में तो संभाली जा सकती है, लेकिन लंबे समय तक जारी रहने पर कंपनियों की वित्तीय स्थिति पर गंभीर असर पड़ सकता है। रिपोर्ट्स के मुताबिक तेल कंपनियों को हर महीने हजारों करोड़ रुपये का दबाव झेलना पड़ रहा है। रेटिंग एजेंसी इक्रा ने भी चेतावनी दी है कि यदि कच्चा तेल 120 से 125 डॉलर प्रति बैरल के बीच बना रहता है तो कंपनियों का घाटा और बढ़ सकता है। एजेंसी का अनुमान है कि पेट्रोल और डीजल दोनों पर नकारात्मक मार्जिन लगातार बना रह सकता है, जबकि घरेलू गैस पर होने वाला नुकसान भी रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच सकता है। तेल कंपनियां अभी तक अपनी बैलेंस शीट और कर्ज के जरिए इस दबाव को संभाल रही हैं, लेकिन लगातार घाटा बढ़ने से उनकी निवेश क्षमता कमजोर हो सकती है। अर्थशास्त्रियों का कहना है कि पिछले करीब 70 दिनों से कंपनियां लगातार दबाव में काम कर रही हैं। इस दौरान वैश्विक बाजार में तेल महंगा होने के बावजूद घरेलू कीमतों में बड़ी बढ़ोतरी नहीं की गई। परिणामस्वरूप कंपनियों पर वित्तीय बोझ तेजी से बढ़ा है।

क्या अब महंगा हो सकता है पेट्रोल-डीजल?

आर्थिक जानकारों का मानना है कि मौजूदा स्थिति में सरकार के सामने संतुलन बनाना सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है। एक तरफ आम जनता को राहत देना जरूरी है, वहीं दूसरी तरफ सरकारी तेल कंपनियों को लगातार घाटे में चलाना भी आसान नहीं है। यदि कच्चे तेल की कीमतों में जल्द नरमी नहीं आती तो आने वाले महीनों में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। हालांकि सरकार फिलहाल ऐसा कदम उठाने से बचती दिख रही है क्योंकि इसका सीधा असर महंगाई पर पड़ेगा। भारत में परिवहन से लेकर खाद्य वस्तुओं तक लगभग हर क्षेत्र ईंधन कीमतों से प्रभावित होता है। यदि पेट्रोल और डीजल महंगे होते हैं तो ट्रांसपोर्ट लागत बढ़ेगी, जिसका असर सब्जियों, दूध, राशन और रोजमर्रा की जरूरत की चीजों पर दिखाई देगा। 

रिजर्व बैंक पहले ही महंगाई को लेकर सतर्क रुख अपना चुका है। ऐसे में ईंधन की कीमतों में तेज बढ़ोतरी खुदरा महंगाई को और ऊपर धकेल सकती है। यही वजह है कि सरकार फिलहाल बेहद सावधानी से कदम बढ़ा रही है। सरकार के पास फिलहाल कई विकल्प मौजूद हैं। वह एक्साइज ड्यूटी में कटौती कर सकती है, तेल कंपनियों को वित्तीय सहायता दे सकती है या फिर चरणबद्ध तरीके से कीमतों में मामूली बढ़ोतरी कर सकती है ताकि जनता पर अचानक बोझ न पड़े। यदि कीमतें लंबे समय तक नियंत्रित रखी गईं तो सरकार को तेल कंपनियों को प्रत्यक्ष मुआवजा देना पड़ सकता है। इससे सरकारी खजाने पर अतिरिक्त दबाव आएगा। 

इस बीच चालू खाते के घाटे और आयात बिल को संभालना भी सरकार के लिए चुनौती बना हुआ है। महंगे कच्चे तेल के कारण देश का आयात खर्च बढ़ रहा है, जिसका असर अर्थव्यवस्था के दूसरे हिस्सों पर भी पड़ सकता है। फिलहाल आम लोगों को राहत जरूर मिल रही है, लेकिन इसके पीछे तेल कंपनियों और सरकारी वित्त पर बढ़ता दबाव लगातार गहराता जा रहा है। अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि यदि वैश्विक बाजार में कच्चा तेल लंबे समय तक महंगा बना रहा तो क्या सरकार को आखिरकार पेट्रोल-डीजल और गैस की कीमतों में बढ़ोतरी करनी पड़ेगी।

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