दीपावली का नाम आते ही आंखों के सामने मिट्टी के दीयों की टिमटिमाती रोशनी, घरों में गूंजती पूजा की घंटियां, मिठाइयों की खुशबू, रंगोली से सजे आंगन और अपनों के साथ खुशियां बांटने की तस्वीर उभर आती है। लेकिन वक्त के साथ इस तस्वीर के रंग और अंदाज दोनों बदल रहे हैं। कभी घरों में कई दिन पहले से मिट्टी के दीये बनाने, उन्हें रंगने और पकवान तैयार करने की शुरुआत हो जाती थी, अब उनकी जगह बाजार से खरीदी गई आकर्षक सजावट, बिजली की झालरों, तैयार मिठाइयों और ऑनलाइन उपहारों ने भी बना ली है। परंपरा आज भी कायम है, लेकिन उसे निभाने का तरीका आधुनिक जीवनशैली के अनुरूप बदल रहा है। इस बार दीपावली 8 नवंबर, रविवार को मनाई जाएगी। धनतेरस से शुरू होकर भाई दूज तक चलने वाले पांच दिवसीय पर्व को लेकर देशभर में तैयारियां तेज हैं। बाजारों में खरीदारी का उत्साह है तो घरों में सफाई, सजावट और पूजा की तैयारियां चल रही हैं। राजधानी दिल्ली से लेकर देहरादून, हरिद्वार, हल्द्वानी और पहाड़ के दूरस्थ गांवों तक दीपावली की रौनक दिखाई देने लगी है। वहीं भगवान श्रीराम की नगरी अयोध्या में दीपोत्सव ने इस पर्व को राष्ट्रीय और सांस्कृतिक पहचान के एक बड़े आयोजन का स्वरूप दे दिया है। दीपावली के बदलते स्वरूप का सबसे बड़ा उदाहरण घरों की सजावट में दिखाई देता है। पहले दीपावली पर घरों की देहरी, आंगन और छतों पर मिट्टी के दीये जलाना ही रोशनी का प्रमुख माध्यम होता था। तेल और घी से जलने वाले दीयों के साथ परिवार के लोग मिलकर घर सजाते थे।
अब बिजली से चलने वाली रंग-बिरंगी झालरों, चमकते पर्दों, सजावटी लैंप, स्वचालित रोशनी और सौर ऊर्जा से चलने वाली लड़ियों का चलन बढ़ा है। मोबाइल से नियंत्रित होने वाली रंग बदलती रोशनी ने भी नई पीढ़ी को आकर्षित किया है। बाजारों में पारंपरिक मिट्टी के दीयों के साथ डिजाइनर दीये, सुगंधित मोमबत्तियां और आकर्षक सजावटी सामान उपलब्ध हैं। इसके बावजूद मिट्टी के दीयों की अपनी अलग पहचान बनी हुई है। अनेक परिवार आज भी पूजा और मुख्य द्वार पर पारंपरिक दीपक जलाना शुभ मानते हैं। यही कारण है कि आधुनिक सजावट के बीच मिट्टी के दीयों की मांग पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। खरीदारी का तरीका भी तेजी से बदला है। पहले दीपावली के लिए कपड़े, बर्तन, मिठाई, पूजा सामग्री और घर की सजावट का सामान खरीदने के लिए लोग बाजारों में जाते थे। अब दुकानों के साथ इंटरनेट के माध्यम से खरीदारी का विकल्प भी मौजूद है। मोबाइल पर सामान पसंद करना, घर बैठे भुगतान करना और सीधे घर पर सामान मंगाना नई पीढ़ी की जीवनशैली का हिस्सा बन गया है। हालांकि त्योहार के मौके पर बाजार जाकर खरीदारी करने का उत्साह अब भी कम नहीं हुआ है। देहरादून के पलटन बाजार, धामावाला, झंडा बाजार, करनपुर और आसपास के व्यावसायिक क्षेत्रों में सजावट और खरीदारी की चहल-पहल दिखाई देती है।
कपड़ों, मिठाइयों, बर्तनों, इलेक्ट्रॉनिक सामान, आभूषणों और पूजा सामग्री की दुकानों पर ग्राहक पहुंच रहे हैं। दुकानदारों को उम्मीद है कि त्योहार के अंतिम दिनों में खरीदारी और तेज होगी। धनतेरस से लेकर दीपावली तक बाजारों में होने वाला कारोबार छोटे व्यापारियों, कारीगरों, फेरीवालों और स्थानीय उत्पादकों के लिए कमाई का बड़ा अवसर बनता है। राजधानी दिल्ली में भी दीपावली की खरीदारी का अलग ही रंग देखने को मिलता है। चांदनी चौक, सदर बाजार, करोल बाग, लाजपत नगर और अन्य प्रमुख बाजारों में सजावट, कपड़ों, मिठाइयों और उपहारों की खरीदारी के लिए भीड़ उमड़ती है। इस बार भी त्योहार से पहले बाजारों में खरीदारी की भीड़ और