भारत की अर्थव्यवस्था लगातार दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में अपनी जगह मजबूत कर रही है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर देश की भूमिका पहले की तुलना में कहीं अधिक प्रभावशाली हुई है। व्यापार, निवेश, कूटनीति और वैश्विक साझेदारियों के क्षेत्र में भारत की सक्रियता लगातार बढ़ रही है। इसके बावजूद जब बात भारतीय नागरिकों की विदेश यात्रा की सहजता की आती है, तो तस्वीर अभी भी पूरी तरह संतोषजनक नहीं दिखाई देती। दुनिया के कई देशों में बिना पहले से वीजा लिए यात्रा करने की सुविधा भारतीय नागरिकों को सीमित रूप से ही उपलब्ध है। यही वजह है कि आर्थिक और रणनीतिक रूप से मजबूत होते भारत का प्रभाव अभी तक उसके पासपोर्ट की वैश्विक स्थिति में पूरी तरह दिखाई नहीं दे रहा है। वैश्विक नागरिकता समाधान नामक अंतरराष्ट्रीय सलाहकार संस्था द्वारा जारी वर्ष 2026 की वैश्विक पासपोर्ट रैंकिंग में भारत ने अब तक का सबसे बेहतर समग्र अंक प्राप्त किया है।
यह भारतीय पासपोर्ट की मजबूती में सुधार का संकेत जरूर है, लेकिन वैश्विक सूची में देश की स्थिति में अपेक्षित उछाल नहीं आ सका। वर्ष 2021 में भारत 127वें स्थान पर था, जबकि वर्ष 2026 में वह 125वें स्थान पर पहुंचा है। यानी पांच वर्षों में केवल दो स्थान का सुधार हुआ है। दूसरी ओर भारत का समग्र अंक बढ़कर 45.1 हो गया है, जो पिछले पांच वर्षों में सबसे अधिक है। रिपोर्ट में भारत को सबसे बड़ा अपवाद बताया गया है। इसमें कहा गया है कि दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होने और वैश्विक प्रभाव बढ़ने के बावजूद भारतीय पासपोर्ट की वास्तविक ताकत उतनी तेजी से नहीं बढ़ी, जितनी उम्मीद की जा रही थी। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत ने आर्थिक विकास और अंतरराष्ट्रीय संबंधों में उल्लेखनीय प्रगति जरूर की है, लेकिन इसका लाभ अभी तक विदेश यात्रा की सुविधाओं के रूप में पूरी तरह नहीं मिल पाया है।
रिपोर्ट के अनुसार भारतीय पासपोर्ट की सबसे बड़ी कमजोरी विदेश यात्रा की स्वतंत्रता है। पिछले पांच वर्षों में भारतीय नागरिकों के लिए बिना पहले से वीजा लिए यात्रा करने वाले देशों की संख्या में कुछ वृद्धि हुई है। वर्ष 2021 में इस श्रेणी में भारत का अंक 18 था, जो अब बढ़कर लगभग 23 हो गया है। हालांकि इसी अवधि में कई अन्य देशों ने अपने नागरिकों के लिए कहीं अधिक देशों के साथ वीजा मुक्त या आसान प्रवेश की व्यवस्था कर ली। परिणामस्वरूप भारत की समग्र रैंकिंग में बड़ा सुधार नहीं हो सका। आज किसी देश के पासपोर्ट की ताकत केवल उसकी आर्थिक स्थिति से तय नहीं होती, बल्कि इस बात से भी तय होती है कि उसके नागरिकों को दुनिया के कितने देशों में बिना जटिल औपचारिकताओं के प्रवेश मिल सकता है।
यही कारण है कि मजबूत अर्थव्यवस्था होने के बावजूद भारत इस क्षेत्र में अभी कई देशों से पीछे है। भारतीय नागरिकों के लिए विदेश यात्रा पहले की तुलना में कुछ आसान जरूर हुई है, लेकिन वैश्विक प्रतिस्पर्धा भी लगातार बढ़ी है। कई देशों ने आपसी समझौतों के माध्यम से यात्रा संबंधी नियमों को सरल बनाया है, जबकि भारत को इस दिशा में अभी और प्रयास करने की जरूरत है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि भारत आने वाले वर्षों में अधिक देशों के साथ यात्रा संबंधी द्विपक्षीय समझौते करता है तो भारतीय पासपोर्ट की वैश्विक स्थिति में उल्लेखनीय सुधार संभव है।
जीवन गुणवत्ता में भारत का बेहतर प्रदर्शन, लेकिन यात्रा सुविधा बनी सबसे बड़ी चुनौती
