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सरकार का सस्ता प्याज बेअसर? बाजार में 70 रुपये किलो तक पहुंचा भाव, बिगाड़ा रसोई का बजट, ये हैं बड़ी वजह

देश में प्याज की कीमतों ने आम लोगों की रसोई का बजट बिगाड़ दिया है। सरकार अपने सुरक्षित भंडार से प्याज 35 रुपये प्रति किलो के भाव पर बेच रही है, लेकिन इसके बावजूद कई शहरों और बाजारों में ग्राहकों को प्याज खरीदने के लिए 60 से 70 रुपये प्रति किलो तक खर्च करने पड़ रहे हैं। कुछ बाजारों में यह कीमत इससे भी अधिक है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब सरकार सस्ता प्याज उपलब्ध करा रही है, तो आम उपभोक्ताओं को महंगा प्याज क्यों खरीदना पड़ रहा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, प्याज की औसत खुदरा कीमत में पिछले एक साल के दौरान करीब 94 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। वहीं, थोक बाजार में भी प्याज के दाम लगातार दबाव में हैं। सरकार ने कीमतों पर नियंत्रण रखने के लिए अपने सुरक्षित भंडार से प्याज बाजार में उतारना शुरू किया है, लेकिन आपूर्ति और मांग के बीच असंतुलन के कारण इसका असर सभी बाजारों में एक जैसा दिखाई नहीं दे रहा है। उपभोक्ता मामलों के विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, 16 सितंबर को पूरे भारत में प्याज की औसत खुदरा कीमत 53.84 रुपये प्रति किलो रही। एक साल पहले यानी 16 सितंबर 2025 को यही कीमत 27.71 रुपये प्रति किलो थी। इस तरह एक साल के भीतर प्याज की औसत खुदरा कीमत में करीब 94 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। हालांकि, यह पूरे देश का औसत भाव है। अलग-अलग राज्यों, शहरों और बाजारों में प्याज की कीमत इससे कम या अधिक हो सकती है।

इसी तरह 16 सितंबर को प्याज की औसत थोक कीमत 45.65 रुपये प्रति किलो रही। थोक बाजार में कीमत बढ़ने का सीधा असर खुदरा बाजार पर पड़ता है। जब व्यापारियों को मंडियों से प्याज महंगे दाम पर मिलता है, तो परिवहन, भंडारण और अन्य खर्च जुड़ने के बाद ग्राहकों को भी अधिक कीमत चुकानी पड़ती है। यही वजह है कि सरकार की ओर से 35 रुपये प्रति किलो प्याज बेचने के बावजूद हर बाजार में उपभोक्ताओं को इसी भाव पर प्याज उपलब्ध नहीं हो पा रहा है।

सरकार ने कीमतों में बढ़ोतरी को नियंत्रित करने के लिए 24 अगस्त से अपने मूल्य स्थिरीकरण कोष के सुरक्षित भंडार से प्याज बाजार में उतारना शुरू किया था। इसके तहत राष्ट्रीय सहकारी उपभोक्ता महासंघ, भारतीय राष्ट्रीय कृषि सहकारी विपणन महासंघ, केंद्रीय भंडार और मोबाइल वैन के माध्यम से प्याज 35 रुपये प्रति किलो की दर पर बेचा जा रहा है। सरकार का उद्देश्य अधिक से अधिक उपभोक्ताओं तक सस्ता प्याज पहुंचाना और बाजार में बढ़ती कीमतों पर दबाव कम करना है।

सुरक्षित भंडार से बिक्री, फिर भी क्यों महंगा प्याज?

सरकार के पास रखा प्याज का सुरक्षित भंडार कीमतों को नियंत्रित करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। जब बाजार में प्याज की आपूर्ति कम होने लगती है और कीमतें बढ़ती हैं, तब इस भंडार से प्याज निकालकर बाजार में उपलब्ध कराया जाता है। इससे आपूर्ति बढ़ाने और कीमतों को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है। लेकिन इसका असर तभी व्यापक होता है, जब प्याज पर्याप्त मात्रा में और सही समय पर अलग-अलग बाजारों तक पहुंच सके। सरकार ने प्याज की आपूर्ति बढ़ाने के लिए उत्पादन वाले क्षेत्रों से अधिक खपत वाले शहरों और बाजारों तक प्याज पहुंचाने की व्यवस्था भी की है। इसके लिए रेलवे के माल ढुलाई डिब्बों और ट्रकों का इस्तेमाल किया जा रहा है। इसका उद्देश्य उन इलाकों तक प्याज पहुंचाना है, जहां मांग अधिक है और स्थानीय आपूर्ति पर्याप्त नहीं है। हालांकि, सुरक्षित भंडार से प्याज की बिक्री और बाजार में उपलब्ध प्याज के भाव के बीच अंतर बना हुआ है। इसका एक कारण यह भी है कि सरकारी बिक्री सभी बाजारों में समान मात्रा में नहीं हो रही है। जिन इलाकों में सरकारी प्याज की उपलब्धता कम है, वहां ग्राहकों को स्थानीय मंडियों और खुदरा दुकानों पर निर्भर रहना पड़ता है। ऐसे बाजारों में कीमतें थोक भाव, परिवहन खर्च, भंडारण और स्थानीय मांग के आधार पर तय होती हैं।

