दुनिया एक बार फिर खाद्य संकट के मुहाने पर खड़ी दिखाई दे रही है। रसोई से लेकर खेतों तक और बाजार से लेकर वैश्विक व्यापार तक, हर जगह महंगाई की आहट तेज हो गई है। जिस खाने की थाली को लोग सामान्य जरूरत मानते थे, अब वही धीरे-धीरे महंगी होती जा रही है। तेल, अनाज, सब्जियां और मांस जैसी जरूरी चीजों के दाम लगातार बढ़ रहे हैं और इसके पीछे केवल स्थानीय कारण नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय तनाव भी जिम्मेदार बनते जा रहे हैं। वैश्विक बाजार में बढ़ती अस्थिरता ने अब आम लोगों की जेब पर सीधा असर डालना शुरू कर दिया है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर हालात जल्द नहीं सुधरे तो आने वाले महीनों में खाने-पीने की चीजों की कीमतें और तेजी से बढ़ सकती हैं। दुनिया पहले ही महामारी, युद्ध और आर्थिक मंदी जैसी चुनौतियों का सामना कर चुकी है, लेकिन अब खाद्य महंगाई नया संकट बनकर उभर रही है।
संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी फूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गेनाइजेशन (FAO) की ताजा रिपोर्ट ने इस चिंता को और बढ़ा दिया है। रिपोर्ट के अनुसार, अप्रैल 2026 में वैश्विक फूड कमोडिटी प्राइस इंडेक्स में 1.6 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। यह आंकड़ा पिछले साल की तुलना में 2.5 प्रतिशत ज्यादा है और पिछले तीन वर्षों का सबसे ऊंचा स्तर माना जा रहा है। रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि अमेरिका और ईरान के बीच जारी युद्ध ने वैश्विक सप्लाई चेन को बुरी तरह प्रभावित किया है। युद्ध के चलते पश्चिम एशिया में तनाव लगातार बढ़ रहा है और इसका असर अब खाद्य बाजार पर भी दिखाई देने लगा है। खासतौर पर हॉर्मुज रूट बंद होने से दुनिया के कई देशों के सामने नई आर्थिक मुश्किलें खड़ी हो गई हैं। हॉर्मुज रूट वैश्विक व्यापार का बेहद महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग माना जाता है। इसी रास्ते से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल, डीजल और खेती में इस्तेमाल होने वाले फर्टिलाइजर की सप्लाई होती है। लेकिन ईरान युद्ध के चलते यह रास्ता पिछले 10 हफ्तों से प्रभावित है।
इसके कारण जरूरी सामानों की आवाजाही बाधित हो गई है और ट्रांसपोर्टेशन लागत तेजी से बढ़ी है। सबसे ज्यादा असर खेती पर पड़ रहा है। डीजल और खाद महंगी होने से किसानों की लागत बढ़ती जा रही है। कई देशों में किसान अब कम फर्टिलाइजर इस्तेमाल वाली फसलों की तरफ जाने पर विचार कर रहे हैं। इसका सीधा असर गेहूं, मक्का और दूसरी प्रमुख फसलों के उत्पादन पर पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यही स्थिति बनी रही तो अगले सीजन में अनाज की कमी भी देखने को मिल सकती है। FAO की रिपोर्ट के मुताबिक, सबसे ज्यादा बढ़ोतरी वेजिटेबल ऑयल की कीमतों में हुई है। मार्च की तुलना में इसके दाम 5.9 प्रतिशत तक बढ़ गए हैं, जो जुलाई 2022 के बाद सबसे बड़ा उछाल है। दरअसल, कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने से बायो-फ्यूल की मांग तेजी से बढ़ी है।
