दिल्ली-एनसीआर में सर्दी की दस्तक के साथ ही वायु प्रदूषण ने एक बार फिर खतरनाक रूप ले लिया है। आसमान में छाई धुंध और जहरीली हवा ने लोगों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। राजधानी का वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) 382 तक पहुंचने और कई इलाकों में इसके 400 के पार जाने के बाद हालात चिंताजनक हो गए हैं। प्रदूषण की गंभीरता को देखते हुए वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (सीएक्यूएम) ने पूरे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान (ग्रैप) का तीसरा चरण लागू कर दिया है। इसके तहत निर्माण और तोड़फोड़ की गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाने के साथ वाहनों, उद्योगों और अन्य प्रदूषणकारी गतिविधियों पर भी सख्ती शुरू कर दी गई है। वहीं, सरकारी और निजी कार्यालयों में 50 प्रतिशत कर्मचारियों के लिए घर से काम करने की व्यवस्था लागू करने पर विचार करने के निर्देश दिए गए हैं। स्कूलों में छोटे बच्चों की पढ़ाई को लेकर भी बदलाव किया गया है। इन फैसलों का उद्देश्य प्रदूषण के बढ़ते स्तर पर तत्काल नियंत्रण करना और लोगों को जहरीली हवा के संपर्क में आने से बचाना है।
दिल्ली और आसपास के शहरों में वायु प्रदूषण हर साल सर्दियों के दौरान बड़ी चुनौती बनकर सामने आता है। मौसम में बदलाव, हवा की कम गति, वातावरण में नमी और प्रदूषणकारी तत्वों के एक जगह जमा होने से हवा की गुणवत्ता तेजी से खराब होने लगती है। इस बार भी हालात लगातार बिगड़ने के बाद प्रशासन को सख्त कदम उठाने पड़े हैं। वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग ने स्थिति की समीक्षा करते हुए ग्रैप के तीसरे चरण को लागू करने का निर्णय लिया है। इसके साथ ही दिल्ली के अलावा नोएडा, ग्रेटर नोएडा, गाजियाबाद, गुरुग्राम और फरीदाबाद समेत एनसीआर के दूसरे क्षेत्रों में भी प्रदूषण नियंत्रण से जुड़े प्रतिबंध प्रभावी हो गए हैं।
ग्रैप-3 लागू होने के बाद सबसे बड़ा असर निर्माण गतिविधियों पर पड़ा है। एनसीआर में धूल उड़ाने वाले निर्माण और तोड़फोड़ के कार्यों पर पूरी तरह रोक लगा दी गई है। निर्माण स्थलों से निकलने वाली धूल को प्रदूषण का एक प्रमुख कारण माना जाता है। सड़क निर्माण, भवन निर्माण, खुदाई और पुरानी इमारतों को तोड़ने के दौरान बड़ी मात्रा में धूल वातावरण में फैलती है। इससे हवा में मौजूद सूक्ष्म कणों की मात्रा बढ़ जाती है, जो सांस के जरिये शरीर में पहुंचकर स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं पैदा कर सकते हैं। ऐसे में निर्माण गतिविधियों पर रोक लगाकर प्रदूषण के इस स्रोत को नियंत्रित करने की कोशिश की जा रही है।
हालांकि, इस प्रतिबंध का असर निर्माण क्षेत्र से जुड़े हजारों श्रमिकों, ठेकेदारों और कारोबारियों पर भी पड़ सकता है। निर्माण कार्यों के रुकने से परियोजनाओं की समयसीमा प्रभावित होने के साथ दिहाड़ी मजदूरों की रोजी-रोटी पर भी असर पड़ने की आशंका है। इसके बावजूद प्रदूषण की गंभीर स्थिति को देखते हुए आयोग ने तत्काल नियंत्रण को प्राथमिकता दी है। संबंधित एजेंसियों को प्रतिबंधों का पालन सुनिश्चित कराने और निर्माण स्थलों पर नियमों के उल्लंघन को रोकने के निर्देश दिए गए हैं।
प्रदूषण पर लगाम लगाने के लिए वाहनों से निकलने वाले धुएं को भी निशाने पर लिया गया है। दिल्ली और निर्धारित एनसीआर क्षेत्रों में बीएस-3 पेट्रोल और बीएस-4 डीजल से चलने वाले चार पहिया वाहनों के संचालन पर रोक लगाई गई है। पुराने उत्सर्जन मानकों वाले वाहनों से निकलने वाला धुआं वायु प्रदूषण को बढ़ाने में योगदान देता है। ऐसे में इन वाहनों पर पाबंदी लगाकर सड़कों पर प्रदूषणकारी उत्सर्जन कम करने का प्रयास किया जा रहा है। इस फैसले से निजी वाहन चालकों को परेशानी हो सकती है, लेकिन प्रदूषण की स्थिति को देखते हुए नियमों का पालन करना जरूरी होगा। इसके अलावा औद्योगिक गतिविधियों पर भी सख्ती की गई है। एनसीआर में स्टोन क्रशर और खनन गतिविधियों को बंद करने के निर्देश दिए गए हैं। इन गतिविधियों से निकलने वाली धूल और कण आसपास के वातावरण को प्रभावित करते हैं। खासकर स्टोन क्रशर के संचालन के दौरान बड़ी मात्रा में धूल पैदा होती है। खनन कार्यों में भी मिट्टी और अन्य पदार्थों के उड़ने से वायु गुणवत्ता प्रभावित होती है। आयोग ने इन गतिविधियों को रोककर प्रदूषण के स्रोतों पर नियंत्रण करने की रणनीति अपनाई है।
