प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश यात्राओं पर वर्ष 2021 से अब तक सरकारी खजाने से कम से कम 557.51 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं। यह जानकारी विदेश मंत्रालय की ओर से गुरुवार को राज्यसभा में प्रस्तुत एक लिखित जवाब में सामने आई। जवाब में बताया गया कि प्रधानमंत्री की विभिन्न देशों की आधिकारिक यात्राओं पर हुआ खर्च गंतव्य, यात्रा की अवधि, कार्यक्रमों की संख्या और सुरक्षा प्रबंधों के आधार पर तय होता है। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि जून 2026 में फ्रांस की यात्रा पर हुए खर्च का अंतिम आकलन अभी पूरा नहीं हुआ है, इसलिए उसे कुल व्यय में शामिल नहीं किया गया है। यह जानकारी राज्यसभा सांसद संजय सिंह और डॉ. वी. शिवदासन द्वारा पूछे गए प्रश्न के उत्तर में दी गई। सांसदों ने वर्ष 2021 से प्रधानमंत्री की सभी विदेश यात्राओं का देशवार विवरण, प्रत्येक यात्रा पर हुए खर्च और उन यात्राओं के दौरान हुए द्विपक्षीय समझौतों की जानकारी मांगी थी। विदेश मंत्रालय ने अपने जवाब में कहा कि प्रधानमंत्री ने इस अवधि में एशिया, यूरोप, उत्तरी अमेरिका, अफ्रीका और प्रशांत क्षेत्र के अनेक देशों का दौरा किया। इन यात्राओं का उद्देश्य भारत के रणनीतिक, आर्थिक, व्यापारिक और कूटनीतिक हितों को आगे बढ़ाना रहा।
सरकार के अनुसार, प्रधानमंत्री की विदेश यात्राएं केवल औपचारिक कार्यक्रमों तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि इनमें द्विपक्षीय बैठकों, निवेश संबंधी चर्चाओं, बहुपक्षीय सम्मेलनों और वैश्विक मंचों पर भारत के प्रतिनिधित्व जैसे महत्वपूर्ण कार्यक्रम भी शामिल होते हैं। इन यात्राओं के दौरान कई देशों के साथ व्यापार, निवेश, रक्षा, ऊर्जा, प्रौद्योगिकी, शिक्षा और सांस्कृतिक सहयोग से जुड़े समझौते भी किए गए।
विदेश मंत्रालय के जवाब में बताया गया कि वर्ष 2024 और 2025 के दौरान कुछ यात्राओं पर अपेक्षाकृत अधिक खर्च हुआ। इनमें फरवरी 2025 में फ्रांस की यात्रा सबसे महंगी साबित हुई, जिस पर 25.59 करोड़ रुपये खर्च हुए। इसी अवधि में अमेरिका की यात्रा पर 16.54 करोड़ रुपये खर्च किए गए। जुलाई 2025 में ब्राजील की यात्रा पर 17.72 करोड़ रुपये, अप्रैल 2025 में सऊदी अरब की यात्रा पर 15.54 करोड़ रुपये और सितंबर 2024 में अमेरिका की यात्रा पर 15.33 करोड़ रुपये का व्यय दर्ज किया गया। इसके अलावा जून 2024 में इटली की यात्रा पर 14.36 करोड़ रुपये खर्च हुए।
जवाब के अनुसार, विदेश यात्राओं का खर्च कई कारकों पर निर्भर करता है। किसी देश की दूरी, वहां ठहराव की अवधि, प्रतिनिधिमंडल का आकार, सुरक्षा व्यवस्था, विशेष विमान संचालन और स्थानीय स्तर पर आयोजित कार्यक्रमों की संख्या जैसे तत्व कुल व्यय को प्रभावित करते हैं। यही कारण है कि अलग-अलग देशों की यात्राओं के खर्च में उल्लेखनीय अंतर देखने को मिलता है।
सरकार ने यह भी बताया कि वर्ष 2026 की कई यात्राओं के खर्च संबंधी आंकड़े अभी अस्थायी हैं। संबंधित विभागों और एजेंसियों द्वारा सभी बिलों के भुगतान और अंतिम सत्यापन के बाद इन आंकड़ों को संशोधित किया जा सकता है। विशेष रूप से 13 से 18 जून 2026 तक की फ्रांस यात्रा का पूरा वित्तीय आकलन अभी लंबित है, इसलिए उसे कुल 557.51 करोड़ रुपये के आंकड़े में शामिल नहीं किया गया है।
