राजधानी दिल्ली में इस बार मानसून ने सामान्य समय से पहले ही विदाई ले ली है। भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) ने बुधवार को घोषणा की कि दक्षिण-पश्चिम मानसून दिल्ली से पूरी तरह लौट गया है। खास बात यह है कि 2002 के बाद यह दिल्ली से मानसून की सबसे जल्दी वापसी है। वर्ष 2002 में मानसून 20 सितंबर को दिल्ली से विदा हुआ था, जबकि इस बार सितंबर के तीसरे सप्ताह में ही इसकी वापसी दर्ज की गई है। मानसून की वापसी के साथ दिल्ली और उत्तर-पश्चिम भारत के कई हिस्सों में अब धीरे-धीरे मौसम के शुष्क होने की संभावना बढ़ गई है। आईएमडी के मुताबिक, मानसून की वापसी केवल दिल्ली तक सीमित नहीं रही है। मानसून पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के अधिकांश हिस्सों से पीछे हट चुका है। इसके अलावा उत्तर प्रदेश और गुजरात के कुछ क्षेत्रों से भी दक्षिण-पश्चिम मानसून की वापसी दर्ज की गई है। मौसम विभाग ने मानसून की वापसी की स्थिति को दर्शाने वाली रेखा भी निर्धारित की है, जो इस समय गुरुदासपुर, चंडीगढ़, मुजफ्फरनगर, अलीगढ़, धौलपुर, उदयपुर, डीसा और नालिया से होकर गुजर रही है।
मानसून के पीछे हटने के साथ उत्तर-पश्चिम भारत में मौसम के मिजाज में धीरे-धीरे बदलाव आने की उम्मीद है। दिल्ली-एनसीआर और आसपास के इलाकों में बारिश की गतिविधियों में कमी आने के साथ वातावरण में नमी भी घट सकती है। हालांकि मानसून की वापसी का अर्थ यह नहीं है कि इसके बाद तुरंत हर जगह बारिश पूरी तरह बंद हो जाएगी। स्थानीय मौसम परिस्थितियों के कारण कुछ इलाकों में बारिश या गरज-चमक की गतिविधियां इसके बाद भी देखने को मिल सकती हैं। मौसम विभाग मानसून की वापसी की घोषणा किसी एक दिन की बारिश या तापमान में बदलाव के आधार पर नहीं करता। इसके लिए कई मौसमी संकेतों का लगातार अध्ययन किया जाता है। किसी क्षेत्र से मानसून की वापसी की घोषणा के लिए सबसे महत्वपूर्ण संकेतों में बारिश की गतिविधियों का लगातार रुकना, वातावरण में नमी का स्तर कम होना और निचले वायुमंडल में एंटीसाइक्लोनिक परिसंचरण का विकसित होना शामिल है।
इन परिस्थितियों के साथ जब मौसम में शुष्कता का क्रम लगातार बना रहता है और मानसून की वापसी का स्पष्ट पैटर्न दिखाई देता है, तब आईएमडी मानसून की वापसी की घोषणा करता है। इस लिहाज से दिल्ली से मानसून की वापसी को मौसम के एक नए चरण की शुरुआत के तौर पर देखा जा सकता है। मानसून के दौरान दिल्ली और उत्तर-पश्चिम भारत में वातावरण में नमी अधिक रहती है और बारिश के कारण मौसम में उतार-चढ़ाव बना रहता है। अब मानसून के पीछे हटने के साथ शुष्क हवाओं का प्रभाव धीरे-धीरे बढ़ सकता है। आने वाले दिनों में मौसम का मिजाज मानसून से उत्तर-मानसून काल की ओर बढ़ने लगेगा।
सामान्य तौर पर सितंबर के दौरान दक्षिण-पश्चिम मानसून उत्तर-पश्चिम भारत से पीछे हटना शुरू करता है। इसके बाद इसकी वापसी धीरे-धीरे मध्य भारत, पश्चिमी और पूर्वी हिस्सों की ओर बढ़ती है। मानसून की वापसी की प्रक्रिया उत्तर-पश्चिम से शुरू होकर दक्षिण और पूर्व की दिशा में आगे बढ़ती है। आईएमडी की संशोधित सामान्य तिथियों के अनुसार, उत्तर-पश्चिम भारत से मानसून की वापसी सामान्यतः 17 सितंबर के आसपास शुरू होती है। इसके बाद अक्टूबर के मध्य तक देश के अधिकांश हिस्सों से मानसून की वापसी हो जाती है।
