स्कॉटलैंड के ग्लास्गो में आयोजित 2026 राष्ट्रमंडल खेलों का रंगारंग समापन हो गया। समापन समारोह में स्कॉटलैंड ने भारत को जिम्मेदारी सौंपी। इस दौरान पूर्व ओलंपिक चैंपियन नीरज चोपड़ा और भारतीय ओलंपिक संघ की अध्यक्ष पीटी उषा की मौजूदगी में कॉमनवेल्थ का झंडा आधिकारिक तौर पर भारत को सौंपा गया। इसके बाद भारत ने मशहूर गायक-संगीतकार शंकर महादेवन और पूर्व मिस वर्ल्ड मानुषी छिल्लर के नेतृत्व में एक सांस्कृतिक कार्यक्रम के साथ अहमदाबाद 2030 की अपनी यात्रा शुरू की। इस कार्यक्रम की शुरुआत ‘वंदे मातरम’ से हुई, जिसके बाद डांस परफॉर्मेंस और संगीत के जरिए ‘वसुधैव कुटुंबकम’ (“दुनिया एक परिवार है”) की थीम पर देश की सांस्कृतिक विविधता को दिखाया गया।
इसके बाद एक ऑडियो-विजुअल प्रेजेंटेशन के जरिए अहमदाबाद 2030 की झलक दिखाई गई, जिसमें भारत की खेल यात्रा और शताब्दी कॉमनवेल्थ गेम्स की एक झलक पेश की गई। सीमित प्रतियोगिताओं और अपेक्षाकृत छोटे भारतीय दल के बावजूद भारत ने इन खेलों में दमदार प्रदर्शन करते हुए पदक तालिका में चौथा स्थान हासिल किया। भारतीय खिलाड़ियों ने 13 स्वर्ण, 17 रजत और 9 कांस्य सहित कुल 39 पदक जीतकर देश का गौरव बढ़ाया।
पहली नजर में यह आंकड़ा पिछले कुछ राष्ट्रमंडल खेलों की तुलना में कम दिखाई देता है, लेकिन यदि इस बार खेलों की संख्या, भारतीय दल के आकार और प्रतियोगिताओं की परिस्थितियों को ध्यान में रखा जाए तो यह प्रदर्शन भारतीय खेल इतिहास के सबसे प्रभावशाली अभियानों में गिना जाएगा। इस बार ग्लास्गो राष्ट्रमंडल खेलों में केवल 10 खेल शामिल किए गए थे, जबकि 2022 के बर्मिंघम राष्ट्रमंडल खेलों में 19 खेल आयोजित हुए थे। बैडमिंटन, कुश्ती, निशानेबाजी, हॉकी, टेबल टेनिस और क्रिकेट जैसे वे खेल इस बार कार्यक्रम का हिस्सा नहीं थे, जिनसे भारत ने बर्मिंघम में 30 पदक जीते थे। यही कारण है कि पदकों की संख्या कम होने के बावजूद भारत का प्रदर्शन अधिक प्रभावशाली माना जा रहा है।
भारत ने इस बार 210 खिलाड़ियों के बजाय केवल 123 खिलाड़ियों का दल भेजा था। इनमें से 38 खिलाड़ी पदक जीतने में सफल रहे। इस तरह भारतीय दल का सफलता प्रतिशत लगभग 31 प्रतिशत रहा, जो 2022 के बर्मिंघम खेलों के 29 प्रतिशत से बेहतर है। यह आंकड़ा दर्शाता है कि भारतीय खिलाड़ियों ने सीमित अवसरों में भी अधिक प्रभावी प्रदर्शन किया। पदक तालिका में ऑस्ट्रेलिया एक बार फिर सबसे आगे रहा। ऑस्ट्रेलिया ने 70 स्वर्ण, 45 रजत और 56 कांस्य सहित कुल 171 पदक जीतकर शीर्ष स्थान हासिल किया। इंग्लैंड 29 स्वर्ण, 45 रजत और 36 कांस्य सहित 110 पदकों के साथ दूसरे स्थान पर रहा, जबकि कनाडा ने 19 स्वर्ण, 20 रजत और 23 कांस्य सहित कुल 62 पदक जीतकर तीसरा स्थान प्राप्त किया। भारत 13 स्वर्ण पदकों के साथ चौथे स्थान पर रहा और उसने कई बड़े देशों को पीछे छोड़ दिया।
राष्ट्रमंडल खेलों से पहले भारतीय ओलंपिक संघ और विभिन्न खेल महासंघों की आंतरिक रिपोर्टों में भारत को लगभग 31 पदक और छह स्वर्ण मिलने का अनुमान लगाया गया था। लेकिन भारतीय खिलाड़ियों ने सभी अनुमान पीछे छोड़ते हुए 13 स्वर्ण सहित कुल 39 पदक जीत लिए। यानी स्वर्ण पदकों की संख्या अनुमान से दोगुने से भी अधिक रही। यही कारण है कि खेल विशेषज्ञ इस अभियान को भारतीय खेलों के लिए बड़ी सफलता मान रहे हैं। भारत की सबसे बड़ी ताकत इस बार मुक्केबाजी साबित हुई। बॉक्सिंग टीम ने सात स्वर्ण और तीन रजत सहित कुल 10 पदक जीतकर सबसे अधिक योगदान दिया। भारत के कुल पदकों में लगभग एक चौथाई हिस्सेदारी अकेले मुक्केबाजी की रही। जैस्मिन लांबोरिया, साक्षी चौधरी, प्रीति पवार, प्रिया घंघास, अरुंधति चौधरी, सचिन सिवाच और अंकुश पंघाल ने स्वर्ण पदक जीतकर भारतीय मुक्केबाजी को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया।