2021 से 2026 तक विदेश नीति में सक्रियता का प्रतिबिंब
विदेश मंत्रालय के जवाब से यह भी स्पष्ट होता है कि पिछले कुछ वर्षों में भारत की वैश्विक कूटनीतिक सक्रियता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। कोविड-19 महामारी के बाद वैश्विक गतिविधियों के सामान्य होने के साथ प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं की संख्या में भी बढ़ोतरी हुई। इन दौरों के माध्यम से भारत ने प्रमुख वैश्विक शक्तियों और रणनीतिक साझेदार देशों के साथ अपने संबंधों को मजबूत करने का प्रयास किया। फ्रांस, अमेरिका, इटली, ब्राजील और सऊदी अरब जैसे देशों की यात्राएं केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि इनमें जी-20, जी-7, ब्रिक्स, संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों से जुड़े कार्यक्रम भी शामिल थे। इन बैठकों में भारत ने वैश्विक अर्थव्यवस्था, जलवायु परिवर्तन, ऊर्जा सुरक्षा, आतंकवाद विरोधी सहयोग और आपूर्ति श्रृंखला जैसे मुद्दों पर अपनी भूमिका को मजबूती से रखा। सरकार का कहना है कि विदेश यात्राओं को केवल खर्च के नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए, क्योंकि इनके माध्यम से निवेश आकर्षित करने, निर्यात बढ़ाने, रणनीतिक साझेदारी मजबूत करने और भारतीय समुदाय से संवाद स्थापित करने जैसे दीर्घकालिक लाभ भी प्राप्त होते हैं। कई यात्राओं के दौरान अरबों डॉलर के निवेश प्रस्तावों, तकनीकी सहयोग समझौतों और व्यापारिक साझेदारियों की घोषणा हुई, जिनका प्रभाव आने वाले वर्षों में भारतीय अर्थव्यवस्था पर दिखाई दे सकता है।
हालांकि विपक्ष समय-समय पर इन यात्राओं पर होने वाले खर्च को लेकर सवाल उठाता रहा है। राज्यसभा में पूछे गए इस प्रश्न को भी इसी संदर्भ में देखा जा रहा है। विपक्षी दलों का कहना है कि विदेश यात्राओं पर होने वाले व्यय और उनसे प्राप्त प्रत्यक्ष लाभों की जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध होनी चाहिए, ताकि पारदर्शिता सुनिश्चित की जा सके। वहीं सरकार का पक्ष है कि इन यात्राओं से भारत की वैश्विक स्थिति मजबूत हुई है और देश के रणनीतिक तथा आर्थिक हितों को बढ़ावा मिला है।
विदेश मंत्रालय द्वारा संसद में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, 2021 से अब तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश यात्राओं पर कम से कम 557.51 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं। हालांकि यह आंकड़ा अभी अंतिम नहीं माना जा सकता, क्योंकि वर्ष 2026 की कुछ यात्राओं का खर्च अभी जोड़ा जाना बाकी है। ऐसे में अंतिम व्यय इससे अधिक हो सकता है। संसद में दिए गए इस जवाब ने एक बार फिर प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं, उनके खर्च और उनसे मिलने वाले कूटनीतिक व आर्थिक लाभों को लेकर नई चर्चा शुरू कर दी है।

















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