नई दिल्ली में आयोजित 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन ने बदलती वैश्विक राजनीति के बीच भारत की कूटनीतिक क्षमता और संतुलित विदेश नीति की एक नई तस्वीर पेश की। सम्मेलन की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि सदस्य देशों के बीच गंभीर मतभेदों के बावजूद नई दिल्ली घोषणापत्र पर सर्वसम्मति बन सकी। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष, अमेरिका और इजरायल के साथ ईरान के तनाव, खाड़ी देशों के बीच बढ़ती असहजता और यूक्रेन संकट जैसे संवेदनशील मुद्दों के बीच ब्रिक्स देशों को एक साझा मंच पर लाना आसान नहीं था। ऐसे माहौल में भारत ने टकराव वाले मुद्दों को सीधे उभारने के बजाय ऐसी संतुलित भाषा पर जोर दिया, जिसे अलग-अलग हितों वाले सदस्य देश स्वीकार कर सकें। यही वजह रही कि सम्मेलन केवल औपचारिक बैठक बनकर नहीं रह गया, बल्कि भारत की सहमति आधारित कूटनीति का महत्वपूर्ण उदाहरण बनकर सामने आया। भारत ने चौथी बार ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी की। सम्मेलन की भव्यता और व्यापक भागीदारी ने इस मंच की बढ़ती वैश्विक भूमिका को भी रेखांकित किया। हालांकि ब्रिक्स को अक्सर पश्चिमी देशों के प्रभाव के विकल्प के रूप में देखा जाता है, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संबोधन में इस धारणा को हवा देने से परहेज किया। उन्होंने समूह के परिपक्व होने और साझा हितों के आधार पर आगे बढ़ने पर जोर दिया। यह रुख भारत के लिए खास तौर पर महत्वपूर्ण है, क्योंकि एक तरफ नई दिल्ली अमेरिका और यूरोपीय देशों के साथ व्यापार और रणनीतिक संबंधों को मजबूत कर रहा है, वहीं दूसरी ओर रूस, चीन और ग्लोबल साउथ के देशों के साथ भी अपने रिश्तों को संतुलित बनाए रखना चाहता है।
नई दिल्ली घोषणापत्र को लेकर भी भारत की भूमिका महत्वपूर्ण रही। ईरान और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों के बीच पश्चिम एशिया के घटनाक्रम को लेकर मतभेद हैं। ईरान पर अमेरिका और इजरायल के हमलों तथा खाड़ी क्षेत्र में हुए हमलों जैसे संवेदनशील मुद्दों को घोषणापत्र के अंतिम पाठ में सीधे आरोप-प्रत्यारोप के रूप में शामिल नहीं किया गया। इसी तरह यूक्रेन में रूस के युद्ध का भी उल्लेख इस तरह नहीं किया गया, जिससे किसी सदस्य देश के लिए इसे स्वीकार करना मुश्किल हो। इसके बजाय दस्तावेज में तनाव बढ़ाने वाली कार्रवाइयों से बचने और अधिकतम संयम बरतने की आवश्यकता पर जोर दिया गया। यह भाषा भले ही अपेक्षाकृत नरम रही, लेकिन यही नरम रुख सर्वसम्मति बनाने की सबसे बड़ी ताकत बना। सम्मेलन का दूसरा बड़ा पहलू भारत और चीन के रिश्तों से जुड़ा रहा। वर्ष 2023 में भारत की मेजबानी में हुए जी20 सम्मेलन में चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग की अनुपस्थिति के बाद इस बार उनका नई दिल्ली आना दोनों देशों के बीच संवाद की वापसी के संकेत के तौर पर देखा गया। सीमा विवाद और लंबे समय से चले आ रहे तनाव के बावजूद दोनों नेताओं के बयानों में टकराव के बजाय सहयोग का स्वर दिखाई दिया। यह बदलाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि दोनों देशों के संबंध केवल सीमा तक सीमित नहीं हैं, बल्कि व्यापार, निवेश, आपूर्ति शृंखला और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे अनेक मुद्दों से जुड़े हैं।
शी चिनफिंग ने दोनों देशों को एक-दूसरे की ताकतों का पूरक बताते हुए सहयोग की संभावना पर जोर दिया। वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सीमा से जुड़े मामलों में मौजूदा समझौतों और दोनों पक्षों के बीच बनी समझ का पालन करने की आवश्यकता बताई। दोनों नेताओं के बीच यह संवाद ऐसे समय हुआ, जब अरुणाचल प्रदेश में दोनों देशों के कोर कमांडरों के बीच महत्वपूर्ण फ्लैग मीटिंग भी हुई थी। इसलिए शिखर सम्मेलन में सामने आई सुलहपूर्ण भाषा ने भारत-चीन संबंधों में एक नए चरण की संभावना को बल दिया है। हालांकि केवल उच्चस्तरीय बैठकों और सकारात्मक बयानों के आधार पर दोनों देशों के रिश्तों में बड़े बदलाव की उम्मीद करना जल्दबाजी होगी। चीन के साथ भारत के संबंधों में पिछले वर्षों का अनुभव बताता है कि राजनीतिक स्तर पर बनी सहमति को जमीन पर लागू करना सबसे बड़ी चुनौती होती है। दोनों देशों के बीच व्यापार असंतुलन, निवेश से जुड़े मुद्दे, बाजार तक पहुंच और सीमा पर विश्वास बहाली जैसे सवाल अभी भी मौजूद हैं। इसलिए नई दिल्ली में हुई बातचीत की वास्तविक सफलता इस बात से तय होगी कि आने वाले समय में दोनों देश आर्थिक और रणनीतिक स्तर पर कितनी ठोस प्रगति करते हैं।
घोषणापत्र से आगे ब्रिक्स की असली चुनौती, आर्थिक और रणनीतिक सहयोग कितना बढ़ेगा?
