देश के बड़े शहरों से लेकर छोटे शहरों तक अपना घर खरीदने का सपना अब पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा महंगा हो गया है। मकान खरीदने की योजना बना रहे लोगों को जहां एक ओर बढ़ती जमीन की कीमतों का सामना करना पड़ रहा है, वहीं दूसरी ओर निर्माण सामग्री और निर्माण से जुड़ी लागत में लगातार इजाफा हुआ है। इसका सीधा असर तैयार मकानों की कीमतों पर पड़ा है। रियल एस्टेट क्षेत्र के आंकड़ों से पता चलता है कि बीते पांच वर्षों में आवासीय संपत्तियों की कीमतों में औसतन करीब 59 प्रतिशत की बड़ी बढ़ोतरी हुई है। एनारॉक के आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2021 में आवासीय संपत्तियों की औसत बिक्री कीमत करीब 5,826 रुपये प्रति वर्ग फुट थी। वर्ष 2025 तक यह बढ़कर 9,260 रुपये प्रति वर्ग फुट पहुंच गई। यानी महज चार साल की अवधि में घर खरीदने की लागत में बड़ा बदलाव आया। इसका मतलब यह है कि जिस मकान की कीमत कुछ वर्ष पहले मध्यम आय वर्ग के परिवार के बजट के भीतर दिखाई देती थी, वही संपत्ति अब अधिक बड़ी वित्तीय चुनौती बन चुकी है।
मकानों की कीमतों में यह वृद्धि केवल महानगरों तक सीमित नहीं है। शहरों में बढ़ती आबादी, रोजगार के अवसरों का केंद्रीकरण, बेहतर परिवहन सुविधाओं की मांग और सीमित जमीन उपलब्ध होने के कारण आवासीय जमीन की कीमतों पर लगातार दबाव बना हुआ है। इसके साथ ही निर्माण सामग्री, श्रमिकों की लागत और परियोजनाओं से जुड़े दूसरे खर्चों में वृद्धि ने डेवलपर्स की कुल लागत बढ़ा दी है।
आवासीय परियोजनाओं की निर्माण लागत में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2021 में एक मानक से बेहतर श्रेणी की आवासीय परियोजना की औसत निर्माण लागत करीब 2,681 रुपये प्रति वर्ग फुट थी। वर्ष 2025 में यह बढ़कर 3,604 रुपये प्रति वर्ग फुट हो गई। यानी चार वर्षों के दौरान निर्माण लागत में लगभग 34 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मकानों की बिक्री कीमत और निर्माण लागत दोनों बढ़ी हैं, लेकिन बिक्री कीमत की रफ्तार निर्माण लागत की तुलना में ज्यादा रही। आवासीय संपत्तियों की कीमतों में इस अवधि के दौरान लगभग 12 प्रतिशत की वार्षिक चक्रवृद्धि दर से बढ़ोतरी हुई, जबकि निर्माण लागत में सालाना वृद्धि करीब 6.9 प्रतिशत रही।
इस अंतर ने रियल एस्टेट बाजार की पूरी तस्वीर को बदल दिया है। डेवलपर्स के लिए जमीन खरीदना, परियोजना तैयार करना और उसे बाजार तक पहुंचाना पहले की तुलना में महंगा हुआ है। दूसरी तरफ खरीदारों के लिए बढ़ती कीमतों के साथ गृह ऋण की किस्त, पंजीकरण शुल्क, रखरखाव और अन्य खर्चों का बोझ भी बढ़ता है। परिणामस्वरूप मध्यम वर्ग के परिवारों को घर खरीदने के लिए पहले से ज्यादा बचत और लंबी अवधि की वित्तीय योजना बनानी पड़ रही है। आवासीय बाजार में कीमत बढ़ने के पीछे एक बड़ा कारण जमीन की कीमतों में तेजी भी है। शहरों के विस्तार के साथ अच्छी लोकेशन वाली जमीन सीमित होती जा रही है। जिस क्षेत्र में पहले अपेक्षाकृत कम कीमत पर जमीन उपलब्ध थी, वहां सड़क, मेट्रो, एक्सप्रेसवे, रोजगार केंद्र और दूसरी सुविधाएं विकसित होने के बाद जमीन के दाम तेजी से बढ़ जाते हैं। डेवलपर्स के लिए जमीन परियोजना की शुरुआती और सबसे महत्वपूर्ण लागतों में शामिल होती है। इसलिए जमीन की कीमत बढ़ने का असर अंततः तैयार मकान की कीमत पर भी दिखाई देता है।
एनारॉक के मुताबिक, वर्ष 2021 से 2025 के बीच घरों की कीमतों में हुई कुल बढ़ोतरी का करीब 66 प्रतिशत हिस्सा निर्माण लागत से जुड़ा रहा। यानी मकान महंगे होने में निर्माण क्षेत्र की बढ़ती लागत की भूमिका काफी बड़ी रही। हालांकि कीमतों में शेष करीब 34 प्रतिशत बढ़ोतरी के पीछे जमीन की कीमत, डेवलपर का लाभ मार्जिन और बाजार में मांग तथा आपूर्ति के बीच का अंतर जैसे कई दूसरे कारण भी जिम्मेदार रहे।
बढ़ती मांग ने भी बाजार को मजबूत किया है। महामारी के बाद लोगों की आवासीय जरूरतों और घर खरीदने की प्राथमिकताओं में बदलाव आया। बेहतर घर, बड़े आकार की संपत्ति, सुविधाओं से युक्त आवासीय परियोजनाओं और शहर के प्रमुख क्षेत्रों के नजदीक रहने की मांग बढ़ी। वहीं प्रमुख शहरों में उपलब्ध जमीन सीमित होने के कारण नई परियोजनाओं के लिए जमीन हासिल करना आसान नहीं रहा। इससे मांग और आपूर्ति के बीच अंतर पैदा हुआ और कई क्षेत्रों में कीमतों पर ऊपर की ओर दबाव बना।
