फैटी लिवर को कभी उम्रदराज लोगों से जुड़ी स्वास्थ्य समस्या माना जाता था, लेकिन बदलती जीवनशैली ने इसकी तस्वीर बदल दी है। अब कम उम्र के युवाओं में भी लिवर में चर्बी जमा होने के मामले तेजी से सामने आ रहे हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक 25 से 26 साल की उम्र में ग्रेड-2 फैटी लिवर मिलना अब असामान्य नहीं रह गया है। चिंता की बात यह है कि यदि शुरुआती स्तर पर इस समस्या को नजरअंदाज किया जाए तो लिवर में सूजन और फाइब्रोसिस बढ़ सकता है। फाइब्रोसिस की स्थिति गंभीर होने पर लिवर को स्थायी नुकसान पहुंच सकता है और आगे चलकर सिरोसिस का खतरा बढ़ सकता है।
युवाओं में फैटी लिवर के बढ़ते मामलों को लेकर नई दिल्ली में आयोजित वर्ल्ड कांग्रेस ऑफ गैस्ट्रोएंटरोलॉजी 2026 में भी चर्चा हो रही है। विशेषज्ञों ने बदलती जीवनशैली, अस्वास्थ्यकर खानपान और शारीरिक गतिविधियों की कमी को इस समस्या से जुड़े प्रमुख कारणों में शामिल किया है। खासतौर पर फास्ट फूड, अधिक कैलोरी वाले भोजन और मीठे खाद्य पदार्थों का नियमित सेवन शरीर में अतिरिक्त वसा बढ़ाने के साथ मेटाबोलिक स्वास्थ्य पर भी असर डाल सकता है।
फैटी लिवर को चिकित्सकीय रूप से मेटाबोलिक डिसफंक्शन-एसोसिएटेड स्टिएटोटिक लिवर डिजीज यानी एमएएसएलडी कहा जाता है। इस स्थिति में लिवर में जरूरत से ज्यादा वसा जमा होने लगती है। शुरुआती चरण में कई लोगों को इसके स्पष्ट लक्षण महसूस नहीं होते। यही वजह है कि व्यक्ति सामान्य दिनचर्या में व्यस्त रहता है और उसे पता भी नहीं चलता कि लिवर पर समस्या धीरे-धीरे बढ़ रही है। फैटी लिवर का संबंध केवल शरीर के बढ़ते वजन से जोड़कर देखना सही नहीं है। इसके पीछे मधुमेह, उच्च रक्तचाप और हृदय रोग जैसी मेटाबोलिक समस्याएं भी भूमिका निभा सकती हैं। यानी ऐसा नहीं है कि केवल मोटापे से परेशान लोगों को ही फैटी लिवर का खतरा होता है। खराब खानपान और शारीरिक निष्क्रियता भी जोखिम बढ़ा सकती है।
आइएलबीएस के प्रोफेसर डॉ. अनूप सराया के अनुसार, युवाओं में फैटी लिवर का संबंध कई मेटाबोलिक समस्याओं से जुड़ा हुआ है। फास्ट फूड और अस्वास्थ्यकर भोजन का अधिक सेवन तथा शारीरिक गतिविधि की कमी इस समस्या के जोखिम को बढ़ा सकती है। ऐसे में युवाओं के लिए अपनी जीवनशैली पर ध्यान देना जरूरी है। फैटी लिवर के शुरुआती स्तर पर जीवनशैली में बदलाव महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। वजन को नियंत्रित रखना, नियमित व्यायाम करना और भोजन में अतिरिक्त कैलोरी तथा अधिक मीठे खाद्य पदार्थों की मात्रा कम करना इसके जोखिम को कम करने में मदद कर सकता है। युवाओं को बीमारी सामने आने के बाद ही नहीं, बल्कि उससे पहले ही अपनी जीवनशैली को लेकर सतर्क होना चाहिए। लिवर शरीर के महत्वपूर्ण अंगों में शामिल है और शरीर में कई आवश्यक प्रक्रियाओं में भूमिका निभाता है।
इसलिए लिवर में लगातार बढ़ती चर्बी को सामान्य मानकर छोड़ देना उचित नहीं है। लंबे समय तक फैटी लिवर की स्थिति बनी रहने पर कुछ लोगों में सूजन और फाइब्रोसिस विकसित हो सकता है। फाइब्रोसिस बढ़ने के साथ लिवर की संरचना और कार्यप्रणाली प्रभावित होने लगती है। ग्रेड-2 फैटी लिवर का कम उम्र में सामने आना इसलिए भी चिंता का विषय माना जा रहा है क्योंकि यह जीवनशैली से जुड़ी समस्याओं की ओर संकेत कर सकता है। हालांकि हर व्यक्ति में फैटी लिवर के बढ़कर सिरोसिस में बदलने की स्थिति एक जैसी नहीं होती, लेकिन जोखिम वाले लोगों में नियमित चिकित्सकीय निगरानी और समय पर जीवनशैली में सुधार महत्वपूर्ण हो सकता है।