ब्रिक्स सम्मेलन में प्रौद्योगिकी, जलवायु परिवर्तन, स्वास्थ्य, शिक्षा और संस्कृति सहित कई क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने की बात कही गई। लेकिन इन घोषणाओं को वास्तविक उपलब्धियों में बदलना समूह के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी। ब्रिक्स का विस्तार होने के बाद अब इसमें 11 पूर्ण सदस्य और 10 भागीदार देश शामिल हैं। एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के देशों की बढ़ती भागीदारी ने इसे वैश्विक दक्षिण की आवाज के रूप में अधिक व्यापक बनाया है। इसके बावजूद सदस्य देशों की आर्थिक ताकत, राजनीतिक व्यवस्था और विदेश नीति के लक्ष्य एक-दूसरे से काफी अलग हैं। यही विविधता ब्रिक्स को एकजुट मंच बनाए रखने के साथ-साथ ठोस फैसलों तक पहुंचने में भी कठिनाई पैदा करती है। ब्रिक्स की आर्थिक महत्वाकांक्षाओं की बात करें तो न्यू डेवलपमेंट बैंक को समूह के सबसे प्रमुख संस्थागत प्रयासों में गिना जाता है। लेकिन इसका आकार अभी भी वैश्विक वित्तीय संस्थानों की तुलना में सीमित है। पश्चिमी वित्तीय व्यवस्था पर निर्भरता भी एक बड़ी चुनौती है। रूस पर प्रतिबंध लगाए जाने के बाद बैंक के लिए रूस को नए ऋण देने की स्थिति कठिन हो गई थी। इससे यह स्पष्ट हुआ कि वैकल्पिक वित्तीय व्यवस्था खड़ी करने की राह कितनी जटिल है।
डॉलर पर निर्भरता कम करने और वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था विकसित करने की चर्चा भी लंबे समय से ब्रिक्स के एजेंडे में रही है। हालांकि अब तक कोई ऐसी साझा मुद्रा या भुगतान प्रणाली अस्तित्व में नहीं आ सकी है, जो अंतरराष्ट्रीय व्यापार में डॉलर के प्रभाव को वास्तविक चुनौती दे सके। इसके पीछे सदस्य देशों की अलग-अलग आर्थिक प्राथमिकताएं, वित्तीय प्रणालियों की विविधता और चीन की अपनी भुगतान व्यवस्था के बढ़ते प्रभाव सहित कई कारण हैं। अमेरिका की संभावित आर्थिक और व्यापारिक प्रतिक्रिया भी इस दिशा में आगे बढ़ने वाले देशों के लिए एक महत्वपूर्ण कारक है। फिर भी ब्रिक्स की उपयोगिता को केवल साझा मुद्रा या पश्चिमी व्यवस्था के विकल्प के सवाल से नहीं आंका जा सकता। इसकी सबसे बड़ी ताकत शायद यही है कि अलग-अलग राजनीतिक और आर्थिक हितों वाले देश एक मंच पर संवाद कर पा रहे हैं। वैश्विक दक्षिण के देशों के लिए यह मंच अपनी प्राथमिकताओं को सामूहिक रूप से सामने रखने का अवसर देता है। जलवायु परिवर्तन, खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य, ऊर्जा, तकनीक और विकास जैसे विषयों पर सहयोग की संभावनाएं बनी हुई हैं।
नई दिल्ली सम्मेलन का संदेश इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि भारत ने ब्रिक्स को किसी एक धड़े के विरुद्ध खड़े मंच के रूप में पेश करने के बजाय संवाद और सहयोग के मंच के रूप में आगे बढ़ाने की कोशिश की। रूस, चीन, ईरान जैसे देशों के साथ संबंध रखने के साथ-साथ भारत अमेरिका, यूरोप और अन्य पश्चिमी देशों के साथ भी अपने रणनीतिक और आर्थिक रिश्ते मजबूत कर रहा है। ऐसे में नई दिल्ली घोषणापत्र की सहमति भारत की इसी बहुआयामी कूटनीति का परिणाम मानी जा सकती है।
कुल मिलाकर, 18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन किसी बड़े वैश्विक आर्थिक बदलाव की शुरुआत से ज्यादा सहमति बनाने और संवाद के रास्ते खुले रखने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम रहा। ईरान और खाड़ी देशों के बीच मतभेद, रूस-यूक्रेन युद्ध और अमेरिका के साथ बढ़ते तनाव जैसे मुद्दों के बीच साझा घोषणापत्र पर सहमति बनाना अपने आप में उपलब्धि है। भारत-चीन संबंधों में दिखाई दिया नरम रुख भी उम्मीद जगाता है, लेकिन इसकी असली परीक्षा आगे होगी। ब्रिक्स के सामने अब चुनौती यह है कि वह घोषणाओं से आगे बढ़कर व्यापार, निवेश, वित्त, तकनीक और विकास के क्षेत्र में ठोस परिणाम दे। फिलहाल यह समूह ऐसे मंच के रूप में उभर रहा है, जो किसी एक शक्ति के खिलाफ खड़ा होने के बजाय बदलती विश्व व्यवस्था में अपने लिए प्रभावी और संतुलित भूमिका तलाश रहा है।


















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