ममता के सबसे भरोसेमंद सिपहसालार से भाजपा के सबसे बड़े चेहरे तक : कैसे शुभेंदु अधिकारी ने बदल दी बंगाल की राजनीति

पश्चिम बंगाल की राजनीति में शुभेंदु अधिकारी का उभार केवल एक नेता की सफलता की कहानी नहीं, बल्कि सत्ता, महत्वाकांक्षा, भरोसे और राजनीतिक टकराव की ऐसी दास्तान है जिसने राज्य की राजनीति की दिशा ही बदल दी। कभी ममता बनर्जी के सबसे भरोसेमंद नेताओं में शामिल रहे शुभेंदु आज भाजपा के सबसे बड़े बंगाली चेहरे बन चुके हैं। उनके राजनीतिक सफर को समझे बिना बंगाल की मौजूदा राजनीति को समझना लगभग असंभव है। एक समय ऐसा था जब संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार की कैबिनेट बैठक में ममता बनर्जी के व्यवहार को लेकर नेताओं के बीच चर्चा होती थी। 

एक बैठक में ममता अचानक नाराज होकर बाहर चली गईं। उस दौरान मौजूद एक मंत्री ने झुंझलाकर सवाल किया कि आखिर ममता को क्या हो गया है। तभी वरिष्ठ कांग्रेसी नेता प्रणव मुखर्जी ने बेहद शांत अंदाज में जवाब दिया था कि अगर कोई खुद को रवींद्रनाथ ठाकुर से बेहतर कवि, बीथोवेन से बेहतर संगीतकार और लियोनार्दो दा विंची से बेहतर चित्रकार समझने लगे, तो उसके लिए हर चीज समस्या बन जाती है। यह टिप्पणी केवल एक प्रतिक्रिया नहीं थी, बल्कि ममता बनर्जी की राजनीतिक शैली का संकेत भी मानी गई। 

यही राजनीतिक शैली आगे चलकर शुभेंदु अधिकारी और ममता बनर्जी के रिश्तों में दूरी की सबसे बड़ी वजह बनी। शुभेंदु अधिकारी दक्षिण बंगाल के बेहद प्रभावशाली राजनीतिक परिवार से आते हैं। उनके पिता शिशिर अधिकारी कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रहे और मनमोहन सिंह सरकार में मंत्री भी रहे। कोंताई और तमलुक जैसे इलाकों में अधिकारी परिवार का मजबूत जनाधार था। उस दौर में वामपंथी राजनीति का दबदबा जरूर था, लेकिन नंदीग्राम आंदोलन ने बंगाल की राजनीति को पूरी तरह बदल दिया।

नंदीग्राम आंदोलन से भाजपा तक, शुभेंदु का राजनीतिक सफर

नंदीग्राम आंदोलन के दौरान शुभेंदु अधिकारी ने भूमि अधिग्रहण के खिलाफ आंदोलन का नेतृत्व किया और देखते ही देखते वे बंगाल की राजनीति के बड़े चेहरे बन गए। ममता बनर्जी ने उनकी राजनीतिक क्षमता को पहचानते हुए उन्हें तृणमूल कांग्रेस की युवा इकाई की जिम्मेदारी सौंपी और जंगलमहल जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में पार्टी की कमान दी। कुछ ही वर्षों में तृणमूल कांग्रेस ने उन इलाकों में न केवल वामपंथियों को कमजोर किया बल्कि युवाओं के बीच भी मजबूत पकड़ बना ली। शुभेंदु का राजनीतिक कद लगातार बढ़ता गया। 2009 में उन्होंने तमलुक लोकसभा सीट से चुनाव जीतकर माकपा के दिग्गज नेता लक्ष्मण सेठ को भारी अंतर से हराया। 2014 में भी उन्होंने अपनी सीट बरकरार रखी। इसके बाद 2016 में तृणमूल कांग्रेस ने उन्हें नंदीग्राम विधानसभा सीट से उम्मीदवार बनाया। यहां उन्होंने 67 प्रतिशत से ज्यादा वोट हासिल कर शानदार जीत दर्ज की। उनकी सफलता से प्रभावित होकर ममता बनर्जी ने उन्हें परिवहन मंत्री बनाया और बाद में पर्यावरण मंत्रालय की जिम्मेदारी भी दी। लेकिन इसी दौरान दोनों नेताओं के बीच राजनीतिक दूरी बढ़ने लगी। कहा जाता है कि ममता बनर्जी शुभेंदु के बढ़ते प्रभाव से असहज होने लगी थीं। दूसरी तरफ ममता की राजनीति में उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी का कद तेजी से बढ़ रहा था। 

पार्टी के भीतर समानांतर शक्ति केंद्र बनने लगे थे। शुभेंदु को संगठन मजबूत करने के लिए इस्तेमाल तो किया गया, लेकिन उन्हें कभी ममता के बेहद करीबी नेताओं की सूची में शामिल नहीं किया गया। शुभेंदु अधिकारी खुद भी दरबारी राजनीति से दूरी बनाकर रखते थे। विधायक बनने के बाद भी उन्होंने कोलकाता में स्थायी रूप से रहने के बजाय अपने क्षेत्र से रोजाना लगभग 200 किलोमीटर की यात्रा करना जारी रखा। कई बार वे रात देर से घर पहुंचते और अगली सुबह फिर काम में जुट जाते। यही उनकी कार्यशैली थी, जिसने उन्हें जमीनी नेता की पहचान दिलाई। समय के साथ दोनों नेताओं के बीच अविश्वास खुलकर सामने आने लगा। शुभेंदु ने एक बार सार्वजनिक रूप से कहा था कि वे परिवहन मंत्री जरूर थे, लेकिन मंत्रालय ममता खुद चलाती थीं। राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा रही कि शुभेंदु और अभिषेक बनर्जी के बीच प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ती जा रही थी। 2020 की दुर्गा पूजा के दौरान शुभेंदु के क्षेत्र में लगे “दादार अनुगामी” पोस्टरों ने इस टकराव को और खुलकर सामने ला दिया। इन पोस्टरों में न तो तृणमूल कांग्रेस का चिन्ह था और न ही ममता बनर्जी की तस्वीर। 

इसके बाद तृणमूल कांग्रेस के नेताओं ने नंदीग्राम में बैठकों के दौरान शुभेंदु पर तीखे हमले किए और उन्हें “मीर जाफर” तक कहा गया। आखिरकार 2021 विधानसभा चुनाव से पहले शुभेंदु अधिकारी ने भाजपा का दामन थाम लिया। यह फैसला बंगाल की राजनीति में सबसे बड़े राजनीतिक घटनाक्रमों में से एक साबित हुआ। भाजपा में शामिल होने के बाद शुभेंदु ने न केवल खुद को स्थापित किया बल्कि ममता बनर्जी को नंदीग्राम में हराकर बंगाल की राजनीति में नया इतिहास रच दिया। अब जब भाजपा के नेतृत्व में बंगाल में नई राजनीतिक परिस्थितियां बन रही हैं, तो शुभेंदु अधिकारी पार्टी के सबसे प्रभावशाली नेताओं में गिने जा रहे हैं। ममता बनर्जी की कार्यशैली और पार्टी के भीतर बढ़ती केंद्रीकरण की राजनीति ने कई पुराने नेताओं को उनसे दूर कर दिया। शुभेंदु अधिकारी का भाजपा में जाना केवल एक नेता का दल बदल नहीं था, बल्कि तृणमूल कांग्रेस के भीतर पनप रहे असंतोष का सबसे बड़ा प्रतीक बन गया।

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