यातायात का दबाव दिखाई दिया है। दिल्ली में पांच नवंबर को प्रमुख बाजारों के आसपास भारी भीड़ के कारण यातायात प्रभावित होने और किराये की गाड़ियों के महंगे होने की खबरें सामने आईं। इससे स्पष्ट है कि ऑनलाइन खरीदारी बढ़ने के बावजूद त्योहार के समय पारंपरिक बाजारों का आकर्षण बरकरार है। दीपावली अब केवल खरीदारी और सजावट का पर्व नहीं, बल्कि छोटे कारोबार और रोजगार से जुड़ा बड़ा अवसर भी बन चुकी है। कुम्हारों के लिए मिट्टी के दीये बनाने का मौसम सबसे महत्वपूर्ण होता है। फूल बेचने वाले, मिठाई तैयार करने वाले हलवाई, सजावटी सामान बनाने वाले कारीगर, कपड़ा व्यापारी, इलेक्ट्रॉनिक दुकानदार और पैकिंग का काम करने वाले लोगों की कमाई भी इस दौरान बढ़ती है। घरों में सजावट के लिए फूलों की मांग बढ़ती है तो उपहारों की पैकिंग और मिठाइयों के डिब्बों का कारोबार भी गति पकड़ता है। त्योहार की अर्थव्यवस्था में अब महिलाओं के स्वयं सहायता समूहों की भागीदारी भी महत्वपूर्ण होती जा रही है। पहाड़ की महिलाएं ऐपण कला से सजे दीये, पूजा की थालियां, सजावटी सामान, स्थानीय अनाज से बने उत्पाद और उपहार सामग्री तैयार कर रही हैं। इससे पारंपरिक हुनर को बाजार मिल रहा है और ग्रामीण महिलाओं के लिए आमदनी के नए रास्ते खुल रहे हैं। दीपावली के उपहारों की दुनिया में भी बड़ा बदलाव आया है। पहले रिश्तेदारों और परिचितों के यहां मिठाई के डिब्बे लेकर जाने की परंपरा थी। अब ड्राई फ्रूट, चॉकलेट, सुगंधित मोमबत्तियों, हस्तशिल्प, सजावटी वस्तुओं और स्थानीय उत्पादों से तैयार उपहारों का चलन बढ़ा है।
मिलेट्स यानी मोटे अनाज से बने उत्पादों के उपहार पैकेट भी लोगों को आकर्षित कर रहे हैं। उत्तराखंड में मंडुवा, झंगोरा, पहाड़ी दालों और स्थानीय उत्पादों से तैयार उपहार सामग्री को बढ़ावा मिलने से त्योहार के बाजार में पहाड़ के स्वाद और पहचान को जगह मिल रही है। इससे उपहार देने की परंपरा के साथ स्थानीय उत्पादों को प्रोत्साहन देने का नया विचार भी जुड़ रहा है। खानपान की परंपरा में भी बदलाव आया है। पहले दीपावली से कई दिन पहले घरों में महिलाएं मिलकर गुझिया, शक्करपारे, नमकपारे, लड्डू और अन्य पकवान तैयार करती थीं। पहाड़ में अरसे, रोटने, सिंगल और दूसरे पारंपरिक व्यंजन त्योहार की रसोई का हिस्सा होते थे। इन पकवानों को तैयार करने में परिवार के सभी सदस्य शामिल होते थे। अब कामकाजी जीवनशैली और समय की कमी के कारण बाजार से मिठाइयां और तैयार पकवान खरीदने का चलन बढ़ा है। हालांकि कई परिवारों में पुरानी परंपरा को बचाने की कोशिश भी जारी है। नई पीढ़ी अब पारंपरिक व्यंजनों को आधुनिक तरीके से तैयार कर रही है और उन्हें सामाजिक माध्यमों के जरिए दूसरे लोगों तक पहुंचा रही है। इस तरह दीपावली की रसोई में पुरानी परंपराओं और नए प्रयोगों का मेल दिखाई देता है।
अयोध्या से पहाड़ तक परंपरा और आधुनिकता का संगम-
दीपावली के बदलते स्वरूप में अयोध्या की भूमिका भी विशेष हो गई है। भगवान श्रीराम की नगरी में दीपोत्सव अब केवल स्थानीय धार्मिक आयोजन नहीं रह गया, बल्कि देशभर के लोगों के आकर्षण का केंद्र बन चुका है। इस वर्ष अयोध्या में 5 से 8 नवंबर तक चार दिवसीय दीपोत्सव और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। दीपावली के दिन भी शहर के प्रमुख धार्मिक और सांस्कृतिक स्थलों पर कार्यक्रम होंगे। सरयू तट और रामनगरी की सजावट के बीच दीपों की रोशनी धार्मिक आस्था के साथ सांस्कृतिक विरासत को भी सामने लाती है। इस आयोजन ने मिट्टी के दीयों, पारंपरिक लोककलाओं, रामलीला और भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं को नई पहचान देने का काम किया है। आयोजन को देखते हुए अयोध्या में यातायात और सुरक्षा के विशेष इंतजाम भी किए गए हैं। वहीं उत्तराखंड में दीपावली का स्वरूप मैदानी क्षेत्रों से कुछ अलग दिखाई देता है। पहाड़ के गांवों में यह पर्व केवल घरों को रोशन करने तक सीमित नहीं है, बल्कि लोकसंस्कृति, पारिवारिक मेल-मिलाप और सामूहिक उत्सव का भी अवसर है।
