जब जीवन की धारा अपने मूल की ओर लौटने को व्याकुल होती है, तब स्मृति ही साधना बन जाती है और विरह ही वंदना का रूप धारण कर लेता है। सद्गुरु महात्मा सुशील कुमार जी का स्मरण मेरे लिए केवल अतीत की कोई भावुक अनुभूति नहीं, बल्कि वर्तमान में धड़कती हुई वह चेतना है, जो हर क्षण मार्गदर्शन करती है। उनके महानिर्वाण का यह 24वाँ वर्ष किसी अंत का प्रतीक नहीं, बल्कि उस अनंत उपस्थिति का बोध है, जो आज भी हर साधक के अंतर्मन में जीवित है।
सद्गुरु केवल एक व्यक्तित्व नहीं होते, वे एक अनुभूति होते हैं—एक ऐसा प्रकाश, जो अज्ञान के अंधकार को चीरकर भीतर का सत्य प्रकट करता है। उनका सान्निध्य शब्दों में नहीं बंधता, वह हृदय में उतरता है और जीवन की दिशा बदल देता है। उनके स्नेह में माँ की ममता थी, उनके अनुशासन में पिता की दृढ़ता और उनकी करुणा में ईश्वर का साक्षात् स्पर्श।
आज भी स्मृतियों के उस कोमल कोने में एक दृश्य बार-बार उभरता है, जब उनके सान्निध्य में एक साधारण-सी घटना ने मेरे भीतर के अहंकार को तोड़कर मुझे सच्चे समर्पण का अर्थ सिखाया। उनका दंड भी कृपा था और उनका स्नेह भी साधना। उस क्षण ने मुझे यह समझाया कि गुरु का हर व्यवहार शिष्य के कल्याण के लिए होता है, चाहे वह कठोर प्रतीत हो या कोमल।
विरह की वेदना सामान्यतः हृदय को व्याकुल करती है, लेकिन सद्गुरु के संदर्भ में यही वेदना आत्मा को निर्मल करने वाली तपस्या बन जाती है। यह हमें भीतर झाँकने की प्रेरणा देती है और यह अनुभूति कराती है कि गुरु कहीं बाहर नहीं, बल्कि हमारे अपने अंतर्मन में ही विराजमान हैं। उनकी उपस्थिति हर उस श्वास में है, जो श्रद्धा से भरी है, हर उस कर्म में है, जो समर्पण से किया जाता है।
सद्गुरुदेव ने हमें सेवा, साधना और समर्पण का जो मार्ग दिखाया, वही आज भी जीवन का सबसे बड़ा आधार है। उन्होंने सिखाया कि यदि माँगना ही है, तो संसार की क्षणभंगुर वस्तुओं को नहीं, बल्कि सद्गुरु को माँगना चाहिए, क्योंकि जब गुरु मिल जाते हैं, तो जीवन अपने आप पूर्ण हो जाता है।
आज, इस पावन अवसर पर अश्रुपूरित नेत्रों और कृतज्ञ हृदय से मैं अपने सद्गुरुदेव को नमन करते हुए केवल इतना ही कह पाता हूँ—
आप ही पथ हैं, आप ही मंज़िल हैं, आप ही जीवन का सार हैं।
जहाँ समर्पित साधक की विरह वेदना ही वंदना बन जाए, वहीं सद्गुरु की दिव्य उपस्थिति का साक्षात् अनुभव होता है।
अश्रुपूरित श्रद्धांजलि
तेरी यादों का दीप जला है,
मन मंदिर में आज भी गुरुवर,
विरह की यह मौन अग्नि ही
बन गई है मेरी अर्चना अंदर।
तेरे चरणों की धूल ही मेरी
जीवन की सबसे बड़ी कमाई,
तेरी डाँट में छिपी जो कृपा थी,
वही मेरी सच्ची गुरुवराई।
हथेलियों पर पड़े जो निशान,
आज भी तेरा स्पर्श जगाते हैं,
पीड़ा नहीं, वो प्रेम की भाषा,
हर पल मुझको राह दिखाते हैं।
तू दूर नहीं, हर श्वास में बसकर
मुझमें ही अपना रूप दिखाता,
जब-जब मन थक कर रुक जाता,
तू बनकर संबल साथ निभाता।
क्या माँगूँ अब इस जग से मैं,
जब तू ही मेरा सब कुछ है,
तेरे चरणों में ही पाया मैंने
जो भी मेरा सत्य,सुख, रुख है।
विरह की यह वेदना ही अब
मेरी सबसे पावन वंदना है,
हे सद्गुरुदेव!चरणों में तेरे
यह जीवन अर्पण साधना है।
सद्गुरुदेव एवं माँ विजया जी के युगल श्रीचरणों में कोटि-कोटि नमन।
जहाँ विरह वेदना ही वंदना बन जाएसद्गुरु महात्मा सुशील कुमार जी के 24वें महानिर्वाण दिवस पर भावभीनी श्रद्धांजलि












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