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जन्माष्टमी पर मणिमहेश में उमड़ा आस्था का सैलाब, पवित्र डल झील में श्रद्धालुओं ने लगाई आस्था की डुबकी

हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले में स्थित भगवान शिव के पवित्र धाम मणिमहेश में जन्माष्टमी के अवसर पर आस्था का अद्भुत नजारा देखने को मिल रहा है। ऊंचे पहाड़ों के बीच बसे मणिमहेश धाम में सुबह से ही श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ रही है। दूर-दूर से पहुंचे शिवभक्त पवित्र डल झील में स्नान कर भगवान शिव के दर्शन और पूजा-अर्चना कर रहे हैं। जन्माष्टमी के पावन अवसर पर मणिमहेश की पूरी घाटी भोलेनाथ के जयकारों से गूंज रही है। मणिमहेश यात्रा को उत्तर भारत की प्रमुख धार्मिक यात्राओं में गिना जाता है। हर वर्ष हिमाचल प्रदेश के अलावा पंजाब, हरियाणा, चंडीगढ़, दिल्ली और जम्मू सहित कई राज्यों से श्रद्धालु भगवान शिव के दर्शन के लिए यहां पहुंचते हैं। कठिन पहाड़ी रास्ते, ठंडा मौसम और ऊंचाई की चुनौतियां भी श्रद्धालुओं की आस्था को डिगा नहीं पातीं। श्रद्धालु कई किलोमीटर की पैदल यात्रा पूरी कर मणिमहेश झील तक पहुंचते हैं और यहां पवित्र स्नान को अपने लिए सौभाग्य और पुण्य का अवसर मानते हैं।

जन्माष्टमी के अवसर पर होने वाले छोटे शाही स्नान को लेकर श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह देखने को मिल रहा है। छोटे शाही स्नान का शुभ मुहूर्त गुरुवार रात 2 बजकर 26 मिनट से शुरू होकर शुक्रवार रात 12 बजकर 14 मिनट तक रहेगा। इस दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पवित्र डल झील में स्नान करने की संभावना है। मान्यता है कि इस पवित्र झील में स्नान करने और भगवान शिव की पूजा करने से भक्तों को आध्यात्मिक शांति और पुण्य की प्राप्ति होती है। मणिमहेश पहुंचने वाले श्रद्धालुओं के लिए यह यात्रा केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं है, बल्कि प्रकृति और अध्यात्म के अद्भुत संगम का अनुभव भी है। चारों ओर ऊंचे पहाड़, बर्फ से ढकी चोटियां, कठिन पैदल मार्ग और बीच में स्थित पवित्र झील इस पूरे क्षेत्र को विशेष धार्मिक महत्व प्रदान करते हैं। कैलाश पर्वत की तलहटी में स्थित मणिमहेश झील के दर्शन श्रद्धालुओं के लिए यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है।

जिला चंबा प्रशासन के अनुसार, मणिमहेश झील समुद्र तल से करीब 13 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित है। इसके सामने कैलाश पर्वत की विशाल चोटी दिखाई देती है, जिसकी ऊंचाई करीब 18,564 फीट बताई गई है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मणिमहेश को भगवान शिव का प्रमुख धाम माना जाता है। यही वजह है कि हर वर्ष यात्रा के दौरान देश के अलग-अलग हिस्सों से हजारों श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं।

मणिमहेश यात्रा के दौरान श्रद्धालु पवित्र झील में स्नान करने के बाद भगवान शिव की पूजा-अर्चना करते हैं। कई श्रद्धालु अपने साथ धार्मिक सामग्री लेकर पहुंचते हैं और विधि-विधान से पूजा करते हैं। यात्रा मार्ग में भी जगह-जगह श्रद्धालुओं के लिए सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं। कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के बावजूद श्रद्धालुओं का उत्साह लगातार बना हुआ है।