जमीन की कीमतों ने बढ़ाई सबसे बड़ी चुनौती, एनसीआर और बेंगलुरु में तेज उछाल
आवासीय संपत्तियों की बढ़ती कीमतों की कहानी को समझने के लिए जमीन की कीमतों में हुए बदलाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। एनारॉक के ताजा आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2021 से 2026 की पहली छमाही के बीच देश के सात प्रमुख शहरों में जमीन की कीमतों में करीब 50 प्रतिशत से लेकर 120 प्रतिशत तक की वृद्धि हुई है। इसका सबसे ज्यादा असर उन शहरों में दिखाई दिया है जहां रोजगार, उद्योग, सूचना प्रौद्योगिकी, परिवहन और बुनियादी ढांचे का तेजी से विस्तार हुआ है।
राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र और बेंगलुरु में जमीन की कीमतों में सबसे तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई। आंकड़ों के मुताबिक, इस अवधि में राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में जमीन की कीमतें लगभग 70 से 130 प्रतिशत तक बढ़ीं। वहीं बेंगलुरु में जमीन की कीमतों में करीब 60 से 120 प्रतिशत तक की वृद्धि हुई।
जमीन के दाम बढ़ने के कई कारण हैं। शहरों में आबादी का दबाव बढ़ना, नए रोजगार केंद्रों का विकसित होना, बेहतर सड़क और सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था तथा प्रमुख कारोबारी क्षेत्रों के आसपास आवासीय मांग में वृद्धि इसके प्रमुख कारण हैं। किसी क्षेत्र में जब बुनियादी ढांचा तेजी से विकसित होता है तो वहां जमीन की मांग बढ़ जाती है। जमीन की उपलब्धता सीमित होने के कारण इसका सीधा प्रभाव कीमतों पर पड़ता है। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र इसका बड़ा उदाहरण है। दिल्ली के आसपास नोएडा, गुरुग्राम, ग्रेटर नोएडा और दूसरे विकसित होते इलाकों में पिछले कुछ वर्षों में आवासीय और व्यावसायिक गतिविधियों का विस्तार हुआ है। एक्सप्रेसवे, मेट्रो और दूसरे परिवहन साधनों के विस्तार ने कई क्षेत्रों को प्रमुख आवासीय बाजार में बदल दिया है। इसके साथ ही रोजगार केंद्रों के नजदीक घर खरीदने की मांग भी बढ़ी है।
बेंगलुरु में भी सूचना प्रौद्योगिकी और कारोबारी गतिविधियों के विस्तार ने आवासीय बाजार को लगातार मजबूत किया है। शहर के अलग-अलग हिस्सों में रोजगार केंद्रों और नई परियोजनाओं के विकास के साथ जमीन की मांग बढ़ी। इसका प्रभाव नए आवासीय प्रोजेक्ट की कीमतों पर पड़ा। आने वाले समय में घरों की कीमतों को प्रभावित करने वाले कारकों में जमीन की उपलब्धता, निर्माण सामग्री की कीमत, श्रम लागत, बुनियादी ढांचे का विकास और खरीदारों की मांग प्रमुख रहेंगे। यदि जमीन और निर्माण लागत में तेजी बनी रहती है तो तैयार मकानों की कीमतों पर भी दबाव बना रह सकता है। हालांकि इसका दूसरा पहलू यह है कि बढ़ती कीमतों के बावजूद आवासीय संपत्तियों की मांग कई प्रमुख शहरों में मजबूत बनी हुई है। इसका संकेत यह है कि खरीदार बढ़ी हुई कीमतों के बावजूद अच्छी लोकेशन और बेहतर सुविधाओं वाली संपत्तियों की तलाश कर रहे हैं। डेवलपर्स भी इसी मांग के अनुरूप नई परियोजनाओं पर ध्यान दे रहे हैं।
आम खरीदार के लिए सबसे बड़ी चुनौती अब केवल मकान की कीमत नहीं, बल्कि पूरी खरीद लागत है। मकान की कीमत बढ़ने के साथ अधिक राशि का गृह ऋण लेना पड़ता है। इससे मासिक किस्त बढ़ती है और परिवार की आय का बड़ा हिस्सा लंबे समय तक आवास पर खर्च होता है। यही वजह है कि कई खरीदार अब शहर के मुख्य इलाकों के बजाय बाहरी क्षेत्रों में अपेक्षाकृत सस्ती संपत्ति तलाश रहे हैं। पिछले पांच वर्षों के आंकड़े बताते हैं कि भारत के आवासीय बाजार में कीमतों का बढ़ना केवल एक अस्थायी बदलाव नहीं है। जमीन की बढ़ती कीमत, निर्माण लागत, मजबूत मांग और सीमित आपूर्ति ने मिलकर मकानों को महंगा किया है। पांच साल में औसतन 59 प्रतिशत कीमत बढ़ने का असर सीधे तौर पर उन परिवारों पर पड़ रहा है जो अपने घर का सपना पूरा करना चाहते हैं। आने वाले वर्षों में यदि जमीन और निर्माण लागत को नियंत्रित करने के साथ पर्याप्त आवासीय आपूर्ति बढ़ाई जाती है, तभी आम और मध्यम आय वर्ग के लिए घर खरीदना अपेक्षाकृत आसान हो सकेगा।


















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