रिपोर्ट में भारत के लिए सबसे सकारात्मक पक्ष जीवन गुणवत्ता के क्षेत्र में सुधार को माना गया है। स्वास्थ्य सेवाओं, सुरक्षा, जलवायु और सामाजिक ढांचे जैसे मानकों पर भारत ने उल्लेखनीय प्रगति दर्ज की है। इन मानकों के आधार पर भारत की रैंकिंग में 13 स्थानों का सुधार हुआ है और देश 118वें स्थान पर पहुंच गया है। यह इस सूचकांक में भारत का अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन माना गया है। हालांकि जीवन गुणवत्ता में सुधार के बावजूद विदेश यात्रा संबंधी कमजोर स्थिति के कारण कुल रैंकिंग में सीमित ही बढ़त देखने को मिली। एशिया में सिंगापुर का पासपोर्ट एक बार फिर सबसे मजबूत माना गया है। वर्ष 2026 की सूची में सिंगापुर वैश्विक स्तर पर 10वें स्थान पर रहा और एशिया का एकमात्र देश बना, जिसने शीर्ष दस में जगह बनाई।
लगातार पांचवें वर्ष सिंगापुर ने यात्रा सुविधा के मामले में पूरे अंक प्राप्त किए। निवेश आकर्षित करने के मामले में भी वह दुनिया में पहले स्थान पर रहा। हालांकि जीवन गुणवत्ता के अपेक्षाकृत कम अंक के कारण वह शीर्ष पांच देशों में शामिल नहीं हो सका। इस वर्ष हांगकांग ने भी उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया है। यात्रा सुविधा के मामले में उसकी स्थिति एक वर्ष के भीतर 46वें स्थान से बढ़कर 31वें स्थान पर पहुंच गई। वहीं संयुक्त अरब अमीरात ने सबसे बड़ी छलांग लगाते हुए 26वें स्थान से सीधे तीसरे स्थान तक का सफर तय किया। रिपोर्ट के अनुसार यह उपलब्धि सक्रिय कूटनीति और विभिन्न देशों के साथ किए गए द्विपक्षीय समझौतों का परिणाम है। यूरोपीय देशों का दबदबा इस वर्ष भी कायम रहा। दुनिया के शीर्ष दस सबसे मजबूत पासपोर्ट वाले देशों में नौ यूरोपीय देश शामिल हैं। स्वीडन लगातार तीसरे वर्ष पहले स्थान पर रहा, जबकि स्विट्जरलैंड और फिनलैंड क्रमशः दूसरे और तीसरे स्थान पर रहे। इन देशों ने यात्रा सुविधा, निवेश आकर्षण और जीवन गुणवत्ता तीनों क्षेत्रों में संतुलित प्रदर्शन किया है।
रिपोर्ट में चीन की तुलना भी भारत से की गई है। वर्ष 2021 में चीन 117वें स्थान पर था, लेकिन अब वह 104वें स्थान पर पहुंच गया है। इस दौरान उसका समग्र अंक 48.3 से बढ़कर 54.8 हो गया।
रिपोर्ट के अनुसार चीन ने यात्रा सुविधा, निवेश आकर्षण और जीवन गुणवत्ता तीनों क्षेत्रों में लगातार सुधार किया है, जिससे उसके पासपोर्ट की वैश्विक स्थिति मजबूत हुई है। रिपोर्ट यह भी बताती है कि दुनिया में मजबूत और कमजोर पासपोर्ट के बीच का अंतर लगातार बढ़ता जा रहा है। अधिकांश देशों के नागरिकों को विदेश यात्रा के लिए समान सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। वैश्विक स्तर पर केवल लगभग 38.5 प्रतिशत देशों के बीच ही ऐसी व्यवस्था है, जहां दोनों देशों के नागरिकों को एक जैसी वीजा सुविधा प्राप्त है। यानी अंतरराष्ट्रीय यात्रा के नियम आज भी दुनिया के अधिकांश देशों के लिए समान नहीं हैं। वर्ष 2026 की इस वैश्विक पासपोर्ट रैंकिंग में कुल 197 देशों का मूल्यांकन विदेश यात्रा की सुविधा, निवेश आकर्षण और जीवन गुणवत्ता जैसे तीन प्रमुख मानकों के आधार पर किया गया। भारत ने इन मानकों में सुधार जरूर दर्ज किया है, लेकिन यदि देश अपनी आर्थिक और कूटनीतिक ताकत के अनुरूप पासपोर्ट की वैश्विक स्थिति मजबूत करना चाहता है, तो आने वाले वर्षों में अधिक देशों के साथ यात्रा संबंधी समझौतों और नागरिकों के लिए आसान प्रवेश व्यवस्था सुनिश्चित करने की दिशा में और प्रभावी कदम उठाने होंगे।

















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