दफ्तरों से लेकर स्कूलों तक बदलेगी व्यवस्था, बच्चों और कर्मचारियों को राहत देने की तैयारी
प्रदूषण का असर केवल सड़कों और निर्माण स्थलों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा प्रभाव आम जनजीवन और कामकाज पर भी पड़ रहा है। इसी को देखते हुए आयोग ने दिल्ली-एनसीआर की राज्य सरकारों और संबंधित विभागों को सरकारी तथा निजी कार्यालयों में 50 प्रतिशत कर्मचारियों के लिए घर से काम करने की व्यवस्था लागू करने पर विचार करने के निर्देश दिए हैं। इसका उद्देश्य कार्यालयों तक आने-जाने वाले वाहनों की संख्या कम करना है, ताकि सड़कों पर यातायात का दबाव और वाहनों से होने वाला प्रदूषण घटाया जा सके। यदि इस व्यवस्था को लागू किया जाता है तो बड़ी संख्या में कर्मचारियों को घर से काम करने का विकल्प मिल सकता है। इससे कार्यालयों में एक साथ मौजूद रहने वाले लोगों की संख्या कम होगी और रोजाना आवागमन करने वाले वाहनों की संख्या में भी कमी आने की उम्मीद है। हालांकि, इस व्यवस्था को लागू करने का निर्णय संबंधित सरकारों और विभागों को लेना है। निजी कंपनियों को भी अपने कामकाज की प्रकृति के अनुसार इस दिशा में कदम उठाने पड़ सकते हैं।
स्कूली बच्चों को प्रदूषण के प्रभाव से बचाने के लिए भी विशेष व्यवस्था की गई है। निर्देशों के अनुसार कक्षा पांच तक के स्कूलों को हाइब्रिड माध्यम से संचालित करने को कहा गया है। इसके तहत विद्यार्थियों को विद्यालय में उपस्थित होकर पढ़ाई करने के साथ ऑनलाइन माध्यम से शिक्षा प्राप्त करने का विकल्प भी दिया जा सकता है। छोटे बच्चों का स्वास्थ्य प्रदूषण के प्रति अधिक संवेदनशील होता है। जहरीली हवा में लंबे समय तक रहने से उन्हें खांसी, सांस लेने में परेशानी, आंखों में जलन और अन्य स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतें हो सकती हैं। ऐसे में हाइब्रिड व्यवस्था से बच्चों को प्रदूषण के सीधे संपर्क में आने से बचाने की कोशिश की जा रही है। वायु प्रदूषण का सबसे अधिक खतरा बच्चों, बुजुर्गों और पहले से सांस संबंधी समस्याओं से जूझ रहे लोगों को होता है। हवा में मौजूद बारीक प्रदूषक कण फेफड़ों तक पहुंचकर स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकते हैं। प्रदूषण का स्तर बढ़ने पर सामान्य लोगों को भी सांस लेने में परेशानी, गले में खराश और आंखों में जलन जैसी समस्याएं हो सकती हैं। इसलिए केवल सरकारी प्रतिबंधों पर निर्भर रहने के बजाय लोगों को भी सावधानी बरतने की जरूरत है।
ग्रैप-3 लागू होने के बाद अब दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण नियंत्रण से जुड़ी एजेंसियों की जिम्मेदारी बढ़ गई है। प्रतिबंधों का प्रभावी क्रियान्वयन, निर्माण स्थलों की निगरानी, वाहनों की जांच और औद्योगिक गतिविधियों पर नियंत्रण जैसे कदमों पर विशेष ध्यान देना होगा। साथ ही लोगों को भी अनावश्यक रूप से निजी वाहनों का इस्तेमाल करने से बचना होगा। फिलहाल दिल्ली-एनसीआर के सामने सबसे बड़ी चुनौती हवा की बिगड़ती गुणवत्ता को सुधारने की है। ग्रैप-3 के तहत लगाए गए प्रतिबंधों से प्रदूषण के स्तर में कितनी कमी आती है, यह आने वाले दिनों में साफ होगा। हालांकि, इतना तय है कि हालात सामान्य होने तक लोगों को कई तरह की पाबंदियों और बदली हुई व्यवस्थाओं के बीच रहना पड़ सकता है।


















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