दुनिया की अर्थव्यवस्था में सोने का महत्व एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। केंद्रीय बैंकों की ओर से सोने की खरीद बढ़ाने के बीच चीन ने अपने आधिकारिक स्वर्ण भंडार में लगातार इजाफा करते हुए वैश्विक सूची में पांचवां स्थान हासिल कर लिया है। द कोबेसी लेटर के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, चीन के पास अब 2,410 टन आधिकारिक सोना है। इस आंकड़े के साथ चीन ने रूस को पीछे छोड़ दिया है और अब उसकी नजर उन देशों पर है, जो उससे कुछ ही टन आगे हैं। इनमें फ्रांस और इटली शामिल हैं। चीन की सोना खरीदने की रणनीति को वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में अपने भंडार को मजबूत करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। दुनिया में सबसे ज्यादा आधिकारिक सोना रखने वाले देशों की सूची में अमेरिका पहले स्थान पर बना हुआ है। उसके बाद जर्मनी, इटली और फ्रांस का स्थान है, जबकि चीन पांचवें पायदान पर पहुंच गया है। चीन और शीर्ष चार देशों के बीच सोने के भंडार का अंतर अलग-अलग है, लेकिन फ्रांस और इटली के मुकाबले यह अंतर अब बहुत ज्यादा नहीं रह गया है। यही वजह है कि चीन के स्वर्ण भंडार में होने वाली हर नई बढ़ोतरी पर अंतरराष्ट्रीय बाजार और वित्तीय विश्लेषकों की नजर बनी हुई है।
द कोबेसी लेटर के अनुसार, चीन ने सितंबर 2026 में 23 टन सोना खरीदा। इस खरीद के बाद उसका आधिकारिक स्वर्ण भंडार बढ़कर 2,410 टन पहुंच गया। सोने की खरीद में यह बढ़ोतरी चीन की उस नीति के अनुरूप है, जिसके तहत वह अपने विदेशी मुद्रा भंडार में विविधता लाने और सुरक्षित परिसंपत्तियों का हिस्सा बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। हालांकि, किसी देश की आर्थिक ताकत का आकलन केवल उसके स्वर्ण भंडार से नहीं किया जा सकता। विदेशी मुद्रा, सरकारी ऋण, व्यापार, औद्योगिक उत्पादन और वित्तीय बाजारों की स्थिति भी इसमें अहम भूमिका निभाते हैं। सोना लंबे समय से दुनिया के केंद्रीय बैंकों के लिए एक महत्वपूर्ण आरक्षित परिसंपत्ति रहा है। आर्थिक अनिश्चितता, मुद्रास्फीति के दबाव और अंतरराष्ट्रीय तनाव के दौर में इसे अपेक्षाकृत सुरक्षित निवेश माना जाता है। सोने का महत्व इस कारण भी है कि यह किसी एक देश की मुद्रा या किसी दूसरे देश की सरकार के भुगतान संबंधी वादे पर सीधे निर्भर नहीं करता। इसी वजह से कई केंद्रीय बैंक अपने कुल भंडार में सोने की हिस्सेदारी बढ़ाने पर विचार करते हैं।
चीन की बढ़ती खरीद को इसी व्यापक वैश्विक प्रवृत्ति से जोड़कर देखा जा रहा है। दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल चीन के लिए विदेशी मुद्रा भंडार का संतुलन बनाए रखना महत्वपूर्ण है। उसके पास अमेरिकी डॉलर और दूसरी मुद्राओं में मौजूद परिसंपत्तियों के साथ सोना भी आरक्षित भंडार का हिस्सा है। सोने की मात्रा बढ़ने से उसके भंडार में विविधता आती है, हालांकि इससे डॉलर या दूसरी मुद्राओं पर निर्भरता कितनी घटेगी, यह कुल भंडार की संरचना और भविष्य की खरीद पर निर्भर करेगा। चीन की इस बढ़त का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि वह अब उन यूरोपीय देशों के काफी करीब पहुंच चुका है, जिनके पास लंबे समय से बड़े आधिकारिक स्वर्ण भंडार हैं। ताजा आंकड़ों के मुताबिक, फ्रांस के पास करीब 2,437 टन और इटली के पास लगभग 2,452 टन सोना है। चीन का भंडार फ्रांस से करीब 27 टन और इटली से लगभग 42 टन कम बताया गया है। इस सीमित अंतर ने वैश्विक स्वर्ण भंडार की सूची में चीन की स्थिति को खासा महत्वपूर्ण बना दिया है।
