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शिमला के अस्पताल में नवजात की अदला-बदली पर अदालत सख्त, हिमाचल सरकार को 30 लाख मुआवजा देने का आदेश

सरकारी अस्पतालों में इलाज के दौरान होने वाली छोटी-सी लापरवाही भी किसी परिवार की जिंदगी पर कितना गहरा असर डाल सकती है, इसका गंभीर उदाहरण शिमला का चर्चित नवजात अदला-बदली मामला है। करीब एक दशक पुराने इस मामले में अदालत ने साफ संदेश दिया है कि अस्पताल में ड्यूटी के दौरान कर्मचारियों और चिकित्सकों की लापरवाही की जिम्मेदारी से सरकार बच नहीं सकती। शिमला की सिविल जज कोर्ट नंबर-5 ने प्रसव के दौरान हुई गंभीर लापरवाही के लिए हिमाचल प्रदेश सरकार को पीड़िता शीतल ठाकुर को 30 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया है। अदालत ने माना कि अस्पताल की लापरवाही के कारण माता-पिता लंबे समय तक अपने ही नवजात बच्चे के प्राकृतिक प्यार और स्नेह से वंचित रहे और उन्हें गहरी मानसिक पीड़ा से गुजरना पड़ा। सिविल जज सुष्मिता शर्मा की अदालत का यह फैसला केवल मुआवजे तक सीमित नहीं है, बल्कि सरकारी अस्पतालों में मरीजों की देखभाल और नवजात बच्चों की पहचान को लेकर बरती जाने वाली सावधानी पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि सरकारी अस्पतालों में तैनात चिकित्सकों और कर्मचारियों की ड्यूटी के दौरान हुई लापरवाही के लिए राज्य सरकार की वाइकेरियस लायबिलिटी यानी परोक्ष जिम्मेदारी बनती है। इसका अर्थ है कि सरकारी संस्थान में कर्मचारी की ड्यूटी के दौरान हुई लापरवाही के परिणाम की जवाबदेही सरकार से भी तय की जा सकती है।

यह मामला संजौली निवासी शीतल ठाकुर से जुड़ा है। वह 26 मई 2016 को प्रसव के लिए शिमला के कमला नेहरू अस्पताल में भर्ती हुई थीं। रात करीब 11:10 बजे उन्हें प्रसव कक्ष में ले जाया गया। परिवार के लिए यह बेहद भावुक और खुशी का समय था, लेकिन प्रसव के बाद जो हुआ, उसने इस खुशी को लंबे समय तक दर्द और चिंता में बदल दिया। प्रसव के बाद ड्यूटी पर मौजूद आया ने परिवार को बताया कि शीतल ने बेटे को जन्म दिया है। परिवार में खुशी का माहौल बन गया। लेकिन कुछ ही देर बाद जब महिला को नवजात सौंपा गया तो वह बच्ची थी। इतना ही नहीं, नवजात के कपड़े भी बदले हुए थे। परिवार को यह बात संदिग्ध लगी और उन्होंने अस्पताल के कर्मचारियों के सामने तत्काल आपत्ति दर्ज कराई।

परिवार की आशंका को गंभीरता से लेकर तत्काल कार्रवाई किए जाने की जरूरत थी, लेकिन आरोप है कि उनकी शिकायत पर उस समय कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। इसके बाद परिवार ने मामले की सच्चाई जानने के लिए निजी प्रयोगशाला में डीएनए जांच कराई। जांच के नतीजे ने अस्पताल की व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया। रिपोर्ट में सामने आया कि अस्पताल से दी गई बच्ची शीतल और उनके पति की जैविक संतान नहीं थी। इसके बाद मामला कानूनी प्रक्रिया में पहुंचा। उच्च न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत डीएनए मिलान कराया गया। इस जांच से दोनों नवजातों के वास्तविक जैविक माता-पिता की पहचान हो सकी। इसके बाद शीतल को उनका बेटा वापस मिल सका। हालांकि, बच्चे के वापस मिलने के बावजूद परिवार को जिस मानसिक और भावनात्मक पीड़ा से गुजरना पड़ा, उसकी भरपाई आसान नहीं थी।

शीतल ने इसके बाद न्याय और मुआवजे की मांग को लेकर सिविल कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उनका पक्ष था कि अस्पताल में हुई लापरवाही ने उन्हें और उनके परिवार को असहनीय मानसिक पीड़ा दी। एक मां को अपने ही बच्चे के जन्म के बाद उसे पहचानने और उसके साथ रहने के अधिकार से वंचित होना पड़ा। दूसरी ओर, परिवार को लंबे समय तक यह पता ही नहीं था कि उनके पास जो बच्चा है, वह उनका अपना है या नहीं। मामले की सुनवाई के दौरान हिमाचल प्रदेश सरकार की ओर से अस्पताल में किसी भी तरह की लापरवाही से इनकार किया गया। सरकारी पक्ष ने एक महिला अटेंडेंट के बयान का हवाला देते हुए दलील दी कि प्रसव के दौरान किसी ने कोई शिकायत नहीं की थी। सरकार की ओर से अस्पताल की जांच रिपोर्ट को भी अदालत के सामने रखा गया।