कई देश अब पारंपरिक ईंधन की जगह बायो-फ्यूल का इस्तेमाल बढ़ा रहे हैं, जिसके कारण वनस्पति तेल की मांग अचानक बढ़ गई है।इसके अलावा मीट की कीमतों में भी 1.2 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। यह अब तक का सबसे ऊंचा स्तर बताया जा रहा है। वहीं अनाज की कीमतों में 0.8 प्रतिशत की तेजी आई है। खराब मौसम और 2026 में गेहूं की बुआई कम होने की खबरों ने बाजार में चिंता और बढ़ा दी है। फिलहाल यह महंगाई कमोडिटी मार्केट तक सीमित दिखाई दे रही है, लेकिन जल्द ही इसका असर रिटेल बाजार में भी साफ दिखाई देने लगेगा। यानी आने वाले समय में आम लोगों को रसोई का बजट संभालना और मुश्किल हो सकता है।
भारत समेत कई विकासशील देशों पर इसका असर ज्यादा देखने को मिल सकता है
दुनियाभर के आर्थिक विशेषज्ञ अब इस संकट को केवल अस्थायी उछाल नहीं बल्कि लंबी अवधि की चुनौती मानने लगे हैं। उनका कहना है कि अगर युद्ध लंबा खिंचता है और हॉर्मुज रूट जल्द नहीं खुलता, तो ईंधन और खाद की कीमतों में और बढ़ोतरी हो सकती है। इससे कृषि उत्पादन पर गहरा असर पड़ेगा और कई गरीब देशों में खाद्य संकट की स्थिति बन सकती है। भारत समेत कई विकासशील देशों पर इसका असर ज्यादा देखने को मिल सकता है, क्योंकि यहां बड़ी आबादी अभी भी खेती और आयातित ईंधन पर निर्भर है। भारत दुनिया के सबसे बड़े खाद्य उपभोक्ता देशों में शामिल है और यहां खाद्य महंगाई का असर सीधे आम आदमी की जेब पर पड़ता है। अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल और खाद महंगे बने रहते हैं, तो घरेलू बाजार में भी दाल, तेल, आटा और सब्जियों की कीमतें बढ़ सकती हैं।
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि बढ़ती लागत के कारण किसान उत्पादन कम कर सकते हैं। कई किसान पहले ही डीजल और खाद की कीमतों को लेकर चिंता जता चुके हैं। ऐसे में उत्पादन घटने से सप्लाई कमजोर होगी और बाजार में कीमतें और ऊपर जा सकती हैं। दूसरी ओर वैश्विक बाजार में निवेशकों की चिंता भी बढ़ गई है। कमोडिटी मार्केट में तेजी के कारण कई देशों में महंगाई दर बढ़ने का खतरा पैदा हो गया है। अगर खाद्य महंगाई लंबे समय तक बनी रहती है, तो केंद्रीय बैंकों पर ब्याज दरें बढ़ाने का दबाव भी बढ़ सकता है। इसका असर आर्थिक विकास पर पड़ेगा। संयुक्त राष्ट्र ने अपनी रिपोर्ट में चेतावनी दी है कि आने वाले महीनों में हालात और गंभीर हो सकते हैं।
एजेंसी ने देशों से अपील की है कि वे खाद्य सप्लाई को सुरक्षित रखने और गरीब तबकों को राहत देने के लिए पहले से तैयारी करें। दुनिया को अब केवल युद्ध और राजनीति पर नहीं बल्कि खाद्य सुरक्षा पर भी गंभीरता से ध्यान देना होगा। क्योंकि अगर खाने की कीमतें लगातार बढ़ती रहीं, तो इसका असर केवल अर्थव्यवस्था तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक अस्थिरता भी बढ़ सकती है। फिलहाल दुनिया की नजरें पश्चिम एशिया के हालात पर टिकी हैं। अगर तनाव कम होता है और व्यापारिक रास्ते सामान्य होते हैं तो बाजार को कुछ राहत मिल सकती है। लेकिन मौजूदा हालात यह संकेत दे रहे हैं कि आने वाले दिनों में महंगाई दुनिया के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बनने वाली है।

















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