सालों की सेवा के बाद भी स्थायी भविष्य नहीं, आउटसोर्स कर्मचारियों ने हिमाचल सरकार को दिया दो महीने का अल्टीमेटम

हिमाचल प्रदेश विधानसभा का मानसून सत्र मंगलवार को उस समय गरमा गया, जब विधानसभा के बाहर सैकड़ों आउटसोर्स कर्मचारियों ने अपनी मांगों को लेकर जोरदार प्रदर्शन किया। लंबे समय से सरकारी विभागों में सेवाएं दे रहे कर्मचारियों ने सरकार से नौकरी की सुरक्षा, सम्मानजनक मानदेय और शोषण बंद करने की मांग उठाई। कर्मचारियों का कहना है कि वर्षों तक सरकारी व्यवस्था का हिस्सा बने रहने के बावजूद उनका भविष्य आज भी अनिश्चित है। विधानसभा के बाहर कर्मचारियों के प्रदर्शन के बीच सदन के भीतर भी आउटसोर्स भर्ती का मुद्दा गूंजा और विपक्ष ने इस मामले को लेकर सरकार पर सवाल उठाते हुए सदन से बहिर्गमन किया। शिमला के चौड़ा मैदान में जुटे आउटसोर्स कर्मचारियों ने सरकार के खिलाफ नारेबाजी करते हुए अपनी समस्याएं रखीं। कर्मचारियों का कहना है कि प्रदेश के विभिन्न सरकारी विभागों में हजारों कर्मचारी लंबे समय से आउटसोर्स व्यवस्था के तहत काम कर रहे हैं। इनमें बड़ी संख्या ऐसे कर्मचारियों की है, जो 15 से 20 वर्षों से लगातार अपनी सेवाएं दे रहे हैं। इसके बावजूद उन्हें नियमित कर्मचारियों की तरह नौकरी की स्थिरता और सुविधाएं नहीं मिल रही हैं।

कर्मचारियों ने आरोप लगाया कि उन्हें बेहद कम मानदेय में काम करना पड़ रहा है। कई आउटसोर्स कर्मचारियों को करीब 12 हजार रुपये मासिक मानदेय ही मिल रहा है। उनका कहना है कि आज के महंगाई के दौर में इतनी कम राशि में परिवार का खर्च चलाना बेहद मुश्किल हो गया है। वर्षों तक सेवाएं देने के बाद भी वे आर्थिक असुरक्षा से जूझ रहे हैं। प्रदर्शन कर रहे कर्मचारियों ने कहा कि उनकी सबसे बड़ी चिंता नौकरी की सुरक्षा को लेकर है। उनका कहना है कि आउटसोर्स व्यवस्था में काम करने वाले कर्मचारी हर समय इस आशंका में रहते हैं कि कब उनकी सेवा समाप्त कर दी जाए। कई कर्मचारी वर्षों से एक ही विभाग में अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं, लेकिन उन्हें स्थायी रोजगार की कोई स्पष्ट गारंटी नहीं मिली है।

कर्मचारियों के अनुसार, सरकारी विभागों में लगातार काम करने के बावजूद उन्हें स्थायी कर्मचारियों के बराबर अधिकार नहीं मिलते। उनका कहना है कि उनसे वही जिम्मेदारियां निभाई जाती हैं, जो अन्य कर्मचारियों द्वारा निभाई जाती हैं, लेकिन वेतन, सेवा सुरक्षा और भविष्य को लेकर उनके साथ अलग व्यवहार किया जाता है। यही वजह है कि अब आउटसोर्स कर्मचारी अपनी मांगों को लेकर खुलकर सड़क पर उतर आए हैं। प्रदर्शनकारियों ने सरकार को अपनी मांगें पूरी करने के लिए दो महीने का समय दिया है। आउटसोर्स कर्मचारी संघ ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि निर्धारित अवधि के भीतर उनकी मांगों पर ठोस फैसला नहीं लिया गया, तो प्रदेशभर में आंदोलन तेज किया जाएगा। कर्मचारियों ने कहा कि वे सरकार से टकराव नहीं चाहते, लेकिन लंबे समय से चली आ रही समस्याओं का समाधान अब जरूरी हो गया है।

नौकरी की सुरक्षा और सम्मानजनक मानदेय की मांग, दो महीने का अल्टीमेटम

आउटसोर्स कर्मचारियों ने सरकार के सामने तीन प्रमुख मांगें रखी हैं। इनमें सबसे अहम मांग नौकरी की सुरक्षा और लंबे समय से सेवाएं दे रहे कर्मचारियों के भविष्य को सुरक्षित करने की है। कर्मचारियों का कहना है कि जिन्होंने सरकारी विभागों में 15 से 20 वर्ष तक सेवाएं दी हैं, उनके अनुभव और सेवा अवधि को देखते हुए सरकार को उनके लिए स्थायी और सुरक्षित रोजगार की व्यवस्था करनी चाहिए। दूसरी बड़ी मांग मानदेय में बढ़ोतरी की है। कर्मचारियों का कहना है कि मौजूदा महंगाई में करीब 12 हजार रुपये मासिक मानदेय बेहद कम है। घर का किराया, बच्चों की पढ़ाई, राशन, बिजली-पानी और अन्य जरूरी खर्चों को देखते हुए इतनी कम आय में परिवार चलाना लगातार मुश्किल होता जा रहा है। उनका कहना है कि सरकार को उनके काम और जिम्मेदारियों के अनुरूप सम्मानजनक वेतन तय करना चाहिए।

तीसरी मांग आउटसोर्स व्यवस्था में होने वाले कथित शोषण को रोकने की है। कर्मचारियों का आरोप है कि लंबे समय से काम करने के बावजूद उन्हें सेवा सुरक्षा नहीं मिलती और कई बार उनकी सेवाओं को समाप्त करने का खतरा बना रहता है। उनका कहना है कि सरकार को ऐसी व्यवस्था बनानी चाहिए, जिसमें कर्मचारियों के अधिकार स्पष्ट हों और उन्हें मनमाने तरीके से नौकरी से हटाए जाने का डर न रहे। कर्मचारियों ने कहा कि उनका आंदोलन किसी राजनीतिक दल के समर्थन या विरोध के लिए नहीं, बल्कि अपने भविष्य और अधिकारों को लेकर है। उनका कहना है कि सरकार यदि उनकी समस्याओं को गंभीरता से लेती है और दो महीने के भीतर समाधान की दिशा में ठोस कदम उठाती है, तो आंदोलन की जरूरत नहीं पड़ेगी। लेकिन मांगों की अनदेखी जारी रही तो कर्मचारी प्रदेशभर में आंदोलन को व्यापक रूप देने के लिए मजबूर होंगे।

विधानसभा के बाहर प्रदर्शन और सदन के भीतर इस मुद्दे पर हुए हंगामे ने आउटसोर्स कर्मचारियों की समस्या को एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है। अब नजर इस बात पर है कि सरकार कर्मचारियों की मांगों पर क्या रुख अपनाती है और दो महीने की समयसीमा के भीतर उनके भविष्य को लेकर क्या ठोस निर्णय लिया जाता है। लंबे समय से सरकारी विभागों में काम कर रहे इन कर्मचारियों के लिए यह आंदोलन केवल वेतन बढ़ाने की मांग नहीं, बल्कि वर्षों की सेवा के बाद स्थायी भविष्य और सम्मानजनक रोजगार की लड़ाई बन गया है।

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