नेपाल-तिब्बत सीमा के पास बुधवार सुबह आई भीषण अचानक बाढ़ ने बड़े इलाके में तबाही मचा दी। तेज बहाव और मलबे के सैलाब ने देखते ही देखते घरों, वाहनों, सड़कों, पुलों और कई महत्वपूर्ण परियोजनाओं को अपनी चपेट में ले लिया। इस प्राकृतिक आपदा में नेपाल में 162 और तिब्बत में तीन लोगों की मौत की खबर है। वहीं एक हजार से अधिक लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं। राहत और बचाव दल लगातार मलबे में दबे लोगों की तलाश कर रहे हैं, लेकिन खराब मौसम और जगह-जगह टूटे संपर्क मार्ग अभियान में बड़ी बाधा बने हुए हैं। बाढ़ का पानी करीब 30 फीट तक ऊपर पहुंच गया था। पानी की रफ्तार इतनी तेज थी कि रास्ते में आने वाली गाड़ियां, मकान और सरकारी ढांचे बह गए। इस आपदा में 19 पुल और करीब 40 किलोमीटर सड़कें क्षतिग्रस्त या पूरी तरह तबाह हो गईं। इसके अलावा 13 जलविद्युत परियोजनाओं को भी भारी नुकसान पहुंचा है। कई इलाकों में संपर्क टूटने के कारण प्रभावित लोगों तक राहत पहुंचाना चुनौती बन गया है। शुरुआत में इस घटना को भूकंप से जोड़कर देखा गया था। बुधवार सुबह करीब 8 बजकर 37 मिनट पर नेपाल-चीन सीमा के आसपास और काठमांडू के उत्तर में तेज झटके महसूस किए गए। शुरुआती जानकारी में अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण ने इसे 4.4 तीव्रता का भूकंप बताया था। इसके बाद इलाके में अचानक पानी और मलबे का तेज सैलाब आया।
हालांकि बाद में जांच में सामने आया कि यह सामान्य भूकंप नहीं था। चीन की तरफ ल्हेंदे नदी के क्षेत्र में पहाड़ का एक बड़ा हिस्सा अचानक खिसककर नीचे गिर गया था। यह भूस्खलन इतना शक्तिशाली था कि इससे भूकंप जैसा कंपन पैदा हुआ। बाद में अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण ने स्पष्ट किया कि महसूस किया गया तेज झटका भूस्खलन के कारण पैदा हुआ था और इसकी तीव्रता करीब 5.2 के भूकंप के बराबर महसूस हुई। बताया जा रहा है कि पहाड़ से बर्फ, चट्टान और संभवत: हिमनद का बड़ा हिस्सा टूटकर ल्हेंदे खोला नदी में जा गिरा। इसके कारण नदी में अचानक पानी और मलबे की मात्रा बढ़ गई। ल्हेंदे खोला, भोटेकोशी नदी की सहायक नदी है। चीन से निकलने वाली यह नदी गहरी घाटियों से गुजरते हुए नेपाल में प्रवेश करती है। पहाड़ से गिरे मलबे और पानी ने नदी का बहाव बेहद खतरनाक बना दिया और देखते ही देखते यह सैलाब नेपाल के बड़े हिस्से की ओर बढ़ गया।
इस अचानक आई बाढ़ का असर सिर्फ सीमा से लगे इलाकों तक सीमित नहीं रहा। पानी और मलबे का तेज बहाव करीब 150 किलोमीटर दूर चितवन तक पहुंच गया। चितवन में अब तक 33 शव बरामद किए जा चुके हैं। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि बाढ़ का बहाव कितना शक्तिशाली रहा होगा। कई लोगों के बह जाने की आशंका है और लापता लोगों की संख्या लगातार चिंता बढ़ा रही है। इस आपदा की चपेट में कैलाश मानसरोवर यात्रा पर जा रहे कई श्रद्धालु भी आए हैं। नेपाल में लापता लोगों में बड़ी संख्या विदेशी नागरिकों की बताई जा रही है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार 466 विदेशी और 113 नेपाली नागरिक लापता हैं। इनमें 133 भारतीय और 37 प्रवासी भारतीय भी शामिल बताए गए हैं। ऐसे में भारत और नेपाल दोनों के लिए खोज एवं बचाव अभियान बेहद महत्वपूर्ण हो गया है।
भारत ने बढ़ाया मदद का हाथ, बिहार और उत्तर प्रदेश में भी सतर्कता