राधाष्टमी के बड़े शाही स्नान पर टिकी श्रद्धालुओं की नजर

जन्माष्टमी के छोटे शाही स्नान के बाद अब श्रद्धालुओं की नजर राधाष्टमी के अवसर पर होने वाले बड़े शाही स्नान पर है। यह स्नान 18 और 19 सितंबर को होगा। मणिमहेश यात्रा में राधाष्टमी का शाही स्नान सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक पड़ावों में माना जाता है। इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के मणिमहेश पहुंचने की संभावना है। राधाष्टमी के बड़े शाही स्नान को लेकर अभी से श्रद्धालुओं में उत्साह दिखाई दे रहा है। कई भक्त जन्माष्टमी के छोटे शाही स्नान के बाद भी यात्रा पर बने रहते हैं और राधाष्टमी के अवसर पर पवित्र डल झील में स्नान कर भगवान शिव का आशीर्वाद लेने की इच्छा रखते हैं। धार्मिक दृष्टि से इस स्नान का विशेष महत्व माना जाता है। मणिमहेश यात्रा 2026 आधिकारिक तौर पर 19 सितंबर तक चलेगी। यात्रा के अंतिम महत्वपूर्ण चरण के रूप में राधाष्टमी का शाही स्नान श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र रहेगा। इस दौरान मणिमहेश क्षेत्र में श्रद्धालुओं की संख्या और बढ़ने की उम्मीद है।

मणिमहेश यात्रा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को कठिन पहाड़ी रास्तों से गुजरना पड़ता है। कई किलोमीटर की पैदल यात्रा के दौरान उन्हें ऊंचाई, ठंड और बदलते मौसम का सामना करना पड़ता है। इसके बावजूद भगवान शिव के प्रति आस्था उन्हें लगातार आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है। रास्ते में भोलेनाथ के जयकारे और भक्ति गीत वातावरण को पूरी तरह धार्मिक रंग में रंग देते हैं। मणिमहेश झील के आसपास पहुंचने के बाद श्रद्धालुओं को कैलाश पर्वत के दर्शन होते हैं। धार्मिक मान्यता में कैलाश पर्वत को भगवान शिव से जोड़कर देखा जाता है। यही कारण है कि मणिमहेश यात्रा को श्रद्धालु जीवन की महत्वपूर्ण धार्मिक यात्राओं में शामिल करते हैं।

जन्माष्टमी के दिन पवित्र झील में स्नान करने के लिए सुबह से ही श्रद्धालुओं की आवाजाही बनी हुई है। कई श्रद्धालु रात से ही शुभ मुहूर्त का इंतजार कर रहे हैं। जैसे-जैसे स्नान का समय नजदीक आया, वैसे-वैसे डल झील और आसपास के क्षेत्र में भक्तों की गतिविधियां बढ़ती गईं। श्रद्धालु भगवान शिव का स्मरण करते हुए पवित्र स्नान कर रहे हैं और सुख-समृद्धि की कामना कर रहे हैं।

हिमाचल प्रदेश के अलावा पड़ोसी राज्यों से आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या भी लगातार बढ़ रही है। पंजाब, हरियाणा, चंडीगढ़, दिल्ली और जम्मू से बड़ी संख्या में शिवभक्त मणिमहेश पहुंच रहे हैं। अलग-अलग क्षेत्रों से आने वाले श्रद्धालुओं की मौजूदगी ने पूरे यात्रा क्षेत्र को धार्मिक उत्सव में बदल दिया है।

मणिमहेश यात्रा की धार्मिक आस्था के साथ-साथ हिमालयी प्राकृतिक सौंदर्य भी श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है। ऊंची चोटियों के बीच स्थित झील और आसपास का शांत वातावरण भक्तों को आध्यात्मिक अनुभूति कराता है। हालांकि ऊंचाई और मौसम को देखते हुए यात्रा के दौरान सावधानी बरतना भी बेहद जरूरी माना जाता है। जन्माष्टमी के छोटे शाही स्नान के साथ मणिमहेश यात्रा का यह चरण श्रद्धा और भक्ति से सराबोर नजर आ रहा है। अब सभी की निगाहें राधाष्टमी के बड़े शाही स्नान पर हैं। माना जा रहा है कि 18 और 19 सितंबर को होने वाले इस स्नान में श्रद्धालुओं की संख्या और बढ़ सकती है। भगवान शिव के जयकारों के बीच पवित्र डल झील में होने वाला यह स्नान मणिमहेश यात्रा 2026 का सबसे बड़ा धार्मिक आकर्षण बनेगा।

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