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मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर आज फिर विपक्ष दिल्ली में सड़कों पर उतरेगा

दिल्ली में आज सोमवार को भी चुनाव आयोग के खिलाफ विपक्षी गठबंधन का विरोध प्रदर्शन सियासी टकराव का बड़ा केंद्र बन सकता है। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) में कथित अनियमितताओं और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए इंडी गठबंधन ने बाराखंभा रोड से सुप्रीम कोर्ट तक मार्च निकालने का ऐलान किया है। विपक्षी दल मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं। हालांकि, पुलिस से मार्च की अनुमति नहीं मिलने और सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से मुलाकात का समय नहीं मिलने के कारण इस आंदोलन को लेकर राजधानी में तनाव की स्थिति बन सकती है। विपक्ष ने साफ संकेत दिए हैं कि वह अपनी मांगों को लेकर पीछे हटने के मूड में नहीं है। इस प्रदर्शन को धार देने के लिए विपक्षी गठबंधन के शीर्ष नेता दिल्ली पहुंच रहे हैं। तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी पहले ही राजधानी पहुंच चुकी हैं। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव और राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी यादव भी दिल्ली आ चुके हैं। विपक्षी नेताओं की सक्रियता से इस आंदोलन को व्यापक राजनीतिक समर्थन मिलने के संकेत हैं। वहीं, कांग्रेस ने अपने सभी लोकसभा और राज्यसभा सांसदों को दिल्ली में ही रहने के निर्देश दिए हैं, ताकि विरोध प्रदर्शन के दौरान पार्टी की मौजूदगी और भागीदारी सुनिश्चित की जा सके। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भी अपना गोवा दौरा टाल दिया है। 

उन्होंने पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के साथ महत्वपूर्ण बैठकें की हैं। माना जा रहा है कि विपक्षी दल इस मुद्दे को केवल चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली तक सीमित रखने के बजाय चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता और संवैधानिक संस्थाओं की जवाबदेही से जोड़कर उठाना चाहते हैं। विपक्ष का आरोप है कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया में ऐसे सवाल खड़े हुए हैं, जिनका जवाब चुनाव आयोग को देना चाहिए। इंडी गठबंधन के निशाने पर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार हैं। विपक्षी दलों का आरोप है कि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान कथित अनियमितताओं और चुनाव आयुक्तों के बीच असहमति के बावजूद फैसले लिए गए। विपक्ष इस बात पर भी सवाल उठा रहा है कि क्या महत्वपूर्ण निर्णय लेते समय सभी संबंधित पक्षों की राय और प्रक्रियागत नियमों का पूरी तरह पालन किया गया।

विपक्ष का कहना है कि चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था से निष्पक्षता, पारदर्शिता और जवाबदेही की अपेक्षा की जाती है। मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने और संशोधन की प्रक्रिया सीधे नागरिकों के मतदान के अधिकार से जुड़ी है। ऐसे में यदि किसी प्रक्रिया को लेकर संदेह पैदा होता है, तो उसकी निष्पक्ष जांच और तथ्यों को सार्वजनिक करना जरूरी है। हालांकि, विपक्ष के इन आरोपों पर अंतिम निष्कर्ष न्यायिक और आधिकारिक तथ्यों के आधार पर ही निकाला जा सकता है।

विपक्षी नेताओं की योजना सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को ज्ञापन सौंपने की थी। लेकिन मुख्य न्यायाधीश की ओर से मुलाकात से इनकार किए जाने के बाद भी गठबंधन ने मार्च निकालने का फैसला किया। पुलिस ने प्रस्तावित मार्च को अनुमति नहीं दी है।

ऐसे में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि विपक्ष आगे किस तरह विरोध दर्ज कराता है और पुलिस प्रशासन कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए क्या कदम उठाता है। विपक्षी गठबंधन के लिए यह प्रदर्शन राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अलग-अलग राज्यों में सक्रिय दलों को एक साझा मुद्दे पर साथ लाकर गठबंधन चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता का सवाल राष्ट्रीय स्तर पर उठाना चाहता है। शीर्ष नेताओं की दिल्ली में मौजूदगी और कांग्रेस सांसदों को राजधानी में रहने के निर्देश से संकेत मिलता है कि विपक्ष इस विरोध को प्रतीकात्मक कार्यक्रम तक सीमित नहीं रखना चाहता।

2023 के कानून पर खरगे का हमला, चुनाव आयुक्तों की कानूनी सुरक्षा पर सवाल

इस विवाद के बीच कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने 2023 में बनाए गए उस कानून पर केंद्र सरकार को घेरा है, जिसके तहत मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों को उनके आधिकारिक कर्तव्यों से जुड़े कुछ मामलों में कानूनी संरक्षण दिया गया है। बेंगलुरु में बयान देते हुए खरगे ने आरोप लगाया कि इस कानून के जरिए चुनाव आयुक्तों को ऐसी सुरक्षा प्रदान की गई है, जो राष्ट्रपति या देश के मुख्य न्यायाधीश को भी हासिल नहीं है। उनका कहना है कि संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों की जवाबदेही सुनिश्चित करना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए जरूरी है।

इंडी गठबंधन ने 2023 के इस कानून को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। इस मामले में अदालत ने चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, अदालत ने यह भी कहा है कि यदि रिकॉर्ड से यह सामने आता है कि संबंधित फैसले सर्वसम्मति से नहीं लिए गए थे, तो इस पहलू पर विचार किया जाएगा। इस कानूनी कार्यवाही का महत्व इसलिए बढ़ गया है, क्योंकि विवाद केवल चुनाव आयोग के किसी एक निर्णय तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति, उनके अधिकारों और जवाबदेही से जुड़े व्यापक सवाल भी चर्चा में आ गए हैं।

विपक्ष का तर्क है कि चुनाव आयोग की स्वतंत्रता के साथ-साथ उसकी कार्यप्रणाली में पारदर्शिता भी जरूरी है। वहीं, 2023 के कानून की वैधता और उसके प्रावधानों पर अंतिम फैसला अदालत को करना है। नोटिस जारी होने का अर्थ यह नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट ने कानून को असंवैधानिक घोषित कर दिया है या विपक्ष के सभी आरोपों को सही मान लिया है।

अब दिल्ली में प्रस्तावित मार्च और सुप्रीम कोर्ट में चल रही कानूनी लड़ाई, दोनों पर राजनीतिक नजरें टिकी हैं। विपक्ष मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग के साथ चुनावी प्रक्रिया पर उठ रहे सवालों को प्रमुखता देना चाहता है। दूसरी ओर, मार्च की अनुमति नहीं मिलने से टकराव की आशंका बनी हुई है। आने वाले समय में यह मुद्दा कितना व्यापक राजनीतिक रूप लेता है, यह विपक्ष की रणनीति, चुनाव आयोग की प्रतिक्रिया और अदालत में होने वाली सुनवाई पर निर्भर करेगा।

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