जिस संस्था पर देश के हर नागरिक के मताधिकार की निगरानी और चुनाव प्रक्रिया को निष्पक्ष बनाए रखने की जिम्मेदारी है, वही चुनाव आयोग इन दिनों सबसे बड़े राजनीतिक और संवैधानिक विवाद के केंद्र में है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर विपक्ष के गंभीर आरोपों के बीच चुनाव आयोग के भीतर ही दो चुनाव आयुक्तों की कथित लिखित आपत्तियों ने विवाद को और गहरा दिया है। 23 सितंबर को सामने आई इंडियन एक्सप्रेस की खोजी रिपोर्ट में दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार आयोग के फैसलों और प्रक्रियाओं पर आधिकारिक आपत्ति दर्ज कराई। इनमें नए मतदाताओं के पंजीकरण, मतदाता सूची से नाम हटाने, अपील और मतदाता सूची से जुड़े डिजिटल तंत्र तक अधिकारियों की पहुंच जैसे गंभीर मुद्दे शामिल बताए गए हैं। दोनों आयुक्तों ने कुछ कदमों को ‘अनधिकृत’ और ‘गैरकानूनी’ तक बताया। विवाद की जड़ विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर है। बिहार से जून 2025 में शुरू हुआ यह अभियान बाद में दूसरे राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों तक पहुंचा। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में एसआईआर की प्रारंभिक मतदाता सूचियों से 13 करोड़ से अधिक नाम हटाए गए।
यह संख्या अंतिम रूप से मताधिकार से वंचित लोगों की संख्या नहीं मानी जा सकती, क्योंकि पुनरीक्षण प्रक्रिया में मृत, स्थानांतरित, अनुपस्थित या दोहरी प्रविष्टियों की जांच और दावे-आपत्तियों के बाद नाम बहाल करने की व्यवस्था भी होती है। पश्चिम बंगाल में ही आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि 27.16 लाख नाम हटाए गए और इनमें से 22 लाख से अधिक मतदाताओं ने पुनः शामिल किए जाने के लिए अपील की। लेकिन अब सवाल सिर्फ एसआईआर से हटे नामों का नहीं है। सवाल यह है कि क्या चुनाव आयोग के भीतर ही इस प्रक्रिया को लेकर मतभेद इतने गहरे थे कि दो चुनाव आयुक्तों को बार-बार लिखित आपत्तियां दर्ज करानी पड़ीं। रिपोर्ट के मुताबिक एक मामले में संधू ने आयोग की कार्रवाई को दोनों आयुक्तों की लिखित सलाह के विपरीत बताते हुए ‘अनधिकृत और गैरकानूनी’ बताया। दोनों आयुक्तों ने चुनावी आंकड़ों और मतदाता सूची के डिजिटल ढांचे के केंद्रीकरण को लेकर भी सवाल उठाए और इस संबंध में कैबिनेट सचिव तक अपनी चिंताएं पहुंचाईं। सबसे ज्यादा विवाद फॉर्म-6 को लेकर सामने आया। नए मतदाता के रूप में नाम दर्ज कराने के लिए भरे जाने वाले इस फॉर्म में एसआईआर से जुड़ा एक सवाल जोड़ा गया था कि आवेदक, उसके माता-पिता या दादा-दादी का नाम पिछली गहन पुनरीक्षण वाली मतदाता सूची में मौजूद था या नहीं।
एसआईआर और चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेदों की रिपोर्ट सामने आने के बाद केंद्र सरकार पर भी राजनीतिक दबाव बढ़ा है। विपक्ष इस पूरे मामले को केंद्र सरकार और चुनाव आयोग के संबंधों से जोड़कर सवाल उठा रहा है। इसकी वजह यह भी है कि वर्तमान चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति 2023 के कानून के तहत गठित चयन प्रक्रिया से हुई थी और विपक्ष पहले से ही इस नियुक्ति व्यवस्था को लेकर सवाल उठाता रहा है। हालांकि इन राजनीतिक आरोपों को केंद्र सरकार की ओर से स्वीकार किया जाना अलग बात है और उपलब्ध रिपोर्टों में सरकार की ओर से ऐसा कोई निष्कर्ष सामने नहीं आया है कि चुनाव आयोग ने अवैध तरीके से काम किया। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक तीन सदस्यीय आयोग की सितंबर 9 को चार महीने बाद पहली पूर्ण बैठक हुई। इससे पहले दो आयुक्तों की ओर से लगातार दर्ज की गई आपत्तियों ने आयोग के अंदर की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए।
