उड़ीसा में भक्ति का महासागर : जगन्नाथ रथयात्रा का भव्य शुभारंभ, पुरी में दुनिया भर से उमड़े लाखों श्रद्धालु

उड़ीसा के पवित्र शहर पुरी में आज आस्था, श्रद्धा और सनातन परंपरा का अद्भुत संगम देखने को मिल रहा है। विश्व प्रसिद्ध भगवान जगन्नाथ रथयात्रा के शुभारंभ के साथ ही पूरा पुरी “जय जगन्नाथ” के गगनभेदी जयघोष से गूंज उठा है। देश ही नहीं बल्कि दुनिया के अलग-अलग देशों से लाखों श्रद्धालु इस दिव्य अवसर के साक्षी बनने के लिए पुरी पहुंचे हैं। शहर की हर सड़क, हर गली और विशेष रूप से श्रीमंदिर से लेकर गुंडीचा मंदिर तक का करीब तीन किलोमीटर लंबा बड़ा डांड पूरी तरह श्रद्धालुओं से भर गया है। हर ओर शंखनाद, घंटियों की मधुर ध्वनि, ढोल-मंजीरों की गूंज और भक्ति गीतों का वातावरण ऐसा बना रहा है कि मानो पूरी धरती ही आध्यात्मिक ऊर्जा से सराबोर हो गई हो। आज 16 जुलाई 2026 को भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा अपने-अपने भव्य रथों पर विराजमान होकर श्रीमंदिर से निकलकर मौसी के घर कहे जाने वाले गुंडीचा मंदिर के लिए प्रस्थान कर रहे हैं। यह वही अवसर है जिसका श्रद्धालु पूरे वर्ष इंतजार करते हैं। रथयात्रा का यह महापर्व केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि सनातन संस्कृति, समानता, सेवा और मानवता का जीवंत उत्सव माना जाता है।

सुबह से ही पुरी में श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ा। प्रशासन ने सुरक्षा और व्यवस्थाओं के व्यापक इंतजाम किए हैं। मंदिर परिसर और रथ मार्ग पर सुरक्षा बलों की तैनाती के साथ चिकित्सा, पेयजल और आपातकालीन सेवाओं की भी विशेष व्यवस्था की गई है। लाखों श्रद्धालु भगवान के एक दर्शन और रथ की रस्सी को स्पर्श करने के लिए घंटों से कतारों में खड़े दिखाई दे रहे हैं। भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा इसलिए भी विशेष मानी जाती है क्योंकि इस दिन भगवान स्वयं अपने भक्तों के बीच आते हैं। सामान्य दिनों में भक्त भगवान के दर्शन के लिए मंदिर के गर्भगृह तक पहुंचते हैं, लेकिन इस पर्व पर भगवान मंदिर से बाहर निकलकर अपने भक्तों को दर्शन देते हैं। मान्यता है कि जो लोग किसी कारणवश श्रीमंदिर के भीतर प्रवेश नहीं कर पाते, उन पर भी भगवान स्वयं बाहर आकर अपनी कृपा बरसाते हैं। यही कारण है कि इस रथयात्रा को भगवान और भक्त के मिलन का सबसे बड़ा उत्सव कहा जाता है। 

रथयात्रा की शुरुआत से पहले पारंपरिक विधि-विधान के साथ सभी धार्मिक अनुष्ठान पूरे किए गए। भगवान के विग्रहों को भव्य रथों पर विराजमान कराया गया। इसके बाद सबसे महत्वपूर्ण रस्म ‘छेरा पहरा’ का आयोजन हुआ। इस परंपरा के अंतर्गत पुरी के गजपति महाराज स्वयं एक साधारण सेवक बनकर सोने की झाड़ू से तीनों रथों के सामने मार्ग की सफाई करते हैं और सुगंधित जल का छिड़काव करते हैं। यह दृश्य लाखों श्रद्धालुओं को विनम्रता और समानता का संदेश देता है। इस रस्म का अर्थ है कि भगवान के सामने राजा और सामान्य व्यक्ति में कोई अंतर नहीं होता। सभी उनके सेवक हैं। रथयात्रा में भगवान जगन्नाथ का नंदीघोष रथ, भगवान बलभद्र का तालध्वज रथ और देवी सुभद्रा का दर्पदलन रथ विशेष आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। विशाल लकड़ी से बने इन रथों को पारंपरिक शैली में सजाया गया है। रंग-बिरंगे वस्त्रों, ध्वजों और धार्मिक प्रतीकों से सजे इन रथों का दर्शन श्रद्धालुओं के लिए अविस्मरणीय अनुभव बन जाता है।