युवाओं में बढ़ती यह समस्या केवल व्यक्तिगत स्वास्थ्य का विषय नहीं है, बल्कि बदलती दिनचर्या का भी संकेत देती है। लंबे समय तक बैठकर काम करना, शारीरिक गतिविधि के लिए पर्याप्त समय नहीं निकालना और बाहर के तले-भुने या अधिक कैलोरी वाले भोजन पर निर्भरता स्वास्थ्य पर असर डाल सकती है। इसके साथ ही मीठे पेय और अत्यधिक चीनी वाले खाद्य पदार्थों का सेवन भी खानपान की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकता है।
फैटी लिवर से बचाव के लिए वजन नियंत्रण और नियमित व्यायाम जरूरी
फैटी लिवर के जोखिम को कम करने के लिए महत्वपूर्ण कदम जीवनशैली में सुधार है। नियमित शारीरिक गतिविधि को दिनचर्या का हिस्सा बनाना, वजन को स्वस्थ सीमा में बनाए रखना और संतुलित भोजन लेना उपयोगी हो सकता है। फास्ट फूड और अत्यधिक कैलोरी वाले भोजन की मात्रा कम करने के साथ मीठे खाद्य पदार्थों और पेय पदार्थों से दूरी बनाना भी जरूरी है।युवाओं को यह समझने की जरूरत है कि फैटी लिवर केवल बढ़ती उम्र की समस्या नहीं है। कम उम्र में सामने आने वाली यह समस्या शरीर में मौजूद अन्य मेटाबोलिक जोखिमों से भी जुड़ी हो सकती है। यदि किसी व्यक्ति में मोटापा, मधुमेह, उच्च रक्तचाप या अन्य जोखिम मौजूद हैं, तो उसे अपने स्वास्थ्य को लेकर अधिक सजग रहना चाहिए। शारीरिक गतिविधि के लिए जरूरी नहीं कि हर व्यक्ति कठिन व्यायाम ही करे। अपनी क्षमता और चिकित्सकीय सलाह के अनुसार नियमित चलना, व्यायाम या अन्य शारीरिक गतिविधियां दिनचर्या में शामिल की जा सकती हैं। लंबे समय तक लगातार बैठे रहने की आदत को कम करना भी महत्वपूर्ण है।
इसके साथ ही भोजन में संतुलन बनाए रखना जरूरी है। ताजे और पौष्टिक खाद्य पदार्थों को प्राथमिकता देने तथा अत्यधिक प्रसंस्कृत, तले-भुने और ज्यादा चीनी वाले खाद्य पदार्थों का सेवन सीमित करने से समग्र स्वास्थ्य को लाभ मिल सकता है।फैटी लिवर की स्थिति सामने आने पर केवल घरेलू उपायों पर निर्भर रहने के बजाय चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी है। डॉक्टर व्यक्ति की स्थिति, वजन, रक्त जांच और अन्य स्वास्थ्य जोखिमों के आधार पर आगे की जांच और उपचार की सलाह दे सकते हैं। खासतौर पर यदि लिवर में वसा के साथ सूजन या फाइब्रोसिस की आशंका हो तो समय पर चिकित्सकीय मूल्यांकन महत्वपूर्ण हो जाता है।
कुल मिलाकर फैटी लिवर को कम उम्र में भी गंभीरता से लेने की जरूरत है। शुरुआती स्तर पर जीवनशैली में सुधार करके जोखिम को नियंत्रित करने की कोशिश की जा सकती है। स्वस्थ वजन, संतुलित खानपान और नियमित शारीरिक गतिविधि न केवल फैटी लिवर बल्कि मधुमेह, उच्च रक्तचाप और हृदय संबंधी समस्याओं के जोखिम को भी कम करने में मदद कर सकती है। युवाओं में बढ़ते फैटी लिवर के मामलों के बीच समय रहते जागरूकता और जीवनशैली में बदलाव लिवर को लंबे समय तक स्वस्थ रखने की दिशा में अहम कदम हो सकता है।


















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