नेपाल में तबाही के बाद भारत ने तत्काल राहत और बचाव अभियान में सहयोग बढ़ाया है। भारत ने बुधवार को करीब 10 टन मानवीय सहायता और आपदा राहत सामग्री के साथ जरूरी दवाएं नेपाल भेजीं। भारतीय वायुसेना का सी-130जे विमान राहत सामग्री लेकर नेपाल के लिए रवाना हुआ। इसमें अस्थायी आश्रय के लिए जरूरी सामान, कंबल, स्वच्छता सामग्री, सौर ऊर्जा से चलने वाले दीपक और दवाएं शामिल हैं। इनका उद्देश्य बाढ़ से प्रभावित लोगों को तत्काल राहत उपलब्ध कराना है। भारतीय वायुसेना ने आगे भी राहत सामग्री पहुंचाने की तैयारी की है। सी-17 और सी-130 विमानों के जरिए जरूरत के अनुसार अतिरिक्त सामग्री भेजी जाएगी। बचाव अभियान और प्रभावित लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाने के लिए हेलिकॉप्टर भी तैनात किए गए हैं। भारत की ओर से यह सहायता नेपाल में चल रहे खोज एवं बचाव अभियान को मजबूत करने के उद्देश्य से दी जा रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह से फोन पर बातचीत की और इस भीषण आपदा में हुई जनहानि पर दुख जताया। उन्होंने नेपाल को हर संभव मानवीय सहायता देने का भरोसा दिलाया। प्रधानमंत्री ने कहा कि इस कठिन समय में भारत के लोग नेपाल के लोगों के साथ मजबूती से खड़े हैं। दोनों देशों की राहत और बचाव टीमें आपदा के बीच समन्वय के साथ काम कर रही हैं।
विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भी आपदा में जान गंवाने वाले लोगों के परिजनों के प्रति संवेदना व्यक्त की। उन्होंने कहा कि इस कठिन समय में भारत नेपाल और उसके लोगों के साथ खड़ा है। नई दिल्ली स्थित नेपाल दूतावास ने भी बताया कि त्रासदी का दायरा व्यापक है और कई विदेशी नागरिकों समेत बड़ी संख्या में लोग अब भी लापता हैं। फिलहाल सबसे बड़ी प्राथमिकता खोज एवं बचाव अभियान के जरिए लोगों की जान बचाना और प्रभावित परिवारों तक जरूरी सहायता पहुंचाना है। नेपाल की इस आपदा का असर भारत के कुछ हिस्सों में भी पड़ने की आशंका है। खासकर बिहार में गंडक नदी और उससे जुड़ी नदियों के जलस्तर पर नजर रखी जा रही है। नेपाल से करीब तीन मीटर ऊंची बाढ़ की लहर आने की चेतावनी के बाद पश्चिमी चंपारण, पूर्वी चंपारण, गोपालगंज, सारण, मुजफ्फरपुर और वैशाली में विशेष सतर्कता बरती जा रही है। सीतामढ़ी और शिवहर जिलों को भी निगरानी में रखा गया है।
नेपाल से आने वाला पानी त्रिशूली नदी के रास्ते गंडक नदी तक पहुंच सकता है। इसके बाद बिहार के निचले इलाकों में जलस्तर बढ़ने की आशंका है। उत्तर प्रदेश में भी प्रशासन सतर्क है। महाराजगंज और कुशीनगर में विशेष निगरानी रखी जा रही है। प्रशासन को नदियों के जलस्तर और संभावित बाढ़ की स्थिति पर लगातार नजर रखने के निर्देश दिए गए हैं। इस बीच नेपाल में राहत और बचाव दल मलबे में दबे लोगों की तलाश में जुटे हैं। टूटे पुलों, क्षतिग्रस्त सड़कों और खराब मौसम के कारण अभियान धीमा जरूर है, लेकिन प्रभावित इलाकों तक पहुंच बनाने की कोशिश जारी है। वैज्ञानिक भी इस बात का पता लगाने में जुटे हैं कि पहाड़ का इतना बड़ा हिस्सा अचानक क्यों खिसका। इस प्राकृतिक आपदा की पूरी वजह और इसके प्रभाव का आकलन करने में अभी कई सप्ताह लग सकते हैं।
बुधवार की घटना ने नेपाल-तिब्बत सीमा से लेकर नेपाल के अंदरूनी इलाकों और भारत के सीमावर्ती क्षेत्रों तक बाढ़ के खतरे को सामने ला दिया है। एक ओर हजारों परिवार अपने लोगों की तलाश में हैं, वहीं दूसरी ओर भारत और नेपाल की एजेंसियां मिलकर राहत अभियान को गति देने में जुटी हैं। आने वाले दिनों में नदियों के जलस्तर और मौसम की स्थिति पर निर्भर करेगा कि इस आपदा का असर कितना आगे तक जाता है।

















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