हालांकि, इन आंकड़ों के आधार पर चीन के तीसरे स्थान पर पहुंचने की समय-सीमा निश्चित नहीं मानी जा सकती। इसके लिए चीन की आगे की खरीद, फ्रांस और इटली के भंडार में बदलाव तथा संबंधित आंकड़ों की अद्यतन स्थिति को देखना होगा। सोने की कीमतों में उतार-चढ़ाव भी भंडार के बाजार मूल्य को प्रभावित करता है, लेकिन देशों की आधिकारिक रैंकिंग सामान्यतः सोने की मात्रा के आधार पर तय की जाती है, न कि केवल उसके बाजार मूल्य के आधार पर।
वैश्विक स्वर्ण भंडार की सूची में अमेरिका अब भी सबसे आगे, भारत आठवें स्थान पर
वैश्विक स्वर्ण भंडार की सूची में अमेरिका अब भी पहले स्थान पर है। उसके पास दुनिया के किसी भी अन्य देश की तुलना में कहीं अधिक आधिकारिक सोना मौजूद है। अमेरिका के बाद जर्मनी, इटली और फ्रांस जैसे देशों का नाम आता है। इन देशों ने दशकों से अपने स्वर्ण भंडार को मजबूत बनाए रखा है। चीन का पांचवें स्थान पर पहुंचना इस बात को रेखांकित करता है कि वैश्विक स्तर पर सोने के भंडार का संतुलन लगातार बदल रहा है। भारत की स्थिति भी इस सूची में महत्वपूर्ण है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, भारत आठवें स्थान पर है। चीन के 2,410 टन के आधिकारिक स्वर्ण भंडार की तुलना में भारत के पास लगभग एक-तिहाई सोना है।
हालांकि, भारत के लिए सोने का महत्व केवल अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग तक सीमित नहीं है। भारतीय रिजर्व बैंक भी अपने भंडार में सोने की हिस्सेदारी पर ध्यान देता है। सोना विदेशी मुद्रा भंडार को विविधता देने और वित्तीय अनिश्चितता के समय सुरक्षा प्रदान करने वाली परिसंपत्ति के रूप में अहम भूमिका निभाता है। भारत और चीन की अर्थव्यवस्थाओं की संरचना, विदेशी मुद्रा भंडार और केंद्रीय बैंक की नीतियां अलग-अलग हैं। इसलिए दोनों देशों के स्वर्ण भंडार की तुलना करते समय केवल टन में उपलब्ध मात्रा को ही आर्थिक मजबूती का अंतिम पैमाना नहीं माना जा सकता।
इसके बावजूद चीन की लगातार खरीद और भारत समेत दूसरे देशों की स्वर्ण भंडार संबंधी नीतियां वैश्विक वित्तीय परिदृश्य को समझने के लिए महत्वपूर्ण संकेत देती हैं। सोने की खरीद के पीछे केंद्रीय बैंकों के कई उद्देश्य होते हैं। इनमें आर्थिक जोखिमों से सुरक्षा, भंडार में विविधता और लंबे समय में परिसंपत्तियों का मूल्य बनाए रखने की कोशिश शामिल है। अंतरराष्ट्रीय तनाव या वित्तीय बाजारों में अस्थिरता के दौरान सोने की मांग बढ़ सकती है। लेकिन सोने की कीमतें भी बदलती रहती हैं और जरूरत पड़ने पर किसी देश की ओर से खरीद की गति कम या ज्यादा की जा सकती है।
चीन के सामने अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या वह अपनी मौजूदा खरीद की गति बनाए रख पाएगा। यदि चीन अपने भंडार में लगातार इजाफा करता है और दूसरे देशों के भंडार में बड़ा बदलाव नहीं होता, तो फ्रांस और इटली के साथ अंतर कम हो सकता है। फिर भी उसे तीसरे स्थान तक पहुंचने में कितना समय लगेगा, यह भविष्य की खरीद पर निर्भर करेगा। कुल मिलाकर, चीन का 2,410 टन सोने तक पहुंचना वैश्विक स्वर्ण भंडार की बदलती तस्वीर का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
रूस को पीछे छोड़कर पांचवें स्थान पर पहुंचने के बाद चीन अब शीर्ष चार देशों के और करीब आ गया है। अमेरिका पहले स्थान पर कायम है, जबकि भारत आठवें स्थान पर अपनी मौजूदगी बनाए हुए है। आने वाले महीनों में केंद्रीय बैंकों की खरीद और आधिकारिक भंडार के नए आंकड़े बताएंगे कि दुनिया के स्वर्ण भंडार की इस दौड़ में अगला बदलाव किस देश की स्थिति को प्रभावित करता है।


















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