गांवों में घरों की देहरी पर ऐपण बनाने, पारंपरिक पकवान तैयार करने, पूजा-अर्चना करने और बुजुर्गों से आशीर्वाद लेने की परंपरा आज भी जीवित है। हालांकि पलायन और बदलती जीवनशैली का असर इन परंपराओं पर भी पड़ा है। कई गांव ऐसे हैं जहां बड़ी संख्या में परिवार रोजगार और शिक्षा के लिए शहरों में रहते हैं। दीपावली पर कुछ परिवार अपने गांव लौटते हैं तो लंबे समय से शांत पड़े घरों में फिर से रोशनी दिखाई देती है। गांव की दुकानों में रौनक लौटती है और रिश्तेदारों के मिलने से त्योहार का उत्साह बढ़ जाता है। दूसरी ओर, देहरादून जैसे शहरों में पहाड़ से आए परिवार आधुनिक सजावट और पारंपरिक पूजा दोनों को साथ लेकर चलते हैं। घरों में एलईडी झालरें भी लगती हैं और पूजा के समय मिट्टी के दीये भी जलाए जाते हैं। यही मिश्रित स्वरूप बदलती दीपावली की सबसे बड़ी पहचान बन रहा है। दीपावली का संदेश केवल भारत तक सीमित नहीं है। दुनिया के अलग-अलग देशों में बसे भारतीय समुदाय भी इस पर्व को उत्साह से मनाते हैं। विदेशों में मंदिरों, सामुदायिक केंद्रों और भारतीय परिवारों के घरों में दीपावली के आयोजन होते हैं। भारतीय संस्कृति और परंपराओं के प्रसार के साथ यह त्योहार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान बना चुका है। लेकिन जिस समय दुनिया के कई हिस्से युद्ध, हिंसा और राजनीतिक तनाव से जूझ रहे हैं, उस समय दीपावली का प्रकाश शांति, सद्भाव और मानवता का संदेश भी देता है। युद्ध की विभीषिका में उजड़ते घरों और बिछड़ते परिवारों की तस्वीरों के बीच दीपावली यह याद दिलाती है कि रोशनी का वास्तविक अर्थ केवल घर सजाना नहीं, बल्कि जीवन में उम्मीद, प्रेम और विश्वास को बचाए रखना है। भगवान श्रीराम की अयोध्या वापसी से जुड़ा यह पर्व बुराई पर अच्छाई और अंधकार पर प्रकाश की विजय का प्रतीक माना जाता है। यही संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना सदियों पहले था।
पर्यावरण के लिहाज से भी दीपावली का स्वरूप बदलने की जरूरत महसूस की जा रही है। पहले त्योहार की पहचान मिट्टी के दीयों और प्राकृतिक सजावट से होती थी, लेकिन समय के साथ पटाखों और बिजली की तेज रोशनी का चलन बढ़ा। अब प्रदूषण और स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं के कारण लोग पर्यावरण के अनुकूल विकल्पों की ओर भी ध्यान दे रहे हैं। मिट्टी के दीये, फूलों की सजावट, गोबर से बने दीपक, प्राकृतिक रंगों की रंगोली और कम बिजली खर्च करने वाली एलईडी लड़ियां इस बदलाव का हिस्सा हैं। दिल्ली में इस बार पटाखों को लेकर भी सख्त नियम लागू किए गए हैं। राजधानी में सात और आठ नवंबर को निर्धारित समय के दौरान केवल प्रमाणित हरित पटाखे जलाने की अनुमति दी गई है। इसके पीछे वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने की कोशिश है। त्योहार के दौरान सुरक्षा और व्यवस्था भी प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती होती है। बाजारों में भीड़, यातायात का दबाव, पटाखों की बिक्री और आग लगने की आशंका को देखते हुए विशेष इंतजाम किए जाते हैं। उत्तर प्रदेश में दीपावली और छठ पर्व को देखते हुए अधिकारियों की छुट्टियां रद्द करने