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सहजन का पेड़ नहीं, सेहत का खजाना है ‘मिरेकल ट्री’, पत्तियों से फलियों तक पोषक तत्वों से भरपूर

अगर किसी ऐसे पेड़ की बात करें, जो कम पानी में भी आसानी से उग जाए, जिसकी फलियां भारतीय रसोई का हिस्सा हों और जिसकी पत्तियों को पोषक तत्वों से भरपूर माना जाता हो, तो सहजन का नाम सबसे पहले सामने आता है। दुनिया के कई हिस्सों में सहजन को ‘मिरेकल ट्री’ यानी जादुई पेड़ के नाम से भी जाना जाता है। भारत में यह पेड़ कोई अनजाना नाम नहीं है। गांवों से लेकर शहरों तक इसकी फलियां सब्जी के रूप में इस्तेमाल की जाती हैं, जबकि इसकी पत्तियों को भी भोजन में शामिल किया जाता है। यही वजह है कि सहजन अब पारंपरिक सब्जी से आगे बढ़कर पोषण और खाद्य विविधता के क्षेत्र में भी चर्चा का विषय बना हुआ है। सहजन का वैज्ञानिक नाम Moringa oleifera है। यह ऐसा पेड़ है जो गर्म और अपेक्षाकृत शुष्क परिस्थितियों में भी उग सकता है। इसकी खेती के लिए बहुत अधिक पानी की आवश्यकता नहीं होती, इसलिए कम पानी वाले क्षेत्रों में भी इसे उगाना संभव माना जाता है। भारत सहजन की खेती और उत्पादन के प्रमुख देशों में शामिल है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक देश में हर साल करीब 10 से 13 लाख टन सहजन की फलियों का उत्पादन होता है।

भारत के अलग-अलग हिस्सों में सहजन को अलग-अलग नामों से जाना जाता है। कहीं इसे सहजन कहा जाता है तो दक्षिण भारत में इसके लिए मुरुंगई जैसे नाम प्रचलित हैं। कई क्षेत्रों में इसे शैवगा और मुनगाकाया के नाम से भी जाना जाता है। नाम भले ही अलग हों, लेकिन पेड़ और उसके उपयोग से लोगों की पहचान काफी पुरानी है।सहजन की खासियत केवल इसकी फलियों तक सीमित नहीं है। इसकी पत्तियां, फूल और बीज भी अलग-अलग तरीकों से इस्तेमाल किए जाते हैं। सहजन की कोमल पत्तियों को सब्जी, साग या अन्य खाद्य पदार्थों में मिलाया जाता है। वहीं फलियों का इस्तेमाल दाल और सब्जियों में किया जाता है। कुछ जगहों पर सहजन के फूलों को भी भोजन में शामिल करने की परंपरा है।

सहजन की पत्तियों को खास तौर पर पोषक तत्वों का अच्छा स्रोत माना जाता है। इनमें प्रोटीन, फाइबर और कई तरह के विटामिन तथा खनिज पाए जाते हैं। हालांकि इनकी वास्तविक पोषण मात्रा मिट्टी, जलवायु, पौधे की उम्र और इस्तेमाल किए गए हिस्से के आधार पर अलग-अलग हो सकती है। सहजन को लेकर वैज्ञानिक शोध भी लगातार सामने आते रहे हैं। वर्ष 2024 में विज्ञान पत्रिका ‘हेलियॉन’ में प्रकाशित एक समीक्षा अध्ययन में सहजन की पत्तियों में कई जैव सक्रिय यौगिकों की मौजूदगी का उल्लेख किया गया। इनमें फ्लेवोनॉयड्स, एल्कलॉइड्स और कैरोटेनॉयड्स जैसे यौगिक शामिल हैं। इन यौगिकों की वजह से सहजन की पत्तियों को पोषण और खाद्य विज्ञान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण माना जाता है। हालांकि किसी खाद्य पदार्थ में इन यौगिकों की मौजूदगी का मतलब यह नहीं है कि वह अपने आप किसी बीमारी का इलाज कर सकता है।

सहजन की एक और विशेषता इसकी अनुकूलन क्षमता है। यह पेड़ कई तरह की मिट्टी और जलवायु परिस्थितियों में उग सकता है। कम पानी में भी इसके विकसित होने की क्षमता इसे छोटे किसानों और शुष्क क्षेत्रों के लिए उपयोगी फसल बनाती है। इसके अलावा पेड़ की पत्तियों और फलियों का उपयोग भोजन के रूप में होने के कारण इसका महत्व केवल खेती तक सीमित नहीं रहता।

