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जम्मू-कश्मीर में उमर अब्दुल्ला की सरकार में बढ़ी बगावत की आहट, 24 विधायकों ने खोला मोर्चा

जम्मू-कश्मीर की राजनीति में मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की मुश्किलें बढ़ती नजर आ रही हैं। मंत्रिमंडल विस्तार के महज तीन दिन बाद सत्तारूढ़ नेशनल कॉन्फ्रेंस के भीतर असंतोष खुलकर सामने आ गया है। पार्टी के 24 विधायकों के एकजुट होने और सरकार के कामकाज के साथ-साथ संगठन में बदलाव की मांग उठाने से सियासी हलचल तेज हो गई है। नाराज विधायकों ने मुख्यमंत्री और पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के सामने अपनी बात रखने के लिए सामूहिक रणनीति भी तैयार कर ली है। उनकी मांगों में मुख्यमंत्री के सलाहकार को हटाने से लेकर उपमुख्यमंत्री का विभाग वापस लेने और मंत्रिपरिषद के पुनर्गठन तक के मुद्दे शामिल हैं। इस घटनाक्रम ने इसलिए भी राजनीतिक महत्व हासिल कर लिया है, क्योंकि नेशनल कॉन्फ्रेंस के विधायकों की नाराजगी किसी एक पद या विभाग तक सीमित नहीं बताई जा रही। असंतुष्ट गुट सरकार में फैसले लेने की प्रक्रिया, मंत्रियों के चयन में पारदर्शिता और विधायकों की भूमिका को लेकर भी सवाल उठा रहा है। हालांकि, पार्टी नेतृत्व ने इसे बगावत मानने से इनकार किया है और बैठक को सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा बताया है। 

शुक्रवार, 30 अक्टूबर की शाम श्रीनगर में लोलब से विधायक कैसर जमशेद लोन के आवास पर नाराज विधायकों की अहम बैठक हुई। बताया जा रहा है कि इसमें 18 विधायक व्यक्तिगत रूप से शामिल हुए, जबकि छह अन्य विधायक वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये जुड़े। इस तरह कुल 24 विधायकों ने एक साथ आकर अपनी नाराजगी जाहिर की। बैठक में सरकार और संगठन के कामकाज में सुधार के लिए एक सामूहिक प्रस्ताव तैयार किए जाने की जानकारी सामने आई है। इस बैठक को 27 अक्टूबर को हुए मंत्रिमंडल विस्तार से जोड़कर देखा जा रहा है। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने इस विस्तार में अली मोहम्मद सागर, मीर सैफुल्लाह, शमीमा फिरदौस और अल्ताफ अहमद कल्लू को मंत्रिमंडल में शामिल किया था। 

इस फेरबदल में कई ऐसे वरिष्ठ और महत्वाकांक्षी विधायक मंत्री बनने की उम्मीद लगाए बैठे थे, जिन्हें जगह नहीं मिल सकी। माना जा रहा है कि इसी के बाद पार्टी के भीतर नाराजगी बढ़ी और विधायकों ने एकजुट होकर नेतृत्व के सामने अपनी मांगें रखने का फैसला किया। नाराज विधायकों की ओर से तैयार प्रस्ताव में चार प्रमुख मांगें रखे जाने की बात सामने आई है। इनमें सबसे अहम मांग मुख्यमंत्री के सलाहकार नासिर असलम वानी, जिन्हें नासिर सोगामी के नाम से भी जाना जाता है, को पद से हटाने की है। असंतुष्ट विधायकों का आरोप है कि सरकार और पार्टी के प्रशासनिक मामलों में उनका दखल जरूरत से ज्यादा बढ़ गया है। उनका मानना है कि इस तरह की व्यवस्था से निर्वाचित विधायकों की भूमिका प्रभावित हो रही है और कई अहम फैसलों में उनकी राय को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जा रहा। 

दूसरी बड़ी मांग उपमुख्यमंत्री सुरेंद्र चौधरी को पद से हटाने और उनके पास मौजूद लोक निर्माण (आरएंडबी) विभाग वापस लेने की है। विधायकों का तर्क है कि सरकार में जिम्मेदारियों और विभागों का बंटवारा नए सिरे से होना चाहिए। हालांकि, इस मांग के पीछे असंतुष्ट गुट की ओर से कोई विस्तृत सार्वजनिक कारण सामने नहीं आया है, लेकिन इसे मंत्रिमंडल के मौजूदा स्वरूप से जुड़ी नाराजगी का हिस्सा माना जा रहा है। तीसरी मांग उन मंत्रियों को हटाने की है, जो अपने पद पर दो साल का कार्यकाल पूरा कर चुके हैं। विधायकों का कहना है कि मंत्रिमंडल में नए चेहरों को भी अवसर मिलना चाहिए। उनके मुताबिक, समय-समय पर बदलाव से सरकार में नई ऊर्जा आएगी और विधायकों को भी अपनी क्षमता दिखाने का मौका मिलेगा। 