के साथ चौबीस घंटे सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने के निर्देश दिए गए हैं। अयोध्या सहित प्रमुख धार्मिक स्थलों, बाजारों और संवेदनशील क्षेत्रों में निगरानी बढ़ाई गई है। देहरादून सहित उत्तराखंड के प्रमुख शहरों में भी त्योहार के दौरान बाजारों की भीड़ और अग्नि सुरक्षा को लेकर प्रशासनिक सतर्कता जरूरी है। बदलती दीपावली में परिवार और रिश्तों की भूमिका भी एक नए दौर से गुजर रही है। पहले त्योहार पर रिश्तेदारों और पड़ोसियों के घर जाकर शुभकामनाएं देने की परंपरा थी।
अब दूर रहने वाले परिवार के सदस्य वीडियो कॉल और संदेशों के माध्यम से एक-दूसरे से जुड़ते हैं। नौकरी और शिक्षा के कारण दूसरे शहरों में रहने वाले युवाओं के लिए दीपावली पर घर लौटना खास अवसर बन गया है। वहीं कई बुजुर्ग ऐसे भी हैं जिनके बच्चे दूसरे शहरों या विदेशों में रहते हैं। उनके लिए त्योहार पर अपनों का साथ सबसे बड़ा उपहार होता है। डिजिटल माध्यमों ने दूरियों को कम करने का रास्ता जरूर दिया है, लेकिन परिवार के साथ बैठकर पूजा करने, मिठाई बांटने और एक-दूसरे से मिलने का आनंद आज भी अपनी जगह बनाए हुए है। धार्मिक परंपराओं में भी आधुनिकता के साथ बदलाव दिखाई देता है। पहले परिवार के सभी सदस्य मिलकर पूजा की सामग्री जुटाते थे और घर के मंदिर में विधि-विधान से पूजा करते थे। अब बाजार में तैयार पूजा सामग्री के पैकेट उपलब्ध हैं। ऑनलाइन माध्यमों से पूजा की सामग्री और उपहार मंगाए जा रहे हैं। कई मंदिरों में दूर रहने वाले श्रद्धालुओं के लिए पूजा और आरती के सीधे प्रसारण की व्यवस्था भी की जाती है। हालांकि पूजा का मूल भाव आज भी वही है। धनतेरस पर भगवान धन्वंतरि की पूजा, दीपावली पर माता लक्ष्मी और भगवान गणेश का पूजन, घरों में दीपदान और भाई दूज पर भाई-बहन के रिश्ते का उत्सव इस पर्व की परंपरा को जीवित रखे हुए हैं। दीपावली की एक खास बात यह भी है कि इसमें अर्थव्यवस्था, संस्कृति और सामाजिक जीवन तीनों एक साथ दिखाई देते हैं। किसी के लिए यह नए कपड़े खरीदने का अवसर है तो किसी के लिए सालभर की मेहनत से तैयार किए गए उत्पाद बेचकर कमाई करने का मौसम। कुम्हार के लिए दीये, हलवाई के लिए मिठाइयां, फूल विक्रेता के लिए फूल, महिलाओं के स्वयं सहायता समूहों के लिए हस्तनिर्मित सामान और दुकानदारों के लिए बढ़ता कारोबार इस पर्व से जुड़ा है।
वहीं बच्चों के लिए नए कपड़े और मिठाइयां, बुजुर्गों के लिए पारिवारिक मिलन और युवाओं के लिए उत्सव तथा सजावट का आकर्षण दीपावली को अलग-अलग अनुभवों से जोड़ता है। इस बार रविवार को पड़ रही दीपावली के चलते लोगों को परिवार के साथ त्योहार मनाने और खरीदारी की तैयारियों के लिए अलग तरह की सुविधा मिल सकती है। हालांकि बाजारों में भीड़ और यातायात का दबाव भी बढ़ने की संभावना है। पांच दिवसीय उत्सव के दौरान धनतेरस, नरक चतुर्दशी, दीपावली, गोवर्धन पूजा और भाई दूज की परंपराएं अलग-अलग धार्मिक और पारिवारिक महत्व रखती हैं। देश के अलग-अलग हिस्सों में इन पर्वों को मनाने के तरीके भले ही अलग हों, लेकिन इनके मूल में सुख-समृद्धि, आरोग्य, पारिवारिक एकता और खुशहाली की कामना ही है। कुल मिलाकर दीपावली का स्वरूप समय के साथ जरूर बदला है, लेकिन इसका मूल संदेश आज भी कायम है। मिट्टी के दीयों के साथ बिजली की झालरें, घर में बने पकवानों के साथ बाजार की मिठाइयां, पारंपरिक उपहारों के साथ डिजिटल खरीदारी और गांवों की लोकसंस्कृति के साथ आधुनिक शहरों की चमक इस त्योहार के नए रूप को सामने ला रही है।


















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