फलियों से पत्तियों तक, क्यों खास है सहजन

भारत में सहजन का इस्तेमाल सदियों से पारंपरिक भोजन का हिस्सा रहा है। इसकी फलियों से बनने वाली सब्जी और दाल कई क्षेत्रों के खानपान में शामिल है। दक्षिण भारत के कई व्यंजनों में भी सहजन की फली का विशेष इस्तेमाल किया जाता है। इस तरह यह पेड़ स्थानीय खाद्य संस्कृति से गहराई से जुड़ा हुआ है। सहजन की पत्तियों में मौजूद पोषक तत्वों के कारण इन्हें संतुलित आहार का हिस्सा बनाया जा सकता है। इनमें आयरन, कैल्शियम, पोटैशियम और विटामिन जैसे पोषक तत्व पाए जाते हैं, हालांकि इनकी मात्रा पौधे और प्रसंस्करण के तरीके के अनुसार बदल सकती है। पत्तियों को ताजा सब्जी के रूप में खाने के अलावा कई जगह सुखाकर पाउडर के रूप में भी इस्तेमाल किया जाता है।

सहजन के बीज भी उपयोगी माने जाते हैं। इनसे तेल निकाला जाता है, जिसका इस्तेमाल खाद्य और गैर-खाद्य दोनों क्षेत्रों में किया जाता है। सहजन के बीजों और तेल पर भी वैज्ञानिक स्तर पर विभिन्न अध्ययन हुए हैं। हालांकि किसी भी पारंपरिक या प्राकृतिक उत्पाद के औषधीय इस्तेमाल से पहले वैज्ञानिक प्रमाण और उचित चिकित्सकीय सलाह को महत्व देना जरूरी है। सहजन की खेती का आर्थिक पहलू भी महत्वपूर्ण है। इसके पेड़ से एक से अधिक हिस्से उपयोग में आते हैं, इसलिए किसानों के लिए इसके अलग-अलग उत्पाद आय का माध्यम बन सकते हैं। फलियों की बाजार में मांग रहती है, जबकि पत्तियों और बीजों का इस्तेमाल खाद्य, पोषण तथा अन्य उत्पादों में किया जाता है।

भारत के अलावा फिलीपींस, श्रीलंका, मलेशिया, इंडोनेशिया और ताइवान जैसे देशों में भी सहजन की खेती होती है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सहजन को पोषण, कृषि और खाद्य सुरक्षा से जुड़े विषयों के संदर्भ में देखा जा रहा है। खास तौर पर ऐसे क्षेत्रों में जहां पानी की उपलब्धता सीमित है, कम पानी में उगने वाली फसलों का महत्व बढ़ जाता है। हालांकि सहजन को लेकर इंटरनेट और सोशल मीडिया पर कई तरह के स्वास्थ्य संबंधी दावे किए जाते हैं। इनमें से हर दावे को वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित मानना उचित नहीं है। सहजन निश्चित रूप से पोषक तत्वों वाला खाद्य पदार्थ है, लेकिन इसे किसी बीमारी की दवा या इलाज का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए। संतुलित आहार में इसे शामिल करना अलग बात है और किसी बीमारी के उपचार के लिए इसका इस्तेमाल करना अलग।

यही वजह है कि सहजन को ‘मिरेकल ट्री’ कहे जाने के पीछे इसकी बहुउपयोगिता को समझना अधिक उचित है। इसकी फलियां भोजन का हिस्सा हैं, पत्तियों में कई पोषक तत्व और जैव सक्रिय यौगिक पाए जाते हैं, बीजों से तेल मिलता है और पेड़ कम पानी में भी उग सकता है। यानी एक ही पेड़ भोजन, खेती और पोषण तीनों स्तरों पर उपयोगी साबित होता है। भारत में सदियों से रसोई का हिस्सा रहा यह पेड़ अब आधुनिक पोषण विज्ञान में भी ध्यान आकर्षित कर रहा है। यही कारण है कि सहजन केवल गांवों और घरों की पारंपरिक सब्जी तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि बदलते समय में पोषण और टिकाऊ कृषि के संदर्भ में भी इसकी उपयोगिता पर चर्चा बढ़ रही है। 

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