यही वजह है कि राजनीतिक विवाद अब केवल एसआईआर में कितने नाम हटे, इस सवाल तक सीमित नहीं है। चर्चा अब चुनाव आयोग के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया, डिजिटल मतदाता डेटाबेस की पहुंच, नए मतदाताओं के पंजीकरण और आयोग की संस्थागत पारदर्शिता तक पहुंच गई है। वहीं आयोग के सामने दूसरी चुनौती अदालतों की है। सुप्रीम कोर्ट और बॉम्बे हाई कोर्ट में पहुंची याचिकाएं इस विवाद को राजनीतिक बहस से निकालकर न्यायिक जांच के दायरे में ले जा रही हैं। पश्चिम बंगाल में पहले से सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में एसआईआर से जुड़े दावे-आपत्तियों और अपीलों की प्रक्रिया चल रही है। अब मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ दायर नई याचिकाओं में भी आयोग के फैसलों और आंतरिक प्रक्रियाओं की जांच की मांग की जा रही है।
ज्ञानेश कुमार ने 19 फरवरी 2025 को मुख्य चुनाव आयुक्त का पद संभाला था
आगरा में जन्मे ज्ञानेश कुमार 1988 बैच के केरल कैडर के आईएएस अधिकारी हैं। उन्होंने आईआईटी कानपुर से बीटेक किया और हार्वर्ड से पर्यावरणीय अर्थशास्त्र की पढ़ाई की। मई 2022 से जनवरी 2024 तक वह सहकारिता मंत्रालय के सचिव रहे। 15 मार्च 2024 को उन्हें चुनाव आयुक्त नियुक्त किया गया। राजीव कुमार के सेवानिवृत्त होने के बाद 19 फरवरी 2025 को उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त का पद संभाला। उनके प्रशासनिक करियर में संसदीय कार्य मंत्रालय और गृह मंत्रालय समेत कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां रही हैं। जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 से जुड़े प्रशासनिक बदलाव के समय भी वह गृह मंत्रालय में अतिरिक्त सचिव थे।
अयोध्या मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद राम मंदिर निर्माण ट्रस्ट और सुन्नी वक्फ बोर्ड को जमीन दिए जाने की प्रक्रिया से जुड़े सरकारी काम में भी उनकी भूमिका रही। उनका कार्यकाल जनवरी 2029 तक है। अब उनके कार्यकाल का सबसे बड़ा विवाद एसआईआर बन गया है। एक तरफ विपक्ष उन पर चुनाव आयोग की निष्पक्षता और मतदाता सूची को लेकर गंभीर आरोप लगा रहा है, दूसरी तरफ आयोग एसआईआर को मतदाता सूची की शुद्धता और सत्यापन की प्रक्रिया के रूप में देखता है।
इस बीच आयोग के दो सदस्यों की कथित लिखित आपत्तियों ने विवाद को नई गंभीरता दे दी है। फिलहाल इस पूरे मामले में तीन मोर्चे एक साथ खुल गए हैं। सड़क पर विपक्ष का आंदोलन, अदालतों में कानूनी चुनौती और चुनाव आयोग के भीतर सामने आई कथित असहमति। 13 करोड़ से अधिक नामों से जुड़ा एसआईआर आंकड़ा, पश्चिम बंगाल की लाखों अपीलें, फॉर्म-6 में बदलाव और मतदाता डेटाबेस की पहुंच जैसे सवाल अब राष्ट्रीय बहस का हिस्सा हैं। आने वाले दिनों में अदालतों और चुनाव आयोग के आधिकारिक जवाब से यह स्पष्ट होना बाकी है कि इन आरोपों पर कानूनी और संस्थागत रूप से क्या निष्कर्ष निकलता है।


















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