रथ खींचने की परंपरा, नौ दिन का प्रवास और वापसी यात्रा का धार्मिक महत्व

पुरी की रथयात्रा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें किसी प्रकार का भेदभाव नहीं होता। जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र या सामाजिक स्थिति से ऊपर उठकर हर श्रद्धालु भगवान के रथ की रस्सी पकड़ सकता है। यही इस पर्व की सबसे बड़ी पहचान है। लाखों लोग एक साथ रथ खींचते हैं और भगवान के प्रति अपनी आस्था व्यक्त करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यदि कोई श्रद्धालु सच्चे मन और श्रद्धा से भगवान के रथ को कुछ कदम भी खींच लेता है तो उसे महान पुण्य की प्राप्ति होती है। पौराणिक विश्वास है कि कम से कम तीन कदम तक रथ खींचने से जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट हो जाते हैं और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है। यही कारण है कि रथ की रस्सी को स्पर्श करने के लिए श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह देखने को मिलता है। आज से शुरू हुई यह पावन यात्रा केवल एक दिन का आयोजन नहीं है। 

भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा गुंडीचा मंदिर में नौ दिनों तक विराजमान रहेंगे। इस अवधि में लाखों श्रद्धालु वहां पहुंचकर भगवान के दर्शन करेंगे। धार्मिक ग्रंथों में वर्णित है कि गुंडीचा मंदिर में भगवान के आड़प दर्शन करने से सौ यज्ञों के समान पुण्य प्राप्त होता है। रथयात्रा का अगला महत्वपूर्ण चरण 24 जुलाई 2026 को होगा, जब बाहुदा यात्रा के दौरान तीनों देवता पुनः श्रीमंदिर लौटेंगे। वापसी यात्रा भी उतनी ही भव्य होती है जितनी प्रस्थान यात्रा। इसके अगले दिन यानी 25 जुलाई को सुनावेश का आयोजन किया जाएगा। इस अवसर पर भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा का स्वर्ण आभूषणों से दिव्य श्रृंगार किया जाएगा। सोने के मुकुट, हार, बाजूबंद और अन्य अलंकरणों से सुसज्जित तीनों देवों के दर्शन के लिए लाखों श्रद्धालु उमड़ते हैं। इसके बाद 27 जुलाई को नीलाद्री बीजे के साथ इस वर्ष की रथयात्रा का विधिवत समापन होगा। 

पुरी की रथयात्रा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि भारतीय संस्कृति की उस महान परंपरा का प्रतीक है, जिसमें सेवा, समानता, करुणा और समर्पण का संदेश निहित है। यहां राजा झाड़ू लगाता है, साधारण भक्त भगवान का रथ खींचता है और करोड़ों लोगों की आस्था एक सूत्र में बंध जाती है। यही कारण है कि यह पर्व भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में सनातन परंपरा की सबसे भव्य और दिव्य यात्राओं में गिना जाता है। आज पुरी की सड़कों पर श्रद्धा का जो महासागर उमड़ा है, वह केवल एक धार्मिक आयोजन का दृश्य नहीं बल्कि करोड़ों लोगों की अटूट आस्था का जीवंत प्रमाण है। “जय जगन्नाथ” के जयकारों के बीच आगे बढ़ते विशाल रथ, भक्तों की उमंग, शंखध्वनि और भक्ति का अद्भुत वातावरण इस बात का एहसास कराता है कि भगवान और भक्त के बीच प्रेम का यह अनोखा उत्सव सदियों से भारतीय संस्कृति की अमूल्य धरोहर बना हुआ है। लाखों श्रद्धालुओं की मौजूदगी में आज पुरी सचमुच भक्ति, विश्वास और आध्यात्मिक ऊर्जा का विश्वव्यापी केंद्र बन गया है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *