हिमाचल प्रदेश के चार नगर निगम चुनाव में इस बार महिलाओं की सबसे मजबूत मौजूदगी, गरीब राजनीति से बाहर

हिमाचल प्रदेश के चार नगर निगम चुनाव इस बार कई मायनों में अलग तस्वीर पेश कर रहे हैं। चुनावी मैदान में उतरे उम्मीदवारों के आंकड़े यह संकेत दे रहे हैं कि स्थानीय राजनीति अब आम और गरीब वर्ग की पहुंच से धीरे-धीेरे दूर होती जा रही है। नगर निगम चुनावों में जहां एक तरफ मध्यम वर्ग और संपन्न परिवारों के उम्मीदवारों की संख्या लगातार बढ़ रही है, वहीं दूसरी तरफ गरीब तबके की भागीदारी लगभग नगण्य दिखाई दे रही है। राज्य निर्वाचन आयोग की रिपोर्ट ने इस सामाजिक और राजनीतिक असमानता को साफ तौर पर उजागर कर दिया है। सोलन, मंडी, पालमपुर और धर्मशाला नगर निगम चुनावों में कुल 172 उम्मीदवार मैदान में हैं, लेकिन इनमें गरीबी रेखा से नीचे यानी बीपीएल परिवार से सिर्फ एक उम्मीदवार चुनाव लड़ रहा है। 

यह आंकड़ा केवल 0.58 प्रतिशत है, जो यह दिखाने के लिए काफी है कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए चुनाव लड़ना कितना कठिन होता जा रहा है। राजनीतिक दलों की प्राथमिकताओं पर भी सवाल उठ रहे हैं, क्योंकि कांग्रेस और बीजेपी दोनों ने ही गरीब वर्ग को लगभग नजरअंदाज किया है। इन चुनावों की एक और बड़ी तस्वीर महिलाओं की बढ़ती भागीदारी है। 50 प्रतिशत आरक्षण के चलते इस बार महिला उम्मीदवारों की संख्या पुरुषों से अधिक हो गई है। कुल 172 उम्मीदवारों में 96 महिलाएं हैं, जो लगभग 55.81 प्रतिशत हिस्सा बनाती हैं। वहीं पुरुष उम्मीदवारों की संख्या 76 यानी 44.19 प्रतिशत है। यह बदलाव स्थानीय राजनीति में महिलाओं की बढ़ती भूमिका और नेतृत्व क्षमता को दर्शाता है। चुनावी मैदान में उतरने वाले उम्मीदवारों की आर्थिक स्थिति पर नजर डालें तो 116 उम्मीदवार एपीएल यानी गरीबी रेखा से ऊपर के परिवारों से हैं। 

यह कुल उम्मीदवारों का 67.44 प्रतिशत हिस्सा है। वहीं 38 उम्मीदवार टैक्स पेयर हैं, जबकि 17 उम्मीदवार नॉन टैक्स पेयर श्रेणी में आते हैं। आंकड़े साफ बता रहे हैं कि नगर निगम चुनाव अब आम गरीब परिवारों के लिए चुनौतीपूर्ण होते जा रहे हैं। चुनाव खर्च, प्रचार और राजनीतिक नेटवर्क की जरूरत ने आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को पीछे धकेल दिया है। शिक्षा के स्तर पर भी चुनावी तस्वीर काफी दिलचस्प है। नगर निगम चुनाव में सबसे ज्यादा उम्मीदवार 10वीं से 12वीं तक शिक्षित हैं। 40 उम्मीदवार 10वीं से 12वीं पास हैं, जबकि 41 उम्मीदवार केवल मैट्रिक तक पढ़े हैं। 46 उम्मीदवारों ने ग्रेजुएशन और 30 ने पोस्ट ग्रेजुएशन कर रखी है। इसके अलावा 14 उम्मीदवार ऐसे भी हैं जिन्होंने 10वीं से कम पढ़ाई की है। चुनावी मैदान में एक अनपढ़ उम्मीदवार भी शामिल है। 

इससे साफ होता है कि स्थानीय निकाय चुनावों में उच्च शिक्षा जरूरी शर्त नहीं बन पाई है और अलग-अलग शैक्षणिक पृष्ठभूमि के लोग राजनीति में सक्रिय हैं। जातीय और सामाजिक वर्गों के आधार पर देखें तो सामान्य वर्ग का प्रभाव सबसे अधिक दिखाई देता है। ओपन कैटेगिरी से 94 उम्मीदवार चुनाव लड़ रहे हैं। अनुसूचित जाति वर्ग से भी अच्छी भागीदारी देखने को मिल रही है। एससी महिला वर्ग से 22 उम्मीदवार और एससी श्रेणी से 27 उम्मीदवार मैदान में हैं। अनुसूचित जनजाति वर्ग से 5 महिला और 9 अन्य उम्मीदवार चुनाव लड़ रहे हैं। अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी से केवल 4 उम्मीदवार मैदान में हैं, जिनमें 3 महिलाएं शामिल हैं।

41 से 60 वर्ष आयु वर्ग का सबसे ज्यादा दबदबा, निर्दलीयों ने भी बढ़ाई चुनौती

नगर निगम चुनावों में उम्र के आधार पर भी एक खास ट्रेंड देखने को मिल रहा है। सबसे ज्यादा उम्मीदवार 41 से 60 वर्ष आयु वर्ग के हैं। 41 से 50 वर्ष के 67 उम्मीदवार चुनाव लड़ रहे हैं, जो कुल संख्या का लगभग 38.95 प्रतिशत हैं। वहीं 51 से 60 वर्ष आयु वर्ग के 53 उम्मीदवार मैदान में हैं। इसका मतलब है कि स्थानीय राजनीति में अनुभवी और स्थापित चेहरों का दबदबा बना हुआ है। युवा वर्ग की भागीदारी अपेक्षाकृत कम दिखाई दे रही है। 21 से 30 वर्ष आयु वर्ग के केवल 5 उम्मीदवार चुनाव लड़ रहे हैं। वहीं 31 से 40 वर्ष के 30 उम्मीदवार मैदान में हैं। 60 वर्ष से अधिक उम्र के 17 उम्मीदवार भी अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। इन आंकड़ों से साफ है कि युवा राजनीति की चर्चा भले तेज हो, लेकिन स्थानीय निकाय चुनावों में अभी भी मध्य आयु वर्ग का वर्चस्व कायम है। 

राजनीतिक दलों की स्थिति पर नजर डालें तो बीजेपी और कांग्रेस के बीच सीधी टक्कर दिखाई दे रही है। बीजेपी ने चारों नगर निगमों में कुल 62 उम्मीदवार उतारे हैं, जबकि कांग्रेस के 63 उम्मीदवार मैदान में हैं। इसके अलावा 47 निर्दलीय उम्मीदवार चुनावी मुकाबले को रोचक बना रहे हैं। निर्दलीयों की बड़ी संख्या यह भी संकेत देती है कि स्थानीय स्तर पर व्यक्तिगत प्रभाव और सामाजिक पकड़ अभी भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। चारों नगर निगमों में 17 मई को मतदान होगा, जबकि मतगणना और नतीजे 31 मई को घोषित किए जाएंगे। चुनावी नतीजे केवल राजनीतिक दलों की जीत-हार तय नहीं करेंगे, बल्कि यह भी बताएंगे कि स्थानीय राजनीति में महिलाओं, मध्यम वर्ग और सामाजिक प्रतिनिधित्व का बदलता समीकरण किस दिशा में जा रहा है। 

इस बार के चुनावों ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या लोकतांत्रिक राजनीति धीरे-धीरे आर्थिक रूप से संपन्न वर्ग तक सीमित होती जा रही है। गरीब वर्ग की बेहद कम भागीदारी इस चिंता को और मजबूत करती है। वहीं महिलाओं की बढ़ती मौजूदगी स्थानीय लोकतंत्र के लिए सकारात्मक संकेत मानी जा रही है। अब देखना होगा कि चुनाव परिणामों में जनता किस सामाजिक और राजनीतिक सोच को सबसे ज्यादा समर्थन देती है।

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