कई खेलों में चमके भारतीय खिलाड़ी, कुछ खेलों में उम्मीदें अधूरी रहीं
पैरा एथलेटिक्स भारत के लिए इस बार सबसे प्रेरणादायक खेलों में से एक रहा। केवल 11 पैरा एथलीटों के दल ने छह पदक जीतकर शानदार प्रदर्शन किया। इनमें तीन स्वर्ण, दो रजत और एक कांस्य पदक शामिल रहे। दिलीप गावित, सोमन राणा और शर्मिला धनकड़ ने स्वर्ण पदक जीतकर देश का नाम रोशन किया। भारतीय खिलाड़ियों ने कई स्पर्धाओं में डबल पोडियम और एक-दो स्थान की उपलब्धि भी हासिल की। जूडो में भारत ने इतिहास रच दिया। राष्ट्रमंडल खेलों के इतिहास में पहली बार भारत को जूडो में स्वर्ण पदक मिला। अस्मिता डे ने देश को पहला स्वर्ण दिलाया और कुछ ही मिनट बाद हर्ष सिंह ने दूसरा स्वर्ण जीतकर उपलब्धि को और बड़ा बना दिया। यामिनी मौर्य ने रजत तथा उन्नति शर्मा ने कांस्य पदक जीतकर कुल चार पदक भारत की झोली में डाले। हालांकि डोपिंग मामलों के कारण दो खिलाड़ियों के बाहर होने से टीम को नुकसान भी उठाना पड़ा।
एथलेटिक्स में भारत ने कुल 10 पदक जीते, लेकिन एक भी स्वर्ण पदक नहीं मिला। यह भारतीय अभियान की सबसे बड़ी निराशा रही। ओलंपिक स्वर्ण पदक विजेता नीरज चोपड़ा स्वर्ण जीतने की उम्मीदों पर खरे नहीं उतर सके और उन्हें रजत पदक से संतोष करना पड़ा। उनके साथ पहली बार राष्ट्रमंडल खेलों में उतरे यशवीर सिंह ने कांस्य पदक जीता। गुलवीर सिंह ने 10 हजार मीटर में रजत और पांच हजार मीटर में कांस्य जीतकर शानदार प्रदर्शन किया। तेजस्विन शंकर ने डेकाथलन में भारत का पहला राष्ट्रमंडल पदक जीतकर इतिहास रचा। वेटलिफ्टिंग में भारत ने आठ पदक जीते, लेकिन केवल एक स्वर्ण पदक हासिल हुआ। स्टार वेटलिफ्टर मीराबाई चानू ने लगातार तीसरी बार राष्ट्रमंडल खेलों का स्वर्ण जीतकर अपनी बादशाहत कायम रखी। ऋषिकांता सिंह, अजय बाबू और लवप्रीत सिंह ने खेलों के रिकॉर्ड बनाए, जबकि ज्ञानेश्वरी यादव ने राष्ट्रीय रिकॉर्ड तोड़कर अपनी प्रतिभा का परिचय दिया।
हालांकि कुछ खेलों में भारतीय खिलाड़ियों को निराशा भी हाथ लगी। लॉन बॉल्स में पिछली बार स्वर्ण और रजत जीतने वाली भारतीय टीम इस बार पदक से चूक गई। कई मुकाबलों में भारतीय खिलाड़ी बेहद मामूली अंतर से हार गए। पैरा पावरलिफ्टिंग में भी उम्मीदों के अनुरूप प्रदर्शन नहीं हो सका और केवल झंडू कुमार ही पदक जीत पाए।
जिम्नास्टिक्स, तैराकी और साइक्लिंग में भी भारतीय खिलाड़ियों को सफलता नहीं मिली। इसके बावजूद युवा खिलाड़ियों ने भविष्य के लिए उम्मीद जगाई। विशेष रूप से 16 वर्षीय ट्रैक साइक्लिस्ट लीशा दास की संघर्षपूर्ण कहानी चर्चा का विषय रही। सीमित संसाधनों और अनेक चुनौतियों के बावजूद उन्होंने ग्लास्गो तक का सफर तय किया और देश का प्रतिनिधित्व किया।
कुल मिलाकर, खेलों की संख्या कम होने, कई पारंपरिक भारतीय खेलों के कार्यक्रम में शामिल न होने और छोटे दल के बावजूद भारत ने चौथे स्थान पर रहते हुए शानदार प्रदर्शन किया। अनुमान से अधिक स्वर्ण पदक जीतना, कई नए खिलाड़ियों का उभरना और विभिन्न खेलों में नई उपलब्धियां हासिल करना इस अभियान को भारतीय राष्ट्रमंडल खेल इतिहास के सबसे सफल अभियानों में शामिल करता है। ग्लास्गो से लौट रही भारतीय टीम ने यह संदेश दिया है कि आने वाले वर्षों में भारत वैश्विक खेल मंच पर और अधिक मजबूती के साथ अपनी पहचान दर्ज कराने के लिए तैयार है।
















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