जम्मू और श्रीनगर में आधुनिक सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था विकसित करने की उम्मीदों को बड़ा झटका लगा है। दोनों शहरों में मेट्रोलाइट रेल चलाने की प्रस्तावित योजना फिलहाल आगे बढ़ती नजर नहीं आ रही है। केंद्र सरकार के आवास और शहरी विकास मंत्रालय ने परियोजना की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) वापस कर दी है। इसके पीछे प्रस्तावित मार्गों की बनावट, निर्माण लागत और मेट्रोलाइट प्रणाली के निर्धारित मानकों से जुड़े सवाल बताए गए हैं। केंद्र की आपत्तियों के बाद अब दोनों शहरों में मेट्रो जैसी रेल सेवा शुरू करने की योजना पर नए सिरे से विचार करना होगा। जम्मू-कश्मीर विधानसभा में पूछे गए एक सवाल के जवाब में सरकार ने यह जानकारी साझा की है। इसके मुताबिक, जम्मू और श्रीनगर के लिए तैयार की गई डीपीआर में प्रस्तावित मेट्रोलाइट कॉरिडोर को पूरी तरह जमीन से ऊपर बनाने की योजना थी। केंद्र सरकार का मानना है कि इस तरह का डिजाइन मेट्रोलाइट प्रणाली की मूल अवधारणा और इसके आर्थिक लाभ के अनुरूप नहीं है।
परियोजना का उद्देश्य कम लागत में शहरों के भीतर सार्वजनिक परिवहन को बेहतर बनाना था, लेकिन पूरी तरह ऊंचे मार्ग पर रेल चलाने की योजना से निर्माण खर्च काफी बढ़ने की आशंका थी। मेट्रोलाइट परियोजना को जम्मू और श्रीनगर में बढ़ते यातायात दबाव, सड़कों पर लगने वाले जाम और सार्वजनिक परिवहन की जरूरतों के समाधान के तौर पर देखा जा रहा था। दोनों शहरों में आबादी, वाहनों की संख्या और यात्रियों की आवाजाही बढ़ने के साथ बेहतर परिवहन व्यवस्था की मांग भी तेज हुई है। ऐसे में रेल आधारित परिवहन प्रणाली को भविष्य की जरूरतों के लिहाज से अहम माना जा रहा था। हालांकि, केंद्र की आपत्तियों ने इस योजना की व्यवहारिकता और लागत को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।
परियोजना की अनुमानित लागत करीब 9,802 करोड़ रुपये बताई गई थी। केंद्र सरकार की आपत्ति का प्रमुख आधार यही है कि यदि मेट्रोलाइट के लिए बड़े पैमाने पर ऊंचे पुलों और पिलरों का निर्माण करना पड़े, तो इसकी लागत पारंपरिक मेट्रो जैसी महंगी प्रणाली के करीब पहुंच सकती है। ऐसे में कम खर्च वाली परिवहन व्यवस्था के रूप में मेट्रोलाइट को अपनाने का उद्देश्य कमजोर पड़ जाता है। मेट्रोलाइट को सामान्य मेट्रो रेल की तुलना में अपेक्षाकृत कम लागत वाली व्यवस्था के रूप में विकसित करने की अवधारणा है। इसमें शहर की सड़कों और उपलब्ध स्थान के अनुसार मार्ग तैयार किए जाते हैं। इसलिए डीपीआर में प्रस्तावित डिजाइन और निर्माण लागत का संतुलन अहम माना जाता है। केंद्र सरकार की ओर से रिपोर्ट लौटाए जाने के बाद अब परियोजना के स्वरूप, मार्गों और खर्च का दोबारा आकलन किए जाने की जरूरत पैदा हो गई है।
मेट्रो रेल नीति के मानकों पर सवाल, फ्लाईओवर भी बने चुनौती, ई-बसों को बढ़ाने का सुझाव
केंद्र सरकार की आपत्ति का एक बड़ा आधार मेट्रो रेल नीति, 2017 के प्रावधान हैं। इस नीति के अनुसार, मेट्रोलाइट जैसी हल्की रेल परिवहन प्रणाली को सामान्य तौर पर जमीन के स्तर पर चलाने की परिकल्पना की जाती है। ऐसे मार्ग मुख्य सड़क से अलग निर्धारित किए जा सकते हैं, ताकि रेल संचालन और सड़क यातायात के बीच टकराव कम हो तथा निर्माण लागत को नियंत्रित रखा जा सके। जमीन के स्तर पर मार्ग तैयार करने से ऊंचे पुलों, भारी ढांचों और बड़े निर्माण कार्यों पर होने वाला खर्च भी कम किया जा सकता है। जम्मू और श्रीनगर के लिए तैयार डीपीआर में इसके विपरीत कॉरिडोर को पूरी तरह एलिवेटेड रखने का प्रस्ताव दिया गया था। यानी रेल को जमीन से ऊपर बनाए गए पिलरों और पुलों के सहारे चलाने की योजना थी।
