सुप्रीम कोर्ट ने देश में हवाई यात्रा से जुड़े यात्रियों के हितों की सुरक्षा और विमानन क्षेत्र में पारदर्शिता सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। सोमवार को शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह भारतीय वायुयान अधिनियम, 2024 के तहत तैयार किए गए नियमों को दो सप्ताह के भीतर उसके समक्ष प्रस्तुत करे। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि नियम अभी तक सार्वजनिक नहीं किए गए हैं या संसद के समक्ष औपचारिक रूप से पेश होने की प्रक्रिया में हैं, तब भी उन्हें सीलबंद लिफाफे में न्यायालय के समक्ष रखा जाए। यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब देश में हवाई किरायों में अप्रत्याशित उतार-चढ़ाव, त्योहारों और आपातकालीन परिस्थितियों के दौरान टिकटों की कीमतों में कई गुना वृद्धि तथा निजी एयरलाइनों द्वारा सामान, सीट चयन, भोजन और अन्य सुविधाओं के नाम पर अतिरिक्त शुल्क वसूले जाने को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं। इन मुद्दों के कारण यात्रियों को आर्थिक बोझ का सामना करना पड़ता है और विमानन क्षेत्र में पारदर्शिता की आवश्यकता पहले से अधिक महसूस की जा रही है।
इसी पृष्ठभूमि में दायर याचिका में एक स्वतंत्र और प्रभावी विमानन नियामक की स्थापना तथा यात्री अधिकारों की बेहतर सुरक्षा के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश बनाने की मांग की गई है। सुप्रीम कोर्ट की यह सुनवाई न केवल विमानन क्षेत्र की कार्यप्रणाली बल्कि भविष्य में यात्रियों के अधिकारों और एयरलाइनों की जवाबदेही तय करने की दिशा में भी अहम मानी जा रही है। सोमवार को हुई सुनवाई के दौरान जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने केंद्र सरकार से भारतीय वायुयान अधिनियम, 2024 के तहत तैयार किए गए नियमों की वर्तमान स्थिति के बारे में जानकारी मांगी। केंद्र की ओर से अदालत को बताया गया कि नियमों का मसौदा पूरी तरह तैयार है और इस समय उसका विभिन्न भारतीय भाषाओं में अनुवाद कराया जा रहा है। सरकार ने संकेत दिया कि यह प्रक्रिया पूरी होने के बाद नियमों को अधिसूचित करने की दिशा में आगे की कार्रवाई की जाएगी। केंद्र सरकार की इस दलील पर अदालत ने कहा कि नियमों को अंतिम रूप दिए जाने की स्थिति में उन्हें दो सप्ताह के भीतर न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जाए।
न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि नियम संसद में प्रस्तुत किए जाने की प्रक्रिया में हैं, तब भी उनकी प्रति सीलबंद लिफाफे में अदालत के समक्ष उपलब्ध कराई जा सकती है। अदालत का यह निर्देश इस बात का संकेत माना जा रहा है कि वह इस मामले में शीघ्र प्रगति चाहती है और विमानन क्षेत्र में नियामकीय व्यवस्था को लेकर गंभीर है। भारतीय वायुयान अधिनियम, 2024 जनवरी 2025 से प्रभावी हो चुका है। इस कानून का उद्देश्य देश के नागरिक उड्डयन क्षेत्र को आधुनिक, सुरक्षित और अधिक जवाबदेह बनाना है। बदलती तकनीक, बढ़ते हवाई यातायात और यात्रियों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए इस अधिनियम को पुराने कानूनी ढांचे की जगह लागू किया गया था। हालांकि, अधिनियम लागू होने के बावजूद इसके तहत बनाए जाने वाले विस्तृत नियम अब तक अधिसूचित नहीं हो पाए हैं। यही कारण है कि कई महत्वपूर्ण प्रावधानों का प्रभावी क्रियान्वयन अभी तक संभव नहीं हो सका है।
यात्री अधिकारों की सुरक्षा और पारदर्शी विमानन व्यवस्था पर जोर
यह पूरा मामला एक जनहित याचिका से जुड़ा है, जिसमें हवाई यात्रियों के अधिकारों की बेहतर सुरक्षा, एयरलाइनों की जवाबदेही तय करने तथा एक स्वतंत्र और मजबूत विमानन नियामक की स्थापना की मांग की गई है। याचिका में कहा गया है कि वर्तमान व्यवस्था में हवाई किराए तय करने और विभिन्न सहायक शुल्क वसूलने को लेकर पर्याप्त पारदर्शिता नहीं है। कई बार अचानक किरायों में भारी बढ़ोतरी देखने को मिलती है, जिससे यात्रियों को बिना किसी पूर्व सूचना के अधिक राशि चुकानी पड़ती है। याचिका में यह भी उल्लेख किया गया है कि निजी एयरलाइनों द्वारा टिकट के मूल किराए के अतिरिक्त सीट चयन, अतिरिक्त सामान, भोजन, प्राथमिक बोर्डिंग और अन्य सुविधाओं के नाम पर अलग-अलग शुल्क वसूले जाते हैं।
यात्रियों का कहना है कि कई बार इन शुल्कों की जानकारी टिकट बुकिंग के अंतिम चरण में मिलती है, जिससे उन्हें मजबूरी में अतिरिक्त भुगतान करना पड़ता है। ऐसे मामलों में स्पष्ट नियमों और प्रभावी निगरानी तंत्र की आवश्यकता लंबे समय से महसूस की जा रही है। सुनवाई के दौरान अदालत ने इस तथ्य को भी महत्व दिया कि विमानन क्षेत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने के लिए नियमों का समय पर अधिसूचित होना आवश्यक है। यदि नियम लंबे समय तक लंबित रहते हैं तो नए अधिनियम के कई उद्देश्य अधूरे रह सकते हैं। इसलिए अदालत ने केंद्र सरकार से समयबद्ध तरीके से नियम प्रस्तुत करने को कहा है।
यदि नए नियमों में हवाई किराया निर्धारण, अतिरिक्त शुल्कों की स्पष्ट सीमा, यात्रियों के अधिकार, उड़ान रद्द होने या देरी की स्थिति में मुआवजे की व्यवस्था तथा शिकायत निवारण तंत्र को विस्तार से शामिल किया जाता है, तो इससे यात्रियों का विश्वास मजबूत होगा। साथ ही एयरलाइनों के संचालन में भी अधिक पारदर्शिता आएगी।इस मामले की अगली सुनवाई में केंद्र सरकार को अदालत के समक्ष नियमों का मसौदा प्रस्तुत करना होगा। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट यह तय करेगा कि नियम अधिनियम की भावना के अनुरूप हैं या नहीं तथा क्या यात्रियों के हितों की पर्याप्त सुरक्षा सुनिश्चित की गई है। विमानन क्षेत्र से जुड़े सभी पक्षों की निगाहें अब इस मामले की आगामी सुनवाई पर टिकी हैं, क्योंकि इससे भविष्य में देश की हवाई यात्रा व्यवस्था, किराया निर्धारण प्रणाली और यात्रियों के अधिकारों को लेकर महत्वपूर्ण दिशा तय हो सकती है।

















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