चौथी मांग मंत्रिपरिषद के पुनर्गठन और भविष्य में मंत्रियों की नियुक्ति की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने से संबंधित है। विधायकों का कहना है कि मंत्रियों के चयन में सभी विधायकों से उचित परामर्श किया जाना चाहिए। नियुक्तियां कुछ चुनिंदा लोगों की पसंद के आधार पर नहीं होनी चाहिए। असंतुष्ट विधायकों ने केवल पदों और विभागों में बदलाव की मांग नहीं उठाई है, बल्कि सरकार के चुनावी वादों को लेकर भी जवाबदेही तय करने की बात कही है। प्रस्ताव में चुनाव घोषणापत्र को लागू करने के लिए स्पष्ट रोडमैप तैयार करने की मांग शामिल बताई गई है। विधायकों का मानना है कि जनता से किए गए वादों को पूरा करने की दिशा में सरकार की प्राथमिकताएं और समयसीमा स्पष्ट होनी चाहिए। इससे सरकार के कामकाज में पारदर्शिता बढ़ेगी और विधायकों को भी अपने क्षेत्रों में जनता के सवालों का जवाब देने में आसानी होगी।

फारूक और उमर से मिलकर सौंपेंगे मांग पत्र, पार्टी ने बगावत की खबरों को नकारा

बैठक में आगे की रणनीति तय करते हुए नाराज विधायकों ने एक कमेटी गठित की है। नजीर अहमद गुरेजी और मुजफ्फर इकबाल खान को इस कमेटी का नेतृत्व सौंपे जाने की जानकारी है। यह कमेटी जल्द ही नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला और मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला से मुलाकात करेगी। इस दौरान विधायकों की ओर से तैयार सामूहिक मांग पत्र नेतृत्व को सौंपा जाएगा। इसके बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि पार्टी नेतृत्व इन मांगों पर क्या रुख अपनाता है और सरकार के स्तर पर किस तरह के बदलाव किए जा सकते हैं। बैठक में शामिल विधायकों ने इसे पार्टी के खिलाफ बगावत या सरकार गिराने की कोशिश मानने से इनकार किया है। उनका कहना है कि वे नेशनल कॉन्फ्रेंस के साथ हैं और पार्टी छोड़ने का उनका कोई इरादा नहीं है। 

वे केवल सरकार के कामकाज में सुधार, जवाबदेही और आंतरिक लोकतंत्र को मजबूत करना चाहते हैं। विधायकों का यह भी कहना है कि निर्वाचित प्रतिनिधियों को सरकार के फैसलों में अधिक भागीदारी मिलनी चाहिए, ताकि वे अपने क्षेत्रों की समस्याओं और जनता की अपेक्षाओं को प्रभावी ढंग से सामने रख सकें। दूसरी ओर, पार्टी नेतृत्व ने विधायकों के इस जमावड़े को बगावत के रूप में पेश किए जाने पर आपत्ति जताई है। नेशनल कॉन्फ्रेंस के प्रांतीय अध्यक्ष शौकत अहमद मीर ने ऐसी खबरों को खारिज करते हुए बैठक को सामान्य और नियमित बताया है। पार्टी की ओर से यह संदेश देने की कोशिश की गई है कि संगठन के भीतर कोई बड़ा संकट नहीं है और विधायकों के बीच बातचीत को असंतोष या विद्रोह का रूप देना उचित नहीं है। 

हालांकि, 24 विधायकों का एक साथ बैठक करना और नेतृत्व के सामने चार प्रमुख मांगें रखने की तैयारी करना पार्टी के लिए सामान्य घटनाक्रम से अधिक अहम माना जा रहा है। खासकर तब, जब मंत्रिमंडल विस्तार के तुरंत बाद यह नाराजगी सामने आई है। इससे साफ है कि पार्टी के भीतर मंत्रियों के चयन और सरकार के कामकाज को लेकर मतभेद मौजूद हैं। अब सबकी नजरें प्रस्तावित मुलाकात पर टिकी हैं। फारूक और उमर अब्दुल्ला के साथ बातचीत में यदि कोई सहमति बनती है तो पार्टी इस असंतोष को आंतरिक संवाद के जरिये संभाल सकती है। लेकिन मांगों को नजरअंदाज किए जाने की स्थिति में यह खींचतान और गहरा सकती है। 

जम्मू-कश्मीर की 90 सदस्यीय विधानसभा में नेशनल कॉन्फ्रेंस के पास फिलहाल 41 विधायक हैं। पार्टी ने कांग्रेस और निर्दलीय विधायकों के समर्थन से सरकार बनाई है। ऐसे में पार्टी के भीतर 24 विधायकों का एकजुट होकर मांगें उठाना उमर अब्दुल्ला के लिए राजनीतिक और प्रशासनिक चुनौती बन सकता है। फिलहाल असंतुष्ट विधायक इसे सुधार की पहल बता रहे हैं, जबकि पार्टी नेतृत्व बगावत की किसी भी आशंका को खारिज कर रहा है। आने वाले दिनों में शीर्ष नेतृत्व के साथ होने वाली बातचीत ही तय करेगी कि यह असंतोष बातचीत से शांत होता है या नेशनल कॉन्फ्रेंस के भीतर सियासी टकराव का नया दौर शुरू होता है।

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