हालांकि, अदालत ने सरकारी पक्ष की जांच रिपोर्ट और उसकी दलीलों को विश्वसनीय नहीं माना। कोर्ट ने जांच रिपोर्ट की प्रक्रिया और उसकी विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल उठाए। अदालत ने पाया कि रिपोर्ट में न तो जांच की तारीख दर्ज थी और न ही गवाहों के बयानों और दस्तावेजों का स्पष्ट विवरण मौजूद था। यहां तक कि जांच से जुड़े गवाह भी यह स्पष्ट रूप से नहीं बता सके कि जांच किसने और कब की थी। अदालत ने माना कि ऐसी परिस्थितियों में केवल जांच रिपोर्ट के आधार पर अस्पताल को लापरवाही से मुक्त नहीं किया जा सकता। खास तौर पर तब, जब डीएनए जांच से यह साबित हो चुका था कि परिवार को अस्पताल से गलत नवजात सौंपा गया था।

अस्पतालों की जवाबदेही पर अदालत की कड़ी टिप्पणी

अदालत ने अपने फैसले में माना कि इस घटना का असर केवल कुछ घंटों या दिनों तक सीमित नहीं रहा। अस्पताल की लापरवाही के कारण माता-पिता अपने नवजात बच्चे के प्राकृतिक प्यार और स्नेह से लंबे समय तक वंचित रहे। उन्हें अपने बच्चे की पहचान और उसके भविष्य को लेकर गंभीर मानसिक तनाव झेलना पड़ा। एक मां के लिए प्रसव के बाद अपने बच्चे से अलग होना और फिर यह पता चलना कि अस्पताल से उसे गलत बच्चा सौंप दिया गया, बेहद गंभीर मानसिक आघात की स्थिति है। कोर्ट ने इसी नुकसान को ध्यान में रखते हुए रेस्टिट्यूटियो इन इंटीग्रम के सिद्धांत को लागू किया। इस सिद्धांत का मूल उद्देश्य किसी व्यक्ति को दूसरे की गलती, लापरवाही या गलत कृत्य से हुए नुकसान की यथासंभव भरपाई करना है। अदालत ने माना कि शीतल और उनके परिवार को जो मानसिक पीड़ा और नुकसान हुआ, उसकी भरपाई जरूरी है।

इसी आधार पर अदालत ने वाद स्वीकार करते हुए हिमाचल प्रदेश सरकार को शीतल ठाकुर को 30 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया। अदालत का यह फैसला सरकारी अस्पतालों के लिए एक महत्वपूर्ण चेतावनी के तौर पर देखा जा रहा है। नवजात बच्चों की पहचान, उनके अभिलेख, प्रसव के बाद मां को बच्चे सौंपने की प्रक्रिया और अस्पताल कर्मचारियों की जिम्मेदारी में किसी भी स्तर की लापरवाही बेहद गंभीर परिणाम पैदा कर सकती है। ऐसे मामलों में केवल कर्मचारी की गलती बताकर संस्थान या सरकार अपनी जिम्मेदारी से अलग नहीं हो सकती। यह फैसला अस्पताल प्रशासन के लिए भी एक स्पष्ट संदेश है कि मरीजों और नवजातों की सुरक्षा केवल कागजी प्रक्रिया नहीं हो सकती। जन्म के बाद बच्चे की सही पहचान सुनिश्चित करना अस्पताल की सबसे बुनियादी जिम्मेदारियों में शामिल है। एक छोटी-सी चूक भी किसी परिवार को वर्षों तक मानसिक पीड़ा दे सकती है।

शिमला के इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि परिवार ने संदेह होने पर मामले को दबने नहीं दिया। निजी स्तर पर डीएनए जांच कराने से लेकर न्यायिक प्रक्रिया तक लड़ाई जारी रखी गई और आखिरकार अदालत ने उनकी पीड़ा को स्वीकार किया। करीब दस साल पुराने इस मामले में आया फैसला यह भी बताता है कि चिकित्सा संस्थानों में जवाबदेही और पारदर्शिता कितनी जरूरी है। अदालत का 30 लाख रुपये मुआवजे का आदेश पीड़ित परिवार के नुकसान की पूरी भरपाई तो नहीं कर सकता, लेकिन यह सरकारी अस्पतालों को अपनी व्यवस्थाओं और कर्मचारियों की जवाबदेही को लेकर अधिक सतर्क रहने का मजबूत संदेश जरूर देता है। अस्पताल में आने वाला हर मरीज और हर नवजात किसी परिवार की उम्मीद होता है। इसलिए उनकी सुरक्षा और पहचान में किसी भी तरह की लापरवाही को सामान्य गलती मानना व्यवस्था के लिए बेहद गंभीर भूल साबित हो सकती है।

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