इसके अलावा, 35 रुपये प्रति किलो का भाव सरकारी बिक्री के लिए निर्धारित है। इसका मतलब यह नहीं है कि देश के हर बाजार में सभी दुकानदारों को प्याज इसी कीमत पर उपलब्ध होगा। सरकारी बिक्री केंद्रों और मोबाइल वैन के जरिए मिलने वाला प्याज तथा सामान्य खुदरा बाजार में बिकने वाला प्याज अलग-अलग आपूर्ति चैनलों से पहुंच सकता है। यही वजह है कि सरकारी बिक्री के बावजूद कई जगह बाजार भाव अधिक बना हुआ है। प्याज की कीमतों में मौसमी उतार-चढ़ाव आम बात है। सरकार ने भी माना है कि रबी और खरीफ प्याज की फसल के बीच का समय ऐसा होता है, जब प्याज की कीमतें आमतौर पर बढ़ने लगती हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि गोदामों में रखा रबी का प्याज धीरे-धीरे कम होने लगता है, जबकि खरीफ की नई फसल बाजार में आने में समय लगता है। इस दौरान आपूर्ति में अस्थायी कमी पैदा हो सकती है, जिसका सीधा असर कीमतों पर पड़ता है।

भारत में प्याज की खेती अलग-अलग मौसमों में होती है। रबी प्याज की फसल आमतौर पर वर्ष की शुरुआत में तैयार होती है और इसे कुछ समय तक भंडारित करके बाजार में इस्तेमाल किया जाता है। इसके बाद खरीफ प्याज की फसल बाजार में आने लगती है। जब दोनों फसलों के बीच अंतर बढ़ जाता है, तो बाजार में उपलब्ध प्याज की मात्रा कम हो सकती है। सरकार की गाइडलाइंस के अनुसार, प्याज के सुरक्षित भंडार को आमतौर पर सितंबर से दिसंबर के बीच कम आपूर्ति वाले समय में बाजार में उतारा जाता है। इस अवधि में सरकारी भंडार से प्याज की बिक्री का उद्देश्य बाजार में उपलब्धता बनाए रखना और उपभोक्ताओं को राहत देना है। लेकिन यदि नई फसल की बुआई या उत्पादन में देरी होती है, तो आपूर्ति का यह अंतर और लंबा हो सकता है।

इस साल भी रबी से खरीफ प्याज की फसल के बीच का बदलाव कुछ प्रमुख उत्पादन क्षेत्रों में देरी के कारण प्रभावित हुआ है। सरकार ने जुलाई में बताया था कि महाराष्ट्र के नासिक में खरीफ प्याज की बुआई तय समय से करीब 15 दिन पीछे चल रही थी। नासिक देश के प्रमुख प्याज उत्पादक क्षेत्रों में शामिल है। यहां बुआई में देरी होने से नई फसल की बाजार में आमद पर असर पड़ सकता है। कर्नाटक के चित्रदुर्ग-चल्लकेरे क्षेत्र में भी खरीफ प्याज की बुआई सामान्य स्तर की करीब 60 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया गया था। यदि किसी बड़े उत्पादन क्षेत्र में बुआई कम होती है, तो आगे चलकर प्याज की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है। हालांकि, वास्तविक कीमतों पर असर उत्पादन, मौसम, फसल की गुणवत्ता, भंडारण और बाजार में आवक जैसे कई कारकों पर निर्भर करता है।

प्याज की कीमतों को लेकर मौसम ने भी अनिश्चितता बढ़ाई है। सरकार ने मानसून में देरी के असर को लेकर पहले ही चिंता जताई थी। प्याज की खेती के लिए समय पर बारिश और उचित मौसम जरूरी होता है। बारिश में देरी, अत्यधिक बारिश या अन्य मौसमी परिस्थितियां बुआई और फसल की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकती हैं। इसका असर आगे चलकर बाजार में प्याज की आवक और कीमतों पर पड़ सकता है। सरकार ने कुछ कारोबारियों की सट्टेबाजी वाली खरीदारी को लेकर भी चिंता जताई थी। यदि कारोबारी भविष्य में कीमतें बढ़ने की उम्मीद में बड़ी मात्रा में प्याज खरीदकर रोककर रखते हैं, तो बाजार में तत्काल उपलब्ध प्याज की मात्रा प्रभावित हो सकती है। इससे कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। हालांकि, किसी खास बाजार में कीमत बढ़ने के लिए केवल यही एक कारण जिम्मेदार हो, ऐसा जरूरी नहीं है। स्थानीय मांग, मंडी की आवक, परिवहन, भंडारण और मौसम भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

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