केंद्र का मानना है कि इस तरह का निर्माण मेट्रोलाइट परियोजना के लागत संबंधी लाभ को कम कर देता है। यदि हल्की रेल प्रणाली के लिए भी बड़े पैमाने पर ऊंचे ढांचे तैयार करने पड़ें, तो उसके लिए भारी निवेश करना होगा। ऐसे में परियोजना की उपयोगिता और आर्थिक व्यवहार्यता का दोबारा आकलन जरूरी हो जाता है। जम्मू शहर में पहले से चल रहे फ्लाईओवर निर्माण कार्यों ने भी प्रस्तावित एलिवेटेड कॉरिडोर के सामने चुनौती खड़ी की है। शहर में सड़क यातायात को सुचारु बनाने के लिए अलग-अलग स्थानों पर फ्लाईओवर और अन्य बुनियादी ढांचे विकसित किए जा रहे हैं। ऐसे में इनके साथ मेट्रोलाइट के ऊंचे मार्गों का तालमेल बैठाना आसान नहीं होगा। अलग-अलग परियोजनाओं के बीच पर्याप्त समन्वय नहीं होने पर निर्माण में तकनीकी दिक्कतें आ सकती हैं और लागत भी बढ़ सकती है। इन परिस्थितियों में केंद्र सरकार ने फिलहाल दोनों शहरों में सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था सुधारने के लिए ई-बसों की संख्या बढ़ाने का सुझाव दिया है। प्रधानमंत्री ई-बस सेवा जैसी पहलों के तहत इलेक्ट्रिक बसों को शहरी परिवहन का व्यावहारिक विकल्प माना जा रहा है।
ई-बसों के संचालन से यात्रियों को बेहतर सुविधा देने के साथ-साथ प्रदूषण कम करने और सार्वजनिक परिवहन की पहुंच बढ़ाने में मदद मिल सकती है। ई-बस व्यवस्था का एक बड़ा लाभ यह है कि इसके लिए मेट्रो रेल की तरह पूरे शहर में बड़े और महंगे निर्माण ढांचे खड़े करने की जरूरत नहीं पड़ती। मौजूदा सड़कों और मार्गों का उपयोग करते हुए बस सेवाओं का विस्तार किया जा सकता है। यात्रियों की मांग के अनुसार नए मार्ग शुरू करने, बसों की संख्या बढ़ाने और अलग-अलग इलाकों को जोड़ने में भी अपेक्षाकृत अधिक लचीलापन रहता है। हालांकि, इस व्यवस्था को प्रभावी बनाने के लिए पर्याप्त बसें, चार्जिंग केंद्र, रखरखाव सुविधाएं और बेहतर मार्ग नियोजन जरूरी होगा। जम्मू और श्रीनगर में मेट्रोलाइट परियोजनाओं की डीपीआर लौटाए जाने का मतलब यह है कि प्रस्तावित योजना अपने मौजूदा स्वरूप में केंद्र की मंजूरी हासिल नहीं कर सकी है।
आगे की प्रक्रिया में मार्गों की बनावट, निर्माण लागत और परिवहन जरूरतों के अनुरूप नए विकल्पों पर विचार करना पड़ सकता है। यदि परियोजना को संशोधित किया जाता है, तो जमीन के स्तर पर रेल संचालन की संभावनाओं और मौजूदा यातायात ढांचे के साथ उसके तालमेल का आकलन अहम होगा। फिलहाल ई-बसों पर जोर देने का सुझाव यह संकेत देता है कि केंद्र सरकार दोनों शहरों में सार्वजनिक परिवहन की जरूरतों को पूरा करने के लिए कम खर्च वाले विकल्पों को प्राथमिकता दे रही है। हालांकि, जम्मू और श्रीनगर में मेट्रोलाइट परियोजना का भविष्य संशोधित योजना, उसकी आर्थिक व्यवहार्यता और संबंधित मंजूरियों पर निर्भर करेगा। ऐसे में अब निगाहें इस बात पर रहेंगी कि दोनों शहरों के लिए रेल आधारित परिवहन योजना को नए स्वरूप में आगे बढ़ाया जाता है या ई-बसों के विस्तार को ही प्राथमिक समाधान बनाया जाता है।


















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