15 अक्टूबर तक देश के अधिकांश हिस्सों से लौटता है मानसून
आईएमडी के अनुसार, देश के अधिकांश हिस्सों से दक्षिण-पश्चिम मानसून की वापसी सामान्य तौर पर 15 अक्टूबर तक पूरी हो जाती है। हालांकि दक्षिणी प्रायद्वीप में मानसून की वापसी की प्रक्रिया अपेक्षाकृत देर तक जारी रहती है। इसका कारण दक्षिणी हिस्सों की अलग भौगोलिक और मौसमी परिस्थितियां हैं। इसलिए देश के सभी हिस्सों से मानसून की विदाई एक साथ नहीं होती, बल्कि अलग-अलग चरणों में होती है। दिल्ली से इस बार मानसून की जल्दी विदाई इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह 2002 के बाद सबसे शुरुआती वापसी है। वर्ष 2002 में 20 सितंबर को दिल्ली से मानसून लौट गया था। इस बार उससे पहले ही राजधानी से मानसून की वापसी की घोषणा कर दी गई है। हालांकि मानसून की जल्दी वापसी का मतलब यह नहीं माना जाना चाहिए कि पूरे उत्तर भारत में मौसम तुरंत पूरी तरह शुष्क हो जाएगा। स्थानीय स्तर पर मौसम में बदलाव और कुछ क्षेत्रों में बारिश की संभावना बनी रह सकती है।
मानसून की वापसी के साथ तापमान में भी धीरे-धीरे बदलाव देखने को मिल सकता है। बारिश और बादलों की गतिविधियां कम होने पर दिन के तापमान में बढ़ोतरी हो सकती है, जबकि आसमान साफ रहने और रात के दौरान नमी कम होने से आगे चलकर रात के तापमान में भी बदलाव देखने को मिल सकता है। मौसम में यह परिवर्तन धीरे-धीरे होता है और क्षेत्र विशेष की परिस्थितियों पर निर्भर करता है। दिल्ली के साथ-साथ पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिन इलाकों से मानसून पीछे हट चुका है, वहां भी आने वाले दिनों में मौसम के अधिक शुष्क होने की संभावना है। मानसून की वापसी रेखा जैसे-जैसे दक्षिण और पूर्व की ओर आगे बढ़ेगी, वैसे-वैसे देश के अन्य हिस्सों में भी बारिश की गतिविधियों में कमी आने लगेगी।
मौसम वैज्ञानिक मानसून की वापसी को केवल बारिश की समाप्ति के रूप में नहीं देखते, बल्कि इसे वातावरण में होने वाले व्यापक बदलाव की प्रक्रिया माना जाता है। बारिश में लगातार कमी, हवा में नमी का घटना और निचले वायुमंडल में उच्च दबाव की स्थिति का बनना इस बदलाव के प्रमुख संकेत हैं। जब ये सभी परिस्थितियां एक साथ और लगातार दिखाई देती हैं, तभी मानसून की वापसी की स्थिति स्पष्ट होती है। इस बीच दिल्ली और उत्तर-पश्चिम भारत में लोगों को आने वाले दिनों में मौसम के धीरे-धीरे बदलने का अनुभव हो सकता है। मानसूनी उमस और बारिश से राहत मिलने के साथ वातावरण अपेक्षाकृत शुष्क होने लगेगा।
हालांकि दिन के तापमान में उतार-चढ़ाव बना रह सकता है और मौसम पूरी तरह बदलने में कुछ समय लग सकता है। मानसून की वापसी की रेखा अब जिस दिशा में आगे बढ़ रही है, उससे संकेत मिलता है कि आने वाले दिनों में देश के अन्य हिस्सों में भी मानसून की विदाई का सिलसिला जारी रहेगा। इस तरह दिल्ली से दक्षिण-पश्चिम मानसून की वापसी ने इस साल मानसूनी मौसम के अंतिम चरण की शुरुआत का संकेत दे दिया है। उत्तर-पश्चिम भारत में अब बारिश की गतिविधियां धीरे-धीरे कम होने और शुष्क मौसम के बढ़ने की संभावना है। हालांकि देश के अलग-अलग हिस्सों में मानसून की वापसी की गति अलग रह सकती है और दक्षिणी प्रायद्वीप में इसकी प्रक्रिया सामान्य से अधिक समय